Kiski dulhan [part 21]

वो रहस्य्मयी नक़ाबपोश पूरे ''सभा कक्ष'' में धुंआ फैलाकर गायब हो गया ,उस कक्ष में अब धुआं घना होकर फैल चुका था, किन्तु  मोहिनी के कानों में अभी भी,उस अजनबी के कहे शब्द गूँज रहे थे—उसका यह कहने से क्या तात्पर्य हो सकता है ? 

"अगर ज़िंदा रहना चाहती हो... तो आज रात अपने पति पर भी भरोसा मत करना।"

उसकी उँगलियाँ अनायास उस अज़नबी हाथ से छूट गईं ,वह घबराकर दो कदम पीछे हटी।"भानु ! ''उसने ज़ोर से पुकारा।


लेकिन जवाब में सिर्फ़ लोगों की भाग-दौड़ और खाँसी की आवाज़ें हीं उसे सुनाई दीं।चारों ओर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

उधर भानु  भी, मोहिनी को खोज रहा था।"मोहिनी ! मोहिनी ! "उसने कई बार आवाज़ें  लगाईं । अचानक किसी ने पीछे से उसका कंधा पकड़ लिया। वह पलटा और अपने बचाव के लिए उसने मुक्का ताना ,वो मुक्का मारने ही वाला था कि सामने विक्रम राजवीर खड़े दिखलाई दिए  -"पापा !"कहकर उसने अपने आपको रोका। 

विक्रम ने तुरंत उसका हाथ नीचे किया और बोले -"शांत रहो !

"मोहिनी'' कहाँ है ? भानु  ने बेचैनी से उनसे पूछा।

विक्रम ने सिर हिलाया -"मुझे नहीं पता "लेकिन इस समय उसे ढूँढ़ने मत निकलना,उसे समझाते हुए बोले। 

"क्यों ?"

"क्योंकि.....यही तो वे लोग चाहते हैं ।"

दूसरी ओर...रत्न प्रताप  धुएँ के मध्य  उस काले मुखौटे वाले आदमी का पीछा कर रहे थे।उन्हें विश्वास  था कि वही नक़ाबपोश चमड़े की डायरी लेकर भागा है।वह आदमी 'सभा कक्ष' के पीछे बने एक संकरे गलियारे में घुस गया।

 रत्न प्रताप भी, उसके पीछे दौड़े ,कुछ दूर जाकर वह गलियारा दो हिस्सों में बँट गया ,एक रास्ता ऊपर की ओर जाता था,दूसरा नीचे की तरफ ,इससे पहले कि रत्न प्रताप कुछ समझ पाते, उससे पहले ही दोनों दिशाओं से एक साथ दौड़ने की आवाज़ आने लगी।उन्होंने गुस्से से दाँत भींच लिए !और बुदबुदाए "चाल.."यह फिर वही चाल है।"उन्हें समझ आ गया, कि कोई जानबूझकर उन्हें भ्रमित कर रहा है।

इधर मोहिनी धुएँ में रास्ता टटोलते हुए ,आगे बढ़ रही थी।उसे लगा, शायद वह'' सभा कक्ष'' से बाहर निकल आई है ,लेकिन अचानक उसका पैर फिसला ,लगा जैसे ,उसके पैरों के नीचे की ज़मीन गायब हो गई है। "आह!" उसके मुख से स्वर निकला ,दरअसल वो लगभग चार फीट नीचे किसी ढलान पर गिर गई थी । वो ढलान भी ,चिकनी थी,वह फिसलती हुई एक छोटे-से पत्थर के कमरे में आ गिरी।

कुछ क्षणों तक वो वहीं ऐसे ही पड़ी रही ,तब कुछ देर बाद ,उसने खुद को संभाला...तो पाया कि कमरे में एक हल्की नीली रोशनी जल रही थी। यह रोशनी किसी पुराने तेल के दीये से नहीं...बल्कि दीवार में जड़े हुए नीले पत्थरों से आ रही थी ,उसने अपने चारों ओर देखा ,वो कमरा गोलाकार था ,दीवारों पर पुराने चित्र बने हुए थे। पहले चित्र में...राजवीर हवेली का निर्माण दिखाया गया था।

दूसरे में...आठ लोग एक गोल मेज़ के चारों ओर खड़े थे। तीसरे चित्र पर उसकी नज़र टिक गई ,उसमें एक आदमी अपनी गोद में एक छोटी बच्ची को लिए खड़ा था और उसके सामने...दो लोग तलवारें उठाए खड़े थे। मोहिनी  धीरे-धीरे चित्र के पास गई ,बच्ची का चेहरा समय के साथ धुंधला हो चुका था, लेकिन उसके गले में पड़ा लॉकेट स्पष्ट  दिखलाई दे रहा था। ये लॉकेट भी ऐसा ही था,जैसा , चाँदी का लॉकेट...जो रत्न प्रताप को और हमें सुरंग में मिला था।

"तो..."पीछे से किसी महिला की शांत आवाज़ आई ,"आख़िर तुम यहाँ तक पहुँच ही गई।"

मोहिनी बिजली की तरह तेजी से पलटी। कमरे के दूसरे छोर पर लगभग पचपन-साठ वर्ष की एक महिला खड़ी थी। गरिमामयी चेहरा लिए ,सफेद साड़ी,बालों में हल्की सफेदी और चेहरे पर अजीब-सी शांति थी लेकिन उनकी आँखें...वे किसी साधारण महिला की नहीं थीं। उनमें वर्षों का दर्द और अनुभव दोनों दिखाई दे रहे थे।

मोहिनी ने सावधानी से पूछा—"आप कौन हैं?"

