नंदिनी अपना बच्चा मांगने के लिए, प्रतीक के माता-पिता से मिलने जाती है और उनसे बात करती है, किंतु कल्पेश जी और उनकी पत्नी तो उसके बच्चों से भी ,उसे मिलने भी नहीं देते। उनके इशारे पर ,उनका परिचारक कैलाश, नंदिनी को घर से बाहर की तरफ खींच कर ले जाता है।
नंदिनी उनसे चिल्ला कर कहती है - मुझे, मेरे बच्चे से मिलने दो ! एक मां का अधिकार तुम छीन नहीं सकते, कि वह अपने बच्चे से मिले, किंतु उन्हें ,उस पर तरस नहीं आया।
तब प्रतीक की मम्मी गुस्से से बोलीं - तूने तो मेरे बच्चे को मुझसे दूर ही नहीं ,इस दुनिया से भी दूर कर दिया।
तब नंदिनी चेतावनी देते हुए बोली -यदि आप लोग, मुझे, मेरे बच्चे से नहीं मिलने देंगे तो मैं, कानूनी कार्यवाही करूंगी ,आप लोगों को मेरा बच्चा वापस करना होगा।
उन्हें धमकी देकर वह कोठी से बाहर तो आ गई किंतु बहुत देर तक खड़ी, वहीं रोती रही। अब उसे अपने निर्णय पर पश्चाताप हो रहा था। उसने रोहन को अपना बच्चा देकर बहुत बड़ी गलती कर दी।
जब वह अपने घर पहुंची, उसके चेहरे की उदासी को देखकर उसके माता-पिता जान गए ,अवश्य ही कुछ हुआ है, उन्होंने, उससे पूछा - तू कहां गई थी ?क्या कुछ हुआ है ?
तब उन्हें, नंदिनी ने बताया -मैं उन लोगों से अपना बच्चा मांगने के लिए गई थी, अब मेरा बच्चा वहां पर सुरक्षित नहीं है। जिस पर विश्वास करके उस बच्चे को वहां छोड़ा था, और जिसे अपना बच्चा दिया था वह भी' धोखा' दे गया। ' अब उसे, सारी दुनिया 'धोखेबाज' नजर आ रही थी। रोते हुए ,जैसे वो किसी निर्णय पर पहुंचीं।
अपने आंसू पोंछते हुए , तब नंदिनी ने ,अपने माता- पिता से कहा -अब' मैं' उन पर कानूनी कार्यवाही करूंगी यदि वह मेरा बच्चा इस तरह से नहीं देंगे तो फिर कानून के माध्यम से देंगे।
नंदिनी के पिता, अवस्थी जी ने उसे समझाने का प्रयास किया और बोले -तुम बच्चे का मोह त्याग दो ! वह उनका भी तो पोता है। वे ,उसे अपने आप संभाल लेंगे, उनका 'खून का रिश्ता है।'
क्या, वो मेरा बेटा नहीं है ? आप लोग चाहते ही नहीं, कि मेरा बेटा मेरे पास रहे , यदि वह वहां सुरक्षित है तो फिर प्रतीक तो उनका अपना बेटा था,तब वो कैसे सुरक्षित नहीं रह सका ?
उसकी मम्मी बोली- ''मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है। '' उन्हें क्या मालूम था ?उनका अपना ही बेटा दगा दे जाएगा , वो तो उससे भी बहुत प्यार करते थे ? किंतु अब क्या कर सकते हैं ? जिसने अपराध किया है, उसे तो सजा मिल ही गई ,अब वो जेल में है। जीवन में ,किसी को मालूम थोड़े ही होता है कि कब कौन सा रिश्ता 'धोखा 'दे जायेगा ?
अब तुम निश्चिन्त रहो ! जो अपराधी था ,उसको उसके अपराध की सज़ा मिल जाएगी। अब तुम्हारे बेटे का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मेरा विचार तो ये है, तुम यह कानूनी कार्यवाही करने का विचार भी त्याग दो !
