वह नक़ाबपोश ''सभा कक्ष'' के दूसरे द्वार से भाग चुका था। अभी वे तीनों कुछ समझ पाते तभी 'सभा कक्ष ''का विशाल दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा ,घर्ररर...की आवाज के साथ ,लोहे के पट्टों की घर्षण भरी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
मोहिनी,भानु और रत्न प्रताप राजवीर एक साथ उसी दिशा में देखने लगे। अगले ही पल...काले लबादे पहने सात लोग एक-एक करके' सभा कक्ष' में दाख़िल हुए। उनके चेहरों पर चाँदी के बने आधे मुखौटे थे। हर मुखौटे पर अलग-अलग निशान उकेरे गए थे—कहीं तलवार...कहीं शेर...कहीं बाज...और सबसे आगे चल रहे व्यक्ति के मुखौटे पर दो साँप बने थे। देखकर ही लग रहा था ,वह स्पष्ट रूप से उनका नेता होगा ।
सातों लोग अपनी-अपनी कुर्सियों के पीछे जाकर खड़े हो गए ,किन्तु किसी ने बैठने का साहस नहीं किया । एकदम से जैसे सबकुछ शांत हो गया ,कमरे में कुछ क्षणों तक केवल मशालों की लपटों की आवाज़ ही सुनाई देती रही।
तब सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने अपनी भारी आवाज़ में कहा—"तीस वर्षों के पश्चात् ...आज सभा फिर से पूरी होने वाली है ।"उसकी नज़र धीरे-धीरे रत्न प्रताप पर गई और आगे बोला -"लेकिन...आज एक मृत व्यक्ति ने वापस लौटकर सभी नियम तोड़ दिए।"
रत्न प्रताप ने बिना डरे उसकी आँखों में देखा -नियम मैंने नहीं, तुमने तोड़े थे ।
मुखौटाधारी नेता हल्का-सा मुस्कुराया और बोला - आज भी तुम उतने ही ज़िद्दी हो।"
भानु ने चारों ओर नज़र दौड़ाई ,उसे एक बात समझ नहीं आई ,सात कुर्सियाँ...सात लोग...लेकिन आठवीं कुर्सी अभी भी खाली थी।वही नई लकड़ी वाली कुर्सी ,जिसके पीछे सिर्फ़ एक अक्षर उकेरा हुआ था—'अ '
नेता की नज़र भी उसी कुर्सी पर गई ,उसने गहरी साँस ली और बोला -अब समय आ गया है ,कहते हुए उसने, एक कुर्सी के पीछे खड़े एक आदमी की ओर संकेत किया ।
उस आदमी ने तुरंत अपनी जेब से एक पुरानी चाँदी की चाबी निकाली। वह चाबी बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मोहिनी के पास थी...बस उस पर अंक १ बना हुआ था।
मोहिनी उस चाबी को देखकर चौंक गई ,उसकी चाबी पर २ अंक था ,मतलब...कम से कम दो ऐसी चाबियाँ मौजूद थीं।
नेता ने चाबी मेज़ के बीच बने गोल छेद में डाली - टक...की आवाज के साथ पूरी गोल मेज़ हल्की-सी घूमने लगी ,फिर...आठवीं कुर्सी अपने-आप आगे सरक आई। उसकी पीठ पर बनी धातु से बनी पट्टी चमकने लगी। उस पर से धूल अपने-आप गिरने लगी।धीरे-धीरे...अक्षर स्पष्ट दिखाई देने लगे ,वह सिर्फ़ 'अ ' नहीं था। पूरा नाम उभर आया— 'अधिष्ठाता"
भानु ने धीमे स्वर में पूछा - यह तो किसी का नाम नहीं......एक पद है?"
रत्न प्रताप ने सिर हिलाया -"हाँ "रक्षक मंडल का सबसे बड़ा पद।"
नेता ने पहली बार सीधे मोहिनी की ओर देखा ,उसकी नज़र बहुत देर तक उसी पर टिकी रही ,फिर उसने अचानक अप्रत्याशित शब्द कहे—उसे यहाँ लेकर आओ !