महिला हल्का-सा मुस्कुराईं ,"मेरा नाम अभी जानने का समय नहीं आया है ।"

"लेकिन..."मैं तुम्हारी प्रतीक्षा पिछले पच्चीस सालों से कर रही हूँ।"

मोहिनी  का दिल तेज़ी से धड़कने लगा ,आखिर ये महिला कौन हो सकती है ,ये मेरी प्रतीक्षा क्यों कर रही होगी ?तब उसने पूछा -"क्या आप मुझे जानती हैं?"

"तुम्हें नहीं...एक गहरी साँस लेकर उस महिला ने धीमे स्वर में कहा -"...तुम्हारी किस्मत को जानती हूँ।"

उधर 'सभा कक्ष' में धुआँ धीरे-धीरे छँटने लगा था ,'रक्षक मंडल' के लोग एक-दूसरे की गिनती कर रहे थे ,तभी नेता की आवाज़ गूँजी—"वो डायरी यहाँ नहीं है ,कहाँ गयी ?"

एक आदमी बोला—"लगता है ,गायब हो गयी। "

और वो लड़की !"

वह भी नहीं मिल रही ,वो भी यहाँ नहीं है। "

नेता ने अपनी आँखें बंद कर लीं ,जैसे उसे, इसी बात का डर था ,फिर उसने विक्रम की ओर देखा और बोला - अब खेल बदल चुका है।"

विक्रम ने कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु  उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

अचानक भानु चिल्लाया—''मोहिनी !"उसकी आवाज़ पूरे' सभा कक्ष' में गूँज गई।

किन्तु उसे कोई उत्तर नहीं मिला ,वह दरवाज़े की ओर भागा ,दो नकाबपोशों ने उसे रोकने की कोशिश की ,लेकिन इस बार भानु नहीं रुका ,उसने एक को धक्का दिया ,दूसरे का हाथ झटक दिया।उसकी आँखों में सिर्फ़ एक ही लक्ष्य था—मोहिनी  को ढूँढ़ना।

रत्न प्रताप भी, उसी समय लौटे ,उन्होंने देखा, कि मोहिनी गायब है ,यहाँ के हालात समझ उनका चेहरा भी कठोर हो गया।

उन्होंने नेता की ओर देखा और चेतावनी देते हुए कहा - अगर उसे कुछ हुआ...तो इस बार मैं पूरी 'रक्षक मंडली' को समाप्त  कर दूँगा।"

नेता पहली बार पूरी गंभीरता से बोला—अगर लड़की उस जगह पहुँच गई .....तो अब उसे, हममें से कोई नहीं बचा सकता।"

उधर...उस रहस्यमयी महिला ने एक दीवार पर हाथ रखा ,दिवार का पत्थर धीरे-धीरे खिसकने लगा ,उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा और दिखाई दिया।

कमरे के बीचों-बीच एक लकड़ी का पालना रखा था किन्तु पालना खाली था।  उस पालने के ऊपर एक पुरानी चाँदी की पट्टिका लगी थी। मोहिनी ने उस पट्टिका की धूल साफ़ की ,पट्टिका पर एक नाम खुदा था—"मोहिनी "

उसकी साँस अटक गई ,उसने अपने धड़कते ह्रदय को संयमित किया और उस नाम को दोबारा पढ़ा ,कहीं पहली बार पढ़ने में उससे कोई गलती तो नहीं हो गयी थी किन्तु अब गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी।उस पर साफ़ लिखा था—"मोहिनी "और उसके ठीक नीचे—"जन्म – राजवीर हवेली"

मोहिनी का दिमाग सुन्न पड़ गया ,उसने काँपती आवाज़ में पूछा—"यह..."...यह कैसे हो सकता है?"

महिला ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—क्योंकि तुम्हें बचाने के लिए....तुम्हें इस हवेली से दूर भेजा गया था।"

मोहिनी एक कदम पीछे हट गई ,"नहीं.."मेरे माता-पिता..."

महिला ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा—"जिन्हें तुम अपने माता-पिता मानती हो..."...उन्होंने तुम्हें जन्म ही नहीं दिया। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया...जहाँ  सिर्फ़ मोहिनी की तेज़ होती साँसें ही सुनाई दे  रही थीं और ठीक उसी समय...महिला ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक पुरानी तस्वीर निकाली। तस्वीर में तीन लोग खड़े थे। रत्न प्रताप ...

विक्रम...और उनके बीच मुस्कुराती हुई वही महिला ,लेकिन तस्वीर के कोने में...एक नन्ही बच्ची भी थी...जिसे रत्न प्रताप राजवीर अपनी गोद में उठाए हुए थे।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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