Kiski dulhan [part 17]

'' सभा कक्ष का निमंत्रण'' उन तीनों को संशय में डाल रहा था ,ये निमंत्रण ही था या फिर हमें फंसाने के लिए कोई जाल बिछाया गया है। रत्न प्रताप के हाथ में जो ''निमंत्रण पत्र ''था वो कागज़ उनके काँपते हाथों की गवाही दे रहा था। उनकी आँखें उसी नक्शे पर जमी हुई थीं, जिस पर लाल स्याही से एक गोल निशान बना हुआ था।"सभा कक्ष ''– आज रात ,ये वाक्य उन्होंने दोहराये। 

कमरे में कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला ,आख़िरकार भानु ने ही चुप्पी तोड़ी और उसने पूछा - रत्न प्रताप  जी..."क्या हम वहाँ जाएँगे?"


रत्न प्रताप  ने एक गहरी साँस ली और बोला -अगर यह असली संदेश है...तो आज तीस साल के बाद पहली बार मुझे उनके सबसे बड़े राज़ तक पहुँचने का मौका मिलेगा।"

मोहिनी ने तुरंत पूछा ,और अगर यह जाल हुआ तो....."

रत्न प्रताप उसकी ओर देखकर मुस्कुराए और बोले -तो, इसका मतलब है...उन्हें भी पता चल चुका है कि मैं ज़िंदा हूँ।"

उन्होंने नक्शे को ध्यान से देखा ,''सभा कक्ष ''तक पहुँचने के लिए तीन रास्ते बने हुए थे।पहला रास्ता लाल रंग से काटा गया था। दूसरे पर लिखा था—"निगरानी" तीसरे पर एक छोटा-सा तीर बना हुआ था।

रत्न प्रताप  ने उसी तीर पर उँगली रखते हुए कहा - हम लोगों के लिए यही रास्ता सुरक्षित हो सकता है। 

भानु ने पूछा -आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ,क्या आपको यकीन है, कि यही रास्ता सुरक्षित है ?"

रत्न प्रताप हल्के से मुस्कुराए और बोले -"क्योंकि यह रास्ता सिर्फ़ हमारे परिवार के तीन लोगों को ही पता है ।"मुझे ,विक्रम को और...वे अचानक चुप हो गए।तीसरे नाम का ज़िक्र करते ही उनके चेहरे पर तनाव लौट आया।

कुछ देर के विश्राम के पश्चात, तब तीनों  ने उसी तीर वाले रास्ते से जाने का निर्णय लिया, तीनों उस गुप्त मार्ग से आगे बढ़ने लगे। यह सुरंग पहले वाली सुरंगों से बिल्कुल भिन्न थी ,यहाँ दीवारों पर नक्काशी थी।पुराने दीपकों के लिए बने स्थान अभी भी मौजूद थे। कई जगह ''राजवीर परिवार ''का चिह्न बना हुआ था।

लेकिन एक बात अजीब थी ,हर चिह्न के मध्य बने दो साँपों में से एक का सिर हथौड़े जैसी किसी चीज़ से तोड़ दिया गया था।

मोहिनी  ने पूछा -किसी ने इन्हें क्यों तोड़ा होगा?"

रत्न प्रताप  ने दीवार को छूते हुए कहा -क्योंकि इतिहास मिटाने वाले लोग...सबसे पहले प्रतीकों को मिटाते हैं।"

करीब दस मिनट चलने के पश्चात सुरंग एक गोल कमरे में जाकर पहुंची ,कमरे के बीचों -बीच एक सूखा हुआ कुआँ था। कुएँ के चारों ओर आठ पत्थर की कुर्सियाँ बनी हुई थीं। हर कुर्सी के सामने एक पीतल की पट्टिका लगी थी। सात पट्टिकाओं पर नाम उकेरे हुए थे ,आठवीं पूरी तरह खाली थी।

भानु पहली पट्टिका के पास गया ,जिस पर लिखा था—रत्न प्रताप राजवीर"दूसरी—"विक्रम प्रताप राजवीर"

तीसरी पट्टिका पर किसी ने धारदार हथियार से नाम मिटा दिया था।चौथी...पाँचवीं...छठी...और फिर सातवीं...हर नाम के नीचे सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—"उपस्थित"लेकिन रत्न प्रताप  और विक्रम के नाम के नीचे लिखा था—"अनुपस्थित"

भानु ने हैरानी से पूछा - ये क्या है?

भानु ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया -यह' रक्षक मंडल' की उपस्थिति सूची है ,जो यहाँ बैठता था...".वह सिर्फ़ राजवीर परिवार का सदस्य ही नहीं होता था..वह फैसले करता था।"

मोहिनी  की नज़र आठवीं खाली कुर्सी पर गई ,वह बाकी अन्य कुर्सियों से अलग थी ,उसकी लकड़ी नई लग रही थी। जैसे उसे कुछ साल पहले ही बदला गया हो। उसने धीरे से पूछा -यह कुर्सी खाली क्यों है?"

