निर्मला और केतकी दोनों ,पवन के घर पहुंच गयीं। वही पवन, जो उनकी कक्षा में पढ़ता है और जो कल ही 'चाचा' बन गया। दोनों बच्चियों को देखकर पवन की मम्मी ने, उनसे पूछा -तुम्हारी मम्मी नहीं आईं , जो तुम्हें भेज दिया।
ताईजी ! हम तो छोटा बच्चा देखने आईं हैं। मम्मी ! तैयार हो रहीं हैं। तब केतकी,निर्मला से बोली - हमारी मम्मी भी आने वाली हैं, ये तो हमें पता ही नहीं था। हमें यहां देखकर गुस्सा होंगी, जल्दी से बताशे लेकर हम यहां से चलना चाहिए । यहाँ बच्चों का क्या काम ? बड़ी औरतें ही आती हैं , किन्तु गीत तो हम सुन ही सकते हैं।
क्या तुझे नहीं पता था ? कि ऐसे कामों में मम्मी आती हैं ,तू बेकार में ही मुझे यहां ले आई ,घबराकर निर्मला बोली।
चुपकर ! जब वे आएँगी, हम दूसरी तरफ से निकल जायेंगे।
क्या, तुझे पवन ने बुलाया था ?
नहीं ,उसने बताया था ,'वो' चाचा' बन गया। 'मैंने सोचा ,हम भी उसके घर जाकर मिठाई खाकर आ जाएंगे ।
निर्मला ने उसे घूरा और बोली -मैं तो अपने घर जा रही हूँ ,मेरा काम भी पूरा नहीं हुआ।
न जाने, केतकी क्या सोच रही थी ? उसने निर्मला की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया। महिलाओं में खूब हंसी- मजाक चल रहा था जच्चा गाई जा रही थी ,नाच -गाना चल रहा था। केतकी उस कार्यक्रम का भरपूर आनंद उठा रही थी। कुछ देर बाद सबको बताशे मिले ,केतकी ने तुरंत ही आगे बढ़कर बताशे हाथों में ले लिए। तब उसने निर्मला को अपनी और खींचा और बोली -ताईजी ! इसे भी बताशे दे दो ! उन्होंने कुछ बताशे निर्मला के हाथ पर भी रक्खे। आजा ,चल !कहते हुए उस भीड़ से निकल कर बाहर आ गयी।
दोनों मीठे बताशों को खाते हुए अपने घर की तरफ बढ़ चलीं।
तब निर्मला ने जो महसूस किया ,तब उसने केतकी से पूछा - क्या तेरा अपने घर में जाने का,रहने का मन नहीं करता ?
तभी केतकी ने निर्मला का हाथ खींचा और दूसरी गली में ले गयी। देख !कुछ औरतें आ रही हैं ,इनमें तेरी और मेरी मम्मी भी हैं।
जब वे महिलाएं आगे निकल गयीं ,तब केतकी एक गहरी स्वांस लेते हुए बोली -अच्छा है ,एक दो घंटे से पहले नहीं आएँगी। चल, हम भी घूमते हैं।
नहीं ,अब मैं घर जाकर अपना काम करूँगी।तूने मेरे सवाल का जबाब नहीं दिया।
सवाल का जबाब पाना है, तो मेरे साथ चल ! कहीं अच्छी सी जगह बैठते हैं ,कहते हुए आगे बढ़ चली। तब एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठी। तब निर्मला से बोली -घर जाकर क्या करना है ?मेरा घर में मन ही नहीं लगता ,मैं बाहर की दुनिया देखना चाहती हूँ। खुली हवा में साँस लेना चाहती हूँ। मेरा बस चले तो सारी दुनिया घूम आऊं किन्तु घर में जाकर ऐसा लगता है ,जैसे मैं उस जगह में क़ैद हो गयी हूँ। क्या हमारी दुनिया इतनी छोटी सी है ?कुछ देर घर में भी रहो !तो घर डांट पड़ती है ,तेरे नंबर कम क्यों हैं ?तू फेल कैसे हो गयी ?
अब तू बता ! क्या जबरदस्ती है ? पढ़ना ही क्यों है ?बाहर घूमकर भी तो दुनिया देखी जा सकती है। अरे !फेल होने का भी कोई कारण होता है। मैं पढ़ी ही नहीं, तभी तो फेल हो गयी। जब मुझे पढ़ना ही नहीं है।
पढ़ेगी ,तभी तो आगे बढ़ पायेगी ,मेरी मम्मी तो कह रहीं थीं -अच्छा लड़का भी, तभी मिलेगा।
तो क्या हम अच्छे लड़के से ब्याहने के लिए पढ़ रहीं हैं ? बुद्धू !यदि लड़का अच्छा होगा तो वो हमसे प्यार करेगा और हमें घुमायेगा -फिरायेगा। इस बात का पढ़ाई से क्या मतलब ?
