खिले- खिले चेहरों की जिज्ञासाएं हैं ,कब हुईं पूर्ण !
पथ की नित नई बाधाओं से, मंजिलें रहतीं अपूर्ण !
स्वप्न हैं , कुछ मुक़म्मल हुए , कुछ रह गए अपूर्ण !
कभी आसमाँ, कभी जमीं मिली ,मिला न जहाँ पूर्ण।
कभी अश्रु बहे ,कभी प्यार की उम्मीदें ! रहीं अपूर्ण।
कभी तक़रार तो, कभी शिक़वे जो हुए , कभी न पूर्ण।
धन मिला, लालसा बढ़ी , बढ़ती जिज्ञासाएं रहीं अपूर्ण।
हंसी तेरी,मुस्कुराहटों को, वेदना ने, कब होने दिया पूर्ण ?
तुम, हम से मिले ,जज़्बात न मिल सके प्रीत रही अपूर्ण।
कोई कंगाल है तो कोई अमीर है , क़िस्मत से रहे अपूर्ण।
कोई विचार से तो, कोई व्यवहार से, मानव रहा अपूर्ण।
कोई योगी तो कोई भोगी ,उनका भी जहाँ रहा अपूर्ण।
नर बिन नारी अपूर्ण , नारी बिन नर,साँस बिन रूह अपूर्ण !
शिव से शक्ति मिले ,साथ जब दोनों मिलें, जीवन हो पूर्ण।
भाव है ,विचार हैं ,आशंकाओं से घिरे चेहरा न हुआ कभी पूर्ण।
वायु बिन जीवन ,कंटक बिन पुष्प,चाँद बिन चांदनी होते अपूर्ण।