रत्न प्रताप ने उत्तर देने के बजाय कुर्सी के पीछे देखा, वहाँ पर एक छोटा-सा उभरा हुआ निशान था।उन्होंने उँगली से उसकी धूल हटाई ,निशान पर सिर्फ़ एक अक्षर उभरा—"रु  "

रत्न प्रताप की भौंहें सिकुड़ गईं ,"रु ' ...यह किसका नाम हो सकता है?"वो सोच में पड़ गया। 

मुस्कुराते हुए मोहिनी सहज ही बोल उठी - 'रूद्र '

भानु  ने उसकी ओर देखा,दोनों की नज़रें मिलीं ,कुछ पल के लिए कमरे का वातावरण बदल गया।

रत्न प्रताप ने तुरंत सिर हिलाया "नहीं। यह उससे कहीं पुराना है।"

उसी समय...सूखे कुएँ के भीतर से किसी धातु के टकराने की आवाज़ आई , टन...तीनों एक साथ कुएँ की ओर बढ़े।भानु  ने टॉर्च की रौशनी नीचे डाली।कुआँ बहुत अधिक गहरा नहीं था। नीचे लोहे की सीढ़ी दिखाई दे रही थी और...एक लकड़ी का दरवाज़ा।

रत्न प्रताप ने आश्चर्य से कहा -मुझे इस रास्ते के बारे में कभी नहीं पता था।"

"क्या हम नीचे जाएँ ?मोहिनी ने पूछा।

रत्न प्रताप  ने कुछ पल सोचा ,फिर बोले,"सभा कक्ष'' शायद इसी के नीचे है।"

भानु  सबसे पहले सीढ़ी से नीचे उतरा उसके पीछे मोहिनी ,सबसे अंत में रत्न प्रताप ! नीचे पहुँचते ही उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण तहखाना नहीं था। यह एक गोलाकार कमरा था।दीवारों पर आठ मशालें लगी थीं लेकिन वे बुझी हुई थीं। कक्ष के मध्य में एक विशाल गोल मेज़ रखी थी। मेज़ के चारों ऊपर की तरह ही ओर आठ कुर्सियाँ थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे वर्षों से यहाँ कोई नहीं आया।

तभी...मेज़ के मध्य रखा एक पुराना प्रोजेक्टर अपने-आप चालू हो गया। टक...कमरे की दीवार पर एक धुंधली तस्वीर उभरी।

तीन युवा पुरुष ,उनमें से दो को भानु तुरंत पहचान गया ,एक विक्रम ,दूसरा युवा रत्न प्रताप ,तीसरे का चेहरा इस बार नहीं मिटाया गया था...लेकिन जैसे ही तस्वीर साफ़ होने लगी—पूरी स्क्रीन झिलमिलाई...और किसी ने दूर बैठकर बिजली काट दी।कमरा फिर से अँधेरे में डूब गया।

 उसी अँधेरे में...एक धीमी लेकिन स्पष्ट ताली की आवाज़ गूँजी। तड़...तड़ फिर दूसरी और फिर एक आवाज़—"आख़िरकार...रत्न प्रताप  वापस आ ही गया।"तीनों ने एक साथ उसी दिशा में देखा।

तब अँधेरे से एक आदमी बाहर आया।उसने काला कोट पहना हुआ था। आधे चेहरे पर नकाब था ,लेकिन उसकी चाल...उसका कद...और उसकी आवाज़ सुनते ही रत्न प्रताप का चेहरा सफेद पड़ गया।

उन्होंने फुसफुसाकर कहा—"नहीं...तुम ज़िंदा नहीं हो सकते।"

नकाबपोश आदमी हल्का-सा हँसा,यही तो तुमसे सबसे बड़ी गलती हुई, रत्न प्रताप !"

"तुमने मेरी मौत पर विश्वास कर लिया...और मैंने तुम्हारी।"इतना कहकर उसने धीरे-धीरे अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी उँगली में वही पुरानी राजवीर परिवार की मुहर वाली अंगूठी थी...जो वर्षों पहले सिर्फ़ एक ही व्यक्ति पहनता था लेकिन वह अपना चेहरा अभी भी नहीं दिखाता तभी कमरे की बुझी हुई सारी मशालें एक-एक करके जलने लगीं।

लपटों की रोशनी धीरे-धीरे उसके चेहरे तक पहुँच रही थी...और ठीक उसी क्षण—पीछे का लोहे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया -धड़ाम!

तीनों समझ चुके थे—वे 'सभा कक्ष' में पहुँच चुके थे ,लेकिन अब...वे मेहमान नहीं...कैदी बन गए थे।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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