Bhigi hui dharti

भीगी हुई धरा ने,जब यूं अपना श्रृंगार किया। 

माटी की  महक ने , हर ह्रदय महका दिया।

लगता,धुलित हरित वर्ण आंचल सँवार लिया।

हरित दूर्वा ने ,मखमल का चादर बिछा दिया।

 


गगन के अमृत जल ने तिनका- तिनका सजा दिया।

पत्तों के पंजों पर,  जल के मोतियों को  सजा दिया। 

सूखी धरा को, प्रेमसिक्त कर रोम -रोम हर्षा  दिया। 

लहरों की धड़कन ने,धरा के केशों को लहरा दिया।

 

मधुर तान में' पिक' ने,' रसवंती' सुर लगा दिया। 

नर्तन करते मयूरों ने, सावन का आवाहन किया। 

भीगी धरा पर' धरती',कोमलांगी जब, अपने पांव,

 हँसी ने उनकी, चहुँ ओर दिशाओं को गुंजा दिया।

 

'भीगी धरा ने,' जीवन उल्लास का आवाहन किया। 

कोमल कलियों ने,खिलकर प्रकृति का श्रृंगार किया।

ताली दे- दे ,पात! लगता ज्यूँ, प्रकृति का मान किया।  

अंकुरित हो, बीजों ने, नवजीवन का आवाहन किया। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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