Rasiya [part 143]

शिल्पा को जब पता चलता है कि चतुर के स्कूल में जो छात्र आते हैं ,उनमें से कुछ का 'मासिक शिक्षा शुल्क' आया ही नहीं है और कुछ छात्रों का शुल्क उनकी आर्थिक स्थिति के कारण या अन्य कारणों से लिया ही नहीं जाता। इस कारण अब शिक्षिकाओं को उनका वेतन समय पर नहीं दे पाएंगे। 

चतुर की परेशानी  को अब शिल्पा अपनी परेशानी समझती है ,तब वो सुझाव देती है, किन्तु चतुर कुछ और ही समझ बैठता है और जल्दबाज़ी में कहता है -  नहीं- नहीं आप ऐसा नहीं करेंगीं , आप भैया से कोई पैसे उधार नहीं लेंगीं। 


यह आपसे किसने कहा ? मैं उनसे पैसा उधार लूंगी, मैं तो यह कह रही हूं, अभी तक मैंने जो तीन- चार महीने में कमाया है। वो पैसे मेरे पास अभी भी हैं, इस महीने आप मेरा वेतन थोड़ा देर से दे दीजियेगा ,मैं संभाल लूँगी।

आपको तो मैं अच्छे से जानता हूँ। भइया ,का अच्छा कारोबार है ,आप तो संभाल लेंगी किन्तु अन्य अध्यापिकाओं का क्या होगा ?कपिला मैडम को तो बहुत जरूरत है। उनका वेतन तो उन्हें चाहिए ,कई ऐसी अध्यापिकाएं हैं जो मज़बूरी में, जरूरत के लिए काम कर रहीं हैं। 

हाँ ,ये बात तो सही है ,तब शिल्पा बोली - आपको कम से कम अभी कितने पैसे चाहिए ?

अब मैडम !आप रहने दीजिए ,ये हमारी समस्या है ,हम संभाल लेंगे। 

अच्छा ,अब मैं अब पराई हो गयी ,आपकी समस्या ,क्या अब मेरी समस्या नहीं है। वैसे आप मुझे बताइये !आपको कितने पैसे चाहिए ? 

कुछ देर चतुर चुप रहा ,तब कस्तूरी बोली -आप बता क्यों नहीं देते ? ये स्कूल हमारा ही नहीं, इनका भी तो है ,कहते हुए उसने चतुर की आँखों में झाँका। 

ठीक है ,जब आप इतना कह ही रही हैं ,तो बताता हूँ ,कम से कम बीस हज़ार इस समय मिल जाते तो मैं कुछ जरूरतमंद को उनका वेतन दे देता। 

फिलहाल के लिए' मैं' आपकी अपने वेतन से सहायता कर सकती हूं। अंदाजन मेरे पास बीस हज़ार होंगे,जब आपके आ जाएगें ,मुझे दे दीजियेगा। शिल्पा ने, बड़ी समझदारी दिखलाते हुए चतुर की समस्या का हल कर दी। 

देखा, मैं कह रही थी न... ये मैडम बहुत अच्छी हैं , हमारे स्कूल की उन्नति चाहती हैं, हमारी समस्या का समाधान यही निकाल लेंगीं।  अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है, कस्तूरी ने, चतुर को समझाया। 

तब ठीक है, अगर आपको कोई आपत्ति नहीं है, तो मैं पैसे ले लेता हूं, किंतु शीघ्र ही आपको आपके  पैसे वापस मिल जाएंगे। इस महीने में शायद आपका वेतन भी न दे पाऊं।

 कोई बात नहीं, सब जोड़ लीजिएगा और इकट्ठा करके दे दीजिएगा, शिल्पा मुस्कुराते हुए बोली।

देखा जाये तो, इसमें कोई बुराई भी नहीं थी ,इंसान ही इंसान के काम आता है किन्तु कुछ लोग सीख भी दे जाते हैं। फ़िलहाल तो हम कपिला से मिलने चलते हैं।  

स्कूल की दूसरी अध्यापिका' कपिला' भी एक औरत थी, वह शिल्पा और चतुर के हाव -भाव पर नजर रखे हुए थी और वह देख रही थी कि ये सर कुछ ज्यादा ही शिल्पा जी पर भरोसा करते हैं। फिर सोचा, मुझे क्या किंतु उसे लगा, मैं भी तो पढ़ी लिखी हूं , और इससे ज्यादा अच्छा पढ़ा लेती हूं तो फिर इसे ज्यादा महत्व  क्यों देते हैं ? इनमें इतना गहरा संबंध क्यों है ? इनके मध्य कहीं कुछ.... 