"दो नकाबपोश धीरे-धीरे मोहिनी की ओर बढ़ने लगे।
भानु तुरंत उसके सामने आकर खड़ा हो गया ,कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा,कठोर शब्दों में बोला। "एक पल के लिए पूरा 'सभा कक्ष' शांत हो गया ,फिर अचानक नेता हँसा -"दिलचस्प...इतनी जल्दी ,तुम्हें अभी से इसकी रक्षा करने की ज़रूरत महसूस होने लगी।
भानु ने दृढ़ स्वर में कहा—अगर किसी को इससे बात करनी है....तो पहले, मुझसे करनी होगी।"
रत्न प्रताप ने भानु की ओर देखा ,उनकी आँखों में पहली बार भानु के लिए गर्व की हल्की झलक दिखाई दी।
नेता ने अपने दोनों आदमियों को हाथ से रुकने का संकेत दिया और बोला - हम यहाँ लड़ने नहीं आए हैं ।हम सिर्फ़ पुष्टि करने आए हैं।"
मोहिनी ने हिम्मत जुटाकर पूछा—किस बात की पुष्टि ?
नेता ने जेब से एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट निकाला। ये लॉकेट उसी तरह का था ,जैसा कुछ देर पहले रत्न प्रताप को सुरंग में मिला था ,किन्तु इस लॉकेट के अंदर एक तस्वीर थी। उसने लॉकेट खोलकर दूर से मोहिनी की ओर बढ़ाया।
एक धुंधली सी तस्वीर थी...जिसमें एक छोटी-सी बच्ची दिखलाई दे रही थी।उस बच्ची के गले में बिल्कुल वैसा ही लॉकेट था।
मोहिनी अनायास आगे बढ़ी।"यह"...यह बच्ची कौन है ?उसने पहचानने की नाक़ाम कोशिश करते हुए पूछा।
नेता ने उत्तर नहीं दिया ,उसने लॉकेट वापस बंद कर लिया ,फिर उसने अपने साथ आए एक व्यक्ति से कहा—"परीक्षा लेनी होगी। "
वह व्यक्ति आगे आया ,उसके हाथ में पीतल का एक छोटा पात्र था।उसने उस पात्र को आठवीं कुर्सी के सामने रखा ,फिर नेता ने मोहिनी की ओर देखते हुए कहा—अगर तुम सचमुच वही हो...तो यह पात्र तुम्हें पहचान लेगा।"
मोहिनी उलझन में पड़ गई ,उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ,तब बोली - मैं कुछ समझी नहीं , ये कैसी परीक्षा है ?
रत्न प्रताप अचानक बेचैन हो उठे ,उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा—"नहीं "मोहिनी यह मत करना ! उसने नेता की तरफ देखा ,और बोला - उसे कुछ मत छूने देना !"
नेता मुस्कुराया तुम्हें अभी भी डर है...कि कहीं सच बाहर न आ जाए।"
मोहिनी ने भानु की ओर देखा ,उसकी आँखों में सवाल थे।
भानु भी उलझन में था ,लेकिन उसने कोई निर्णय मोहिनी पर नहीं थोपा।उसने सिर्फ़ इतना कहा—जो भी करो !...अपनी इच्छा से करना।"
मोहिनी ने एक गहरी साँस ली, उसने निर्णय लिया वो परीक्षा देगी ,वह धीरे-धीरे उस पात्र के समीप पहुँची।जैसे ही उसने, अपना हाथ आगे बढ़ाया। पूरा 'सभा कक्ष' उसे देख रहा था ,जैसे समय रुक गया हो। जैसे हर किसी को उसी पल का इंतज़ार था।
उसकी उँगलियाँ जैसे ही पात्र को छूने वाली थीं—उसी समय...'सभा कक्ष' के बाहर से किसी ने ज़ोरदार आवाज़ में पुकारा—"रुको!"
आवाज़ इतनी परिचित थी, कि भानु का पूरा शरीर सिहर उठा।वह आवाज़ उसने अपने बचपन से सुनी थी ,वह धीरे-धीरे मुड़ा।
'सभा कक्ष' के खुले दरवाज़े पर एक व्यक्ति खड़ा था ,सफेद कुर्ता ,राजवीर परिवार की अंगूठी ,चेहरे पर क्रोध ,वो और कोई नहीं...भानु के पिता विक्रम राजवीर थे। उनकी नज़र सीधे नेता पर थी ,फिर उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—"अभी मैं ज़िंदा हूँ। "
मेरे बेटे और मेरी बहू का फैसला तुम नहीं करोगे।"सभा कक्ष में मौजूद सभी नकाबपोश एक साथ खड़े हो गए। पहली बार...उनके नेता ने भी अपना सिर झुका लिया।
रत्न प्रताप ने यह दृश्य देखा ,तो उनके चेहरे पर अविश्वास स्पष्ट दिखाई देने लगा। उन्होंने मन ही मन कहा—तो विक्रम... अभी भी इनके सामने सिर झुकाते हैं?"लेकिन उन्हें नहीं पता था...कि विक्रम वहाँ अपने बेटे को बचाने आए थे...या...उसे उसी जाल में और गहराई तक धकेलने।
