Kiski dulhan [part 18]

रत्न प्रताप राजवीर ,मोहिनी और भानु प्रताप तीनों' निमंत्रण पत्र' पर दिए नक्शे के आधार पर सुरंग से होते हुए ,'सभा कक्ष 'में  पहुंचते हैं ,वहाँ एक नक़ाबपोश से उनका सामना होता है। जिसकी आवाज सुनकर रत्न प्रताप का चेहरा सफेद पड़ जाता है और वो आश्चर्य से कहता है -ऐसा कैसे हो सकता है ?तुम जिन्दा नहीं हो सकते। तभी उस कक्ष का दरवाजा  धड़ाम! की आवाज के साथ बंद हो जाता है। 

लोहे का विशाल दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि पूरा' सभा कक्ष' काँप उठा,मोहिनी अनायास ही पीछे हट गई। भानु ने तुरंत दरवाज़े की ओर दौड़कर उसे खोलने का प्रयास किया ,उसने पूरी ताकत से दरवाज़े का हैंडल खींचा।एक बार...दो बार...और तीन बार...लेकिन दरवाज़ा टस से मस नहीं हुआ।


"यह बाहर से लॉक हो चुका है ,भानु ने दाँत भींचते हुए कहा।

रत्न प्रताप की नज़र अभी भी उस नकाबपोश आदमी पर जमी हुई थी ,उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। "यह... असंभव है..."उन्होंने बुदबुदाते हुए कहा। मैंने अपनी आँखों से तुम्हारी चिता जलती देखी थी।"

नकाबपोश आदमी धीऱे से  हँसा ,उसकी हँसी में न गुस्सा था, न खुशी...बस एक अजीब-सी ठंडक थी। तब वो बोला -रत्न प्रताप ! तुम हमेशा वही देखते थे, जो तुम्हें दिखाया जाता था। यही तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी थी।

कमरे में लगी, आठों मशालें एक-एक करके जल उठीं।अब पहली बार 'सभा कक्ष' पूरी तरह स्पष्ट दिखाई दे रहा था।गोल मेज़ के मध्य राजवीर परिवार का विशाल प्रतीक बना हुआ था लेकिन उस प्रतीक पर गहरे खरोंच के निशान बने हुए थे। मानो किसी ने जानबूझकर उसे मिटाने की कोशिश की हो। उस कक्ष में लगभग आठ कुर्सियां थीं ,आठ कुर्सियों में से सात पर धूल जमी थी ,सिर्फ़ एक कुर्सी बिल्कुल साफ़ दिखलाई दे रही थी।

इस सबसे स्पष्ट था...उस पर हाल ही में कोई बैठा था ,नकाबपोश उसी कुर्सी के समीप जाकर खड़ा हो गया किन्तु वो उस कुर्सी पर नहीं बैठा ,उसने उस पर बैठने के बजाय, अपनी हथेली मेज़ पर रखी। तभी उस मेज़ के बीच से हल्की घर्र... घर्र... की आवाज़ आई। लकड़ी का गोल हिस्सा धीरे-धीरे नीचे धँसने लगा। उसके भीतर से एक लोहे का संदूक ऊपर आया।

यह सब देखकर मोहिनी की आँखें से आश्चर्य से फैल गईं ,तब उसने पूछा - यह क्या है?"

रत्न प्रताप ने बहुत धीमे स्वर में कहा—"राजवीर अभिलेख...''मोहिनी को जबाब देकर उसने नक़ाबपोश से पूछा - किन्तु ..ये सब तो नष्ट कर दिए गए थे।"

नकाबपोश ने उस संदूक पर हाथ फेरा,और बोला - यही तो तुम्हारी दूसरी भूल थी। सच्चाई कभी नष्ट नहीं होती...बस छिपा दी जाती है।"

भानु आगे बढ़ा और उस नक़ाबपोश से पूछा - तुम कौन हो, और हमें यहाँ क्यों बुलाया गया है ?"

नकाबपोश ने उसकी ओर देखा -भानु ! मैंने तुम्हें नहीं बुलाया ,मैंने सिर्फ़ रास्ता खुला छोड़ दिया ,आना  या न आना ...तुम्हारा अपना निर्णय था।"

मोहिनी जो अब तक चुपचाप खड़ी रहकर ये सब देख रही थी ,तब वो अचानक पूछ बैठी ,जो प्रश्न उसके मन में  लगातार घूम रहा था,तब उसने, नकाबपोश से पूछा - अगर आपको हमें मारना ही होता...तो रास्ते में भी तो मार सकते थे ,फिर हमें यहाँ बुलाने की क्या आवश्यकता थी ?"

