Jo manga vo kahan mila ?

उम्मीदों ने बहुत रुलाया ,तमन्नाएं भी थीं ,बहुत, 

हाथ आते-आते छूट जाता,वो हमारे सब्र का पैमाना था। 

मांगने पर' भीख़' भी नहीं ,जो चाहा वो भी न मिला। 

उम्मीदों के दिए जला ,चलता रहा अंगारों पर, कैसा ? दीवाना था। 


अपेक्षाओं के पुष्प खिला, बढ़ते रहे मंज़िल की ओर , 

छूने को आसमान ,कंटको की परवाह न कर,जग से अनजाना था।  

चाहतों की पोटली ढोते रहे ,जो सोचा ,जो माँगा, कहाँ मिला ?

जीवन गुजरता रहा ,मंजिल करीब न थी, दुनिया से वो बेग़ाना था।  

उन अपेक्षाओं को लिए , अंधी दौड़ में शामिल हम भी थे। 

अनुभव बढ़ते रहे , सीख़ मिलती रही, जलता रहा ऐसा वो परवाना था। 

 दुःख बढ़ते गए ,झूठे सपनों की तलाश में, स्व को छलते रहे। 

अश्रु मिले ,वेदना मिली , कुछ सिसकियाँ ! जो माँगा, वो न मिला। 

कुछ शिक़वे -शिकायतें रहीं , कुछ'' उससे'' कुछ अपनों से ,

विश्वास की इक ड़ोर बनी ,तड़पने को बस जीवन का  वरदान मिला। 

पीछे पलटकर जो देखा ,जो चाहा ,वो कहाँ मिला ?

उम्मीदें मिलीं ,अपेक्षाएं बढ़ीं , न पाया स्व को, हाथ ! ख़ाली मिला।  

भटकता रहा, इस संसार में ,जो चाहा ,वो न मिला। 

धैर्य मिला ,सब्र मिला , तन्हाई मिली , माँगा नहीं ,जो चाहा वो न मिला।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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