भीगी हुई धरा ने,जब यूं अपना श्रृंगार किया।
माटी की महक ने , हर ह्रदय महका दिया।
लगता,धुलित हरित वर्ण आंचल सँवार लिया।
हरित दूर्वा ने ,मखमल का चादर बिछा दिया।
गगन के अमृत जल ने तिनका- तिनका सजा दिया।
पत्तों के पंजों पर, जल के मोतियों को सजा दिया।
सूखी धरा को, प्रेमसिक्त कर रोम -रोम हर्षा दिया।
लहरों की धड़कन ने,धरा के केशों को लहरा दिया।
मधुर तान में' पिक' ने,' रसवंती' सुर लगा दिया।
नर्तन करते मयूरों ने, सावन का आवाहन किया।
भीगी धरा पर' धरती',कोमलांगी जब, अपने पांव,
हँसी ने उनकी, चहुँ ओर दिशाओं को गुंजा दिया।
'भीगी धरा ने,' जीवन उल्लास का आवाहन किया।
कोमल कलियों ने,खिलकर प्रकृति का श्रृंगार किया।
ताली दे- दे ,पात! लगता ज्यूँ, प्रकृति का मान किया।
अंकुरित हो, बीजों ने, नवजीवन का आवाहन किया।
