श्याम मेघों की, ओट से बाहर आ ,
झांकती इक बूंद कुछ घबराई सी,
नीचे जाना मुझे किसअनजान देश ?
गिरूँ किस,अनजान नगर या डगर
सोच रही, सहमी ,सकुचाई सी......!
झोंका हवा का ले चला,जाने किस ओर ?
बही बून्द भी ,पवन का रुख जिस ओर।
गिरी पत्तों पर, रवि किरणों में चमकी,
स्वच्छ मुक्ता, सरल नही जीवन, बूँद का....
न जाने ये सफ़र ले चला, किस ओर ?
कोमल करतल पर गिर, स्पर्श से मुस्काई।
सोचा ,चलो !सफल हुआ, जीवन बूंद का,
ले चला झोंका, न जाने किधर ये हरजाई ?
अनजाने ही उसने, उस रूह को छुआ।
फिसली ठंडी हथेलियों से नीचे गिर,
मचलती बून्द अन्य सखियों संग जा मिली
एक' बूंद 'बन गई,'वो ' ''तटिनी विशाल !
देख ,विस्तृत रूप अपना, बूँद थोड़ा इठलाई।
ये बात समझ आई ,देख सागर की विशालता,
विशाल होना , नहीं जीवन का उद्देश्य !
समझा,तब उसने अपने होने का रहस्य !
रूप नहीं,आकार नहीं,ह्रदय की विशालता,
सूखे तरुवर में समा, नवजीवन दे मुस्काई।
यही सफ़र एक रूह ने पाया।
ईश्वर की गोद से निकाल,वो क्या कर पायेगी ?
जीवन में मुस्कान बनेगी या गैरों को रुलाएगी।
क्या जीवन कर अपना बलिदान, अमर हो जाएगी ?
या अनाचार करते, कायरतापूर्ण जीवन बिताएगी।
एक बून्द हो या रूह सफ़र दोनों को तय करना है।
कठिन अवश्य है ,साहस से जीना या फिर मरना है।