क्योंकि नंदिनी के अभिभावक तो सोच रहे थे -अभी तो नंदिनी केस में फंसी है, जब यह केस सुलझ जाएगा, तो इसका विवाह कर देंगे और यह अपनी ससुराल चली जाएगी। किन्तु अब नंदिनी के सामने एक दूसरा ही उद्देश्य आ खड़ा हुआ था, अब वह अपना बच्चा उन लोगों से वापस चाहती है ।
तब अवस्थी जी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा - अभी, उनके घर में एक बच्चे की मौत हुई है और एक जेल गया है। उन्हें थोड़ा सोचने- समझने का अवसर तो मिलना चाहिए। हम उन्हें समझा कर देखेंगे, हो सकता है बात आराम से ही, बन जाए। उनकी परेशानी को भी तो समझो ! वे लोग किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं।
क्या मैं परेशान नहीं हूँ ?अरे !जिस पर विश्वास करके मैंने अपना बच्चा दिया ,वो ही उसके पिता का हत्यारा निकला,अब मैं किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकती।
मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूँ ,तुमसे किसने कहा था ?'तुम वहां जाकर उनसे अपना बच्चा मांगो या उन्हें धमकी देकर आओ ! ये बड़ों की बातें हैं ,हम तुम्हारे साथ चलते और सहजता से उन्हें समझाते।
पापा ! कुछ नहीं होता ,वो लोग इतने अहंकारी हैं ,पहले की तरह आपका अपमान कर देते।
कोई बात नहीं ,एक बार तुम्हारे लिए उनके दरवाजे पर गए हैं ,एक बार और चले जाते। हम बेटी के पिता हैं ,थोड़ा सहन किया। यदि तुम्हें ,हमारे मान -अपमान की इतनी ही चिंता थी, तो ऐसे कोई भी अनुचित क़दम उठाने से पहले दो बार सोचतीं। जब कदम आगे बढ़ाया ही है तो हमें अपना कार्य पूर्ण करना है ,उसमें मान -सम्मान की बात ही कहाँ रह जाती है ? किन्तु मेरा कहा मानो !अभी कुछ दिनों के लिए ठहर जाओ !जल्दबाज़ी दिखाना उचित नहीं।
नंदिनी को अवस्थी जी की बात उचित लगी और वो शांत होकर अपने कमरे में चली गयी।
अब प्रतीक के घर वालों ने, चंपा को भी वहां से हटा दिया था। नितिन की देखरेख के लिए, किसी दूसरी दाईं माँ का इंतजाम कर लिया था। नंदिनी तो, इसीलिए नौकरी कर रही थी ,ताकि वह सारा दिन काम में व्यस्त रहे और लौटते समय शाम को अपने बेटे से भी मिल लिया करेगी , किंतु अब वह मौका भी हाथ नहीं लग रहा। उसका किसी भी काम में मन ही नहीं लग रहा था। जैसे वह दुनिया से निराश हो चली थी, उसने जिंदगी में इतने 'धोखे' खाए हैं, उसे अब किसी पर भी विश्वास नहीं रह गया था।
नंदिनी ने अब अपनी नौकरी छोड़ दी, और वह सारा दिन घर में पड़ी रहती और अपने बच्चे की याद में रोती रहती। उसकी मम्मी ने उसे बहुत समझाने का प्रयास किया, कि सही समय आने पर हम उनसे बात करेंगे !
कब करेंगे ? कब वो समय आएगा ? कभी -कभी वो चिल्ला उठती।
मन ही मन वे सोच रहे थे-' सब कुछ सुलट गया, लेकिन यहां तो बात और उलझती ही जा रही है।
तब एक दिन नंदिनी की मम्मी ने कहा -बैठे हुए रोते रहने से कोई लाभ नहीं है , कुछ दिन के लिए अपनी नानी के घर चली जाओ ! मन बदल जाएगा।
नंदिनी जाना तो नहीं चाहती थी, फिर उसने सोचा-' यहां रहकर भी कोई लाभ नहीं है, न ही बेटे को देख पा रही हूं और यहां रहकर मुझे उसकी याद और सताती रहती है, यह सोचकर वह नानी के घर चली गई।
एक दिन वो निराश बगीचे में बैठी हुई थी, तभी उसे किसी का जाना- पहचाना स्वर सुनाई दिया - कैसी हो ?
उसने घूम कर देखा, तो वहां पर दीपक खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसको देखकर उसने ज़बरन मुस्कुराने का प्रयास किया ,किन्तु मन ही मन प्रसन्न भी हुई और सोचा -कम से कम इससे तो दिल की बात करूंगी, यह तो मुझे समझेगा। मुस्कुराते हुए बोली -ठीक ही हूं ,और आप कैसे हैं ?
वह उसके समीप आया और बोला -लगता है ,तुम तो हमें भूल ही गयीं।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।
फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है ? तुम कुछ उदास हो, खुश नहीं हो, क्या कुछ हुआ है ?
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।
तब इस बहादुर लड़की के चेहरे पर मुस्कान क्यों नहीं है ?दीपक ने पूछा।