राम -राम ! मैं ये सब क्या सोच रही हूँ ? दोनों शादीशुदा हैं ,इनका अपना परिवार है ,किसी ने मेरी सोच को पढ़ लिया तो...लेने के देने पड़ जायेंगे। फिर सोचा,आजकल ज़माना बहुत बदल गया है ,जब किसी का चरित्र और नीयत ख़राब होते हैं ,तब वे उम्र और रिश्ता नहीं देखते। एक दिन कपिला को शिल्पा का वेतन भी पता चल गया तो उसे इस बात का दुःख हुआ कि इससे मेरा वेतन कम क्यों है ?

कभी -कभी कपिला को लगता ,मैं शिल्पा से बेहतर अध्यापिका हूँ ,फिर भी शिल्पा को अधिक महत्व देते हैं  बात कुछ अलग ही है किन्तु मुझे 'सर' से बात तो करनी ही होगी।

महीने की पांच तारीख़ तक सभी अध्यापिकाओं का वेतन मिल जाता था ,सभी अपने घर में हो रहे खर्चों के साथ -साथ, अपने आने वाले वेतन से हमें अपने घर की किस ज़िम्मेदारी को पूर्ण करना है ?बच्चों की या घर की किस आवश्यकता को पहले पूर्ण करना है ? यह तय करने लगती थीं। किन्तु अबकि छह तारीख भी हो गयी और सात भी आ गयी, किन्तु अभी तक वेतन के लिए किसी ने कुछ नहीं कहा।

 अध्यापिकाओं में आपस में कानाफूसी होने लगी। तब सभी ने मिलकर इसके लिए कपिला को चुना कि वो जाकर कहे -अबकि बार वेतन में देरी क्यों है ?जबकि कपिला तो पहले से ही नाराज़ चल रही थी, उसका वेतन पहले से ही कम है। 

ऐसा कुछ उन्हें करना नहीं पड़ा ,छुट्टी के पश्चात सभी को इकट्ठा बुलाया गया। खड़े होकर शिल्पा ने कहा -हम जानते हैं ,आप लोग अपने वेतन के लिए परेशान हो रही होंगीं और परेशान होना बनता भी है। दरअसल किसी कारणवश वेतन में देरी के कारण हमें खेद है किन्तु हमारा प्रयास रहेगा ,आपको कल तक आपका वेतन मिल जाये।  

मैडम !आप सही कह रहीं हैं ,हमारा वेतन जितना भी बनता है ,उसकी जरूरत तो हमें है ही... वो कहना कुछ और चाहती थी, कह कुछ और गयी। आज हम पूछने ही वाले थे। 

तभी तो हमने आप लोगों को इस' मंत्रणा' के लिए बुलाया गया है ,कपिला की तरफ देखकर बोली - वैसे इतनी देरी भी नहीं हुई है ,जो आप लोग शिकायत करें !हम लोग तो पांच तारीख तक सभी का वेतन दे देते हैं किन्तु कई जगह तो आठ से दस तारीख को वेतन मिलता है। 

शिल्पा जानती थी ,कपिला मुझे पसंद नहीं करती है। कई बार शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती ,कुछ चीजें हाव -भाव व्यवहार ऐसे होते हैं , बिन कहें ही दूसरे इंसान को एहसास करा देती है ,वो उसे पसंद करता है या नहीं। कहने को तो दोनों ही इस स्कूल की अध्यापिका हैं किन्तु ऐसा प्रतीत होता है ,उन दोनों के मध्य कोई आंतरिक युद्ध चल रहा है। लगता, जैसे दोनों ही प्रतिद्व्न्दी हैं क्योंकि अब कपिला को लगता वो भी शिल्पा से किसी तरह से भी कम नहीं है। 

शिल्पा ने, चतुर से पैसे देने के लिए कह तो दिया था किन्तु उसे अपने पति का ड़र था क्योंकि प्रवीण  उससे कहा था -तुम्हारे पास जो पैसे इकट्ठा हो रहे हैं ,उनको तुमने खर्चा तो नहीं किया। 

इस तरह अपने पति के मुख से ये वाक्य सुनकर शिल्पा हड़बड़ा गयी ,फिर बोली -खर्च भी किये तो क्या ?

कैसे खर्चा किया ? मैं तो तुम्हें पूरे पैसे दे रहा हूँ ,न... 

नहीं ,खर्चा नहीं किया है ,बात को संभालते हुए वो बोली। वैसे आज पैसों के लिए आप क्यों पूछ रहे हैं ?आपने आज तक तो नहीं पूछा। 

हाँ ,किन्तु हो सकता है ,मुझे एक -दो दिन में कुछ पैसों की ज़रूरत पड़ जाए ,तो तुमसे ले लूंगा ,हालाँकि ऐसी नौबत नहीं आएगी फिर भी पूछ रहा था। अचानक न जाने, कितने पैसों की जरूरत पड़ जाये ?व्यापार है ऊपर -नीचे चलता ही रहता है, कहकर प्रवीण तो सो गया किन्तु शिल्पा की नींद उड़ गयी। वो रातभर सोचती रही,मैंने तो चतुर को पैसे देने का वायदा किया था। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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