तेरे भेजे में तो बात घुसती ही नहीं है ,न जाने कौन सी दुनिया में जीती है ? अच्छे लड़के पढ़ी -लिखी लड़की ढूंढते हैं ,समझी ,तेरे जैसी कामचोर को नहीं ढूंढेंगे।
काम ,काम ,काम जब देखो ! तुझे काम करने की पड़ी रहती है। अच्छा बता ! इतना पढ़कर कहाँ जाएगी ? कुछ नहीं होगा। घरवाले विवाह कर देंगे ,और वहां जाकर चूल्हे पर रोटी ही बनानी है। वो लड़का अच्छा हो या बुरा ! तू देखती नहीं ,मेरी मम्मी और तेरी मम्मी क्या काम करती हैं ? तूने उन्हें कभी घूमते हुए देखा है।
अभी गयी तो हैं ,वे अपना घर संभालती हैं। वे घूमेंगी ,तो तू क्या घर के सारे काम कर लेगी ?
तभी तो कह रही हूँ ,ब्याह के बाद रोटी बनाने का काम ही रह जाता है। तू चाहे कितनी भी पढ़ ले ?बनानी तुझे रोटी ही हैं। अपने मुँह में एक बताशा डालते हुए ,केतकी ने मस्ती में पूछा -अच्छा बता !अगर तू पढ़ - लिख गयी तो कैसी रोटी बनाएगी ? पढ़ी -लिखी रोटी ! जो खाने की थाली में आते ही ,बोलेगी -'अ से अनार ,आ से आम !कहकर अपनी कल्पना पर ही हंसी और बोली - या फिर कहेगी ! मुझे खाना मत ! गोल रोटी बनाएगी या चौकोर !कहते हुए हंसने लगी।
केतकी की बातें सुनकर अब निर्मला को भी लग रहा था ,ये ठीक ही तो कह रही है। पढ़कर भी क्या हो जायेगा ? रोटी ही तो बनानी हैं।सारा दिन स्कूल के काम की चिंता बनी रहती है। कुछ सोचकर बोली -पढेंगी तभी तो शहर का अच्छा लड़का मिलेगा।
क्या, तू उस लड़के के लिए पढ़ रही है ? जिसे तू जानती ही नहीं ,फिर तुझे कैसे पता ?वो अच्छा ही होगा ,शराब पीने वाला हुआ तो .... वो अपनी पढ़ाई भी भूल जायेगा ,कहकर जोर -ज़ोर से हंसने लगी।
निर्मला को लगा ,ये कितना जानती है ,कितनी समझदार है ?सही तो कह रही है ,हमारी दुनिया कितनी छोटी है ?मैं तो पढ़ती भी हूँ किन्तु ये बातें तो मेरे मन में भी नहीं आईं।
उनकी सीमित दुनिया है,जहाँ सारा दिन माता -पिता अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रात -दिन परिश्रम करते हैं ,बेटियों को इसलिए पढ़ा रहे थे। थोड़ा पढ़- लिख जाएँगी ,तो ढंग की जगह इनका ब्याह करके निश्चिन्त हो जायेंगे। आजकल लड़के कम से कम आठवीं -दसवीं पास लड़की तो मांगते ही हैं, किन्तु केतकी की एक अलग ही सोच है ,वो घूमने -फिरने की शौक़ीन है ,उसने बाहरी दुनिया नहीं देखी है।
तब भी उसके सपने बहुत बड़े -बड़े हैं। उसे फ़िल्म देखने का चस्का जो चढ़ा है।वहीं से वो अपनी कल्पनाओं को उड़ान देने लगी है। अभी गांव में दो ही टेलीविजन हैं ,वो भी दहेज़ में आये हुए हैं। हर रविवार को फ़िल्म आती है। गांव के आधे -आधे लोग बंट जाते हैं ,केतकी सबसे पहले जाकर सबसे आगे अपनी जगह सुरक्षित कर लेती है।
निर्मला! तू कैसे लड़के से ब्याह करेगी ?
धत ! मुझे क्या पता ?वो तो पापा ढूंढेंगे।
तू कोई ''दूध पीती बच्ची है '',तूने हिंदी के पाठ में पढ़ा नहीं ,'सीता स्वयंवर ''सीता जी ने भी तो 'राम 'को अपने लिए चुना था। मैं भी अपनी पसंद से ही ब्याह करूंगी ,जो मुझसे रोटी न बनवाये और मुझे खूब प्यार करे।
चल ! तू तो बड़ी बेशर्म है ,अपने ब्याह के लिए कोई ऐसा कहता है।
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