रत्न प्रताप राजवीर ,मोहिनी और भानू प्रताप ने, उस कक्ष में तीन नाम खुदे हुए देखे ,किन्तु तीसरा नाम हर बार की तरह ,मिटा हुआ था। जिससे उसको कोई पढ़ न सके इसीलिए खुरच दिया गया था। तब रत्न प्रताप चेतावनी देते हैं ,जिस दिन यह नाम पढ़ा गया उस दिन इस परिवार का इतिहास बदल जायेगा। तब वो तीनों उसी सुरंग के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। जैसे ही वो लोग आगे बढ़े , पत्थर की दीवार बंद होते ही चारों तरफ़ फिर वही गहरा सन्नाटा और अँधेरा छा गया ,हल्की सी रौशनी का एहसास भर था। वहाँ सिर्फ़ उन तीन लोगों की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी...
मोहिनी और भानु को ऐसा ही लग रहा था किन्तु रत्न प्रताप का अनुभव और उनकी आँखें कुछ और ही कह रही थीं ,वे अचानक वहीं रुक गए। उन्होंने अपना दायाँ हाथ उठाकर दोनों को आगे बढ़ने से रोक दिया।
"क्या हुआ?" भानु ने बहुत धीमे स्वर में पूछा।
रत्न प्रताप ने उत्तर नहीं दिया ,उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कुछ सेकंड तक वे बिना हिले खड़े रहे फिर बहुत ही धीमे स्वर में बोले—यहाँ हम तीन ही नहीं हैं...यहाँ कोई चौथा भी है।"
यह सुनकर मोहिनी का दिल अचानक जैसे धड़कना भूल गया ,उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की।
रत्न प्रताप ने उसका हाथ पकड़ लिया,और हाथ के इशारे से ''नहीं "कहा -घबराहट में इंसान यही सबसे बड़ी गलती कर बैठता है'' कि इंसान अंधेरे में देखने की कोशिश करता है...जबकि अंधेरा उसे पहले ही देख चुका होता है।"
भानु ने जेब से अपनी छोटी टॉर्च निकाली,"मैं रोशनी कर देता हूँ।"
बिल्कुल नहीं तीव्रता से रत्न प्रताप बोला - इस बार उसका स्वर पहले से अधिक कठोर था। अगर तुमने अभी रोशनी जलाई...तो उसे पता चल जाएगा, कि हम जानते हैं कि वो यहाँ है या फिर हम उसे ढूँढ़ रहे हैं और जिस आदमी को अपने पकड़े जाने का एहसास हो जाए...वो और भी खतरनाक हो जाता है।"
सुरंग इतनी संकरी थी, कि तीनों मुश्किल से साथ चल पा रहे थे ,दीवारों पर नमी जमी थी ,ऊपर से कहीं-कहीं मिट्टी झड़ रही थी। रत्न प्रताप सबसे आगे चल रहे थे और उनके पीछे मोहिनी और सबसे पीछे भानु था। भानु बार-बार पीछे देखने का प्रयास कर रहा था,इस समय वो अत्यधिक चौकन्ना था।
उसे ऐसा आभास हो रहा था...जैसे कोई उनकी चाल की बराबरी करते हुए चल रहा हो किन्तु हर बार पीछे सिर्फ़ काला अंधेरा दिखलाई देता।करीब पाँच मिनट तक वे बिना बोले चलते रहे।अचानक सुरंग दो हिस्सों में बँट गई। एक रास्ता नीचे उतर रहा था और दूसरा ऊपर की ओर जा रहा था। दीवार पर पुराने अक्षरों में लिखा था—"पूर्व मार्ग"और दूसरे पर—"सेवा मार्ग" रत्न प्रताप ने बिना सोचे ऊपर जाने वाला रास्ता चुना।
मोहिनी ने परेशान होते हुए पूछा - हम नीचे क्यों नहीं जा सकते ?"
रत्न प्रताप ने जवाब दिया ,क्योंकि नीचे...वे लोग हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे।"
वे ऊपर वाले रास्ते पर बढ़ ही रहे थे कि अचानक भानु रुक गया क्योंकि उसने वहां ऐसा कुछ देख लिया था जिसके कारण उसने रुकना उचित समझा।
ओफ्फो !अब यहाँ क्यों रुक गए ? झुंझलाकर मोहिनी ने पूछा।
भानु ने दीवार की तरफ इशारा किया ,मोहिनी भी रुक गयी ,उन्होंने देखा दीवार की दरार में कुछ चमकीला सा फंसा हुआ है,उसकी चमक के कारण भानु रुका था। वह थोड़ा झुका ,उस पत्थर की दरार में एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट फँसा हुआ था। उसने उसे बाहर निकालने का प्रयास किया,कुछ देर के पश्चात जब वो चाँदी का लॉकेट बाहर आया। तब उन्होंने देखा उस लॉकेट पर भी वही निशान बना था—दो साँप...लेकिन इस बार उनके बीच कोई अंक नहीं था।एक कमल का फूल बना हुआ था।
"रत्न प्रताप जी...! यह देखिये !"क्या आपने इसे पहले भी कहीं देखा है?"