नकाबपोश मुस्कुराया और  बोला -अच्छा सवाल है। 

उसने पहली बार सीधे मोहिनी की ओर देखा और बोला -क्योंकि...कुछ लोग मरने से पहले सच देखने के अधिकारी होते हैं।"मैं चाहता था , मरने से पहले आप लोग सच्चाई जान लें ,इतना कहकर उसने संदूक खोला ,उसके अंदर पुरानी फ़ाइलें नहीं थीं ,सिर्फ़ आठ मोम से सील किए हुए लिफ़ाफ़े रखे थे ,हर लिफ़ाफ़े पर एक नाम लिखा था -रत्न प्रताप !और विक्रम !और बाकी नाम धूल से ढके हुए थे।

नकाबपोश ने "विक्रम" वाला लिफ़ाफ़ा उठाया -वह उसे भानु की ओर बढ़ाने लगा लेकिन जैसे ही भानु  ने लिफ़ाफा लेने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया...उसने लिफ़ाफ़ा वापस खींच लिया और मुस्कान के साथ बोला -अभी नहीं , हर सच का एक समय होता है।"

रत्न प्रताप का धैर्य अब टूट चुका था ,और वो लगभग तेज स्वर में बोला - बस ..अब यह खेल बहुत हो चुका ,चुपचाप अपना चेहरा दिखाओ !"

नकाबपोश कुछ पल चुप रहा ,फिर उसने अपने चेहरे पर बंधी डोरी को छुआ।

मोहिनी और भानु दोनों की साँसें थम गईं और मन ही मन सोचने लगे क्या अब उस तीसरे भाई का चेहरा सामने आने वाला था?लेकिन उसी क्षण...

''सभा कक्ष ''की छत पर लगी पीतल की घंटी ज़ोर से बज उठी -टन...!टन...!टन...!

नकाबपोश तुरंत सतर्क हो गया ,उसने सिर उठाकर छत की ओर देखा और बोला -वे लोग, अपेक्षा से पहले पहुँच गए घबराकर एकदम से उसके मुख से निकला। 

रत्न प्रताप ने चौंककर पूछा - कौन लोग ?

"रक्षक मंडल के लोग ''पहली बार नकाबपोश की आवाज़ में तनाव सुनाई दिया ,आज की सभा तय समय से पहले शुरू हो गई है।"

अचानक कमरे की दूसरी दीवार खुली और एक लंबा गलियारा दिखाई दिया ,उस गलियारे से कई लोगों के कदमों की आवाज़ आने लगीं ।इस बार वे छिप नहीं रहे थे ,वे सीधे' सभा कक्ष' की ओर ही आ रहे थे।नकाबपोश ने तेजी से संदूक बंद किया ,फिर उसने वह लिफ़ाफ़ा चुपके से भानु की जैकेट की जेब में डाल दिया। इतनी तेजी से कि मोहिनी और रत्न प्रताप भी ठीक से देख नहीं पाए ,अभी इसने क्या हरकत की ?

उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—जब तक अपने पिता से अकेले में बात न कर लो...तब तक इसे मत खोलना।"

इससे पहले कि भानु कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही नकाबपोश पीछे बने, एक गुप्त द्वार की ओर बढ़ गया।

रत्न प्रताप चिल्लाए— रुको! लेकिन वह आदमी दीवार के भीतर बने संकरे रास्ते में गायब हो चुका था।

उधर गलियारे से आती आहट अब बिल्कुल पास थी। उस एकांत में लोहे के जूतों की भारी आवाज़...हथियारों की खनक...और किसी के आदेश देने की बुलंद आवाज़ उन्हें सुनाई दे रही थी। 

 रत्न प्रताप ने तुरंत फुसफुसाकर मोहिनी और भानु से कहा—अब अगर उन्होंने हमें यहाँ देख लिया...तो सिर्फ़ एक ही सवाल पूछेंगे।"

मोहिनी  ने घबराकर पूछा—कौन-सा ?"

रत्न प्रताप  ने' सभा कक्ष' के मध्य बने राजवीर प्रतीक की ओर देखते हुए कहा—वे पूछेंगे...आठवीं कुर्सी पर बैठने का अधिकार किसने दिया ?'और उसी क्षण...'सभा कक्ष' का मुख्य द्वार धीरे-धीरे खुलने लगा।अभी रत्न प्रताप राजवीर उन्हें कुछ ओर समझा पाता ,उस कक्ष का द्वार खुल गया। सभा कक्ष में आने वाले कितने हैं ?वे मित्र हैं या शत्रु !जानने के लिए आइये !आगे बढ़ते हैं। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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