उसे देखकर रत्न प्रताप जी तो जैसे पत्थर के हो गए ,उन्होंने काँपते हाथों से लॉकेट लिया। उनकी आँखें भर आईं और बोले -यह....यह तो...वे आगे कुछ बोल ही नहीं पाए।
मोहिनी ने धीरे से पूछा - क्या आप जानते हैं ,ये किसका है?"
रत्न प्रताप ने लॉकेट अपनी हथेली में कस लिया और बोले -जिसे मैंने तीस साल पहले खो दिया था,ये उसी का है। "
"किसे ? ?दोनों ने एक साथ पूछा।
कुछ पल की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा—अपनी छोटी बहन को,
मोहिनी और भानु दोनों चौंक गए ,क्या आपकी कोई बहन भी है ?
रत्न प्रताप ने 'हाँ 'में सिर हिलाया ,उसे सबने कहा था , कि वो हवेली छोड़कर भाग गई लेकिन...मुझे लगता है उन्होंने एक गहरी साँस ली और बोले - मुझे कभी इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ।"उन्होंने वो लॉकेट मोहिनी को दिखाया। यह मैंने उसके अठारहवें जन्मदिन पर उसे दिया था।"वो इसे कभी भी अपने से अलग नहीं करती थी।"
मोहिनी के मन में एक नया सवाल उठा -अगर लॉकेट यहाँ मिला है...तो क्या रत्न प्रताप की बहन भी कभी इस कारागार में लाई गई होगी ?
उसी समय...सुरंग में बहुत हल्की-सी खुशबू फैलने लगी।चंदन और चमेली की मिली-जुली सुगंध।
मोहिनी अचानक ठिठक गई और बोली - यह सुगंध कहाँ से आ रही है ?"
भानु ने, उसकी ओर देखा और पूछा -क्या हुआ?"
उसे जैसे कुछ स्मरण हुआ और वो बोल उठी ,हूबहू ऐसी गंध तो ...दादीसा के कमरे में आती है।"
रत्न प्रताप ने तुरंत चारों ओर देखा, उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया और बोले - यह खुशबू यहाँ नहीं आनी चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि...यह इस रास्ते का संकेत है।"
"कौन सा संकेत ?मोहिनी ने पूछा।
रत्न प्रताप ने धीमे स्वर में कहा—कि कोई हमसे पहले यहाँ से निकलकर जा चुका है।"
तीनों अब और सतर्क हो गए। कुछ ही दूर जाने पर सुरंग एक छोटे-से पत्थर के कक्ष में खुली,कमरे में सिर्फ़ एक लकड़ी की बेंच थी। दीवार पर एक पुराना आईना टँगा हुआ था और उसके नीचे...राख से भरी एक पीतल की थाली रखी थी।
रत्न प्रताप ने बेंच को ध्यान से देखा उस पर कोई धूल नहीं थी, यानी...यह जगह इस्तेमाल की जाती रही है ।
मोहिनी आईने के पास पहुँची किन्तु आईना धुंधला था ,उसने हाथ से उसकी धूल साफ़ की।अचानक...उसे लगा जैसे आईने में उसके पीछे कोई खड़ा है ,उसने झटके से पीछे देखा तो कोई नहीं था।
फिर उसने दोबारा आईने में देखा ,इस बार भी...पीछे एक धुँधली आकृति कुछ पल के लिए दिखाई दी।उसने घबराकर भानु का हाथ पकड़ लिया और बोली -"वहाँ कोई है!"
भानु तुरंत मुड़ा ,लेकिन कमरा तो खाली था।
रत्न प्रताप भी आईने के समीप पहुँचे ,उन्होंने आईने का किनारा हल्का सा दबाया। टक...की आवाज के साथ आईना धीरे-धीरे एक ओर घूम गया। उसके पीछे एक खोखला हिस्सा था।अंदर एक छोटी-सी धातु की डिबिया रखी थी। उस डिबिया पर भी धूल नहीं थी। रत्न प्रताप ने उसे उठाया,ढक्कन खोला ,उसमें अंदर एक कागज़ मोड़कर रखा हुआ था ,उन्होंने कागज़ बाहर निकाला। उस पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—"अगर रत्न प्रताप यह संदेश पढ़ रहा है... तो समझ लो मैं अब भी ज़िंदा हूँ।"
नीचे कोई नाम नहीं था लेकिन कागज़ के बिल्कुल नीचे...चंदन की वही हल्की-सी खुशबू थी...जो अभी कुछ देर पहले पूरी सुरंग में फैली थी।
रत्न प्रताप के हाथ काँपने लगे और उन्होंने बुदबुदाकर कहा—नहीं ...यह असंभव है।"
भानु ने पूछा -"क्या हुआ?"
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया,उन्होंने बस कागज़ को उलटकर देखा। पीछे लाल स्याही से एक नक्शा बना हुआ था।नक्शे के बीचों-बीच एक गोल निशान था...और उसके ऊपर लिखा था—"सभा कक्ष – आज रात।"
तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।अगर यह संदेश सच था...तो पहली बार उन्हें रक्षक मंडल की गुप्त सभा तक पहुँचने का मौका मिल सकता था लेकिन उन्हें यह नहीं पता था...कि यह निमंत्रण था...या फिर'' मौत का जाल।''
