उम्मीदों ने बहुत रुलाया ,तमन्नाएं भी थीं ,बहुत,
हाथ आते-आते छूट जाता,वो हमारे सब्र का पैमाना था।
मांगने पर' भीख़' भी नहीं ,जो चाहा वो भी न मिला।
उम्मीदों के दिए जला ,चलता रहा अंगारों पर, कैसा ? दीवाना था।
अपेक्षाओं के पुष्प खिला, बढ़ते रहे मंज़िल की ओर ,
छूने को आसमान ,कंटको की परवाह न कर,जग से अनजाना था।
चाहतों की पोटली ढोते रहे ,जो सोचा ,जो माँगा, कहाँ मिला ?
जीवन गुजरता रहा ,मंजिल करीब न थी, दुनिया से वो बेग़ाना था।
उन अपेक्षाओं को लिए , अंधी दौड़ में शामिल हम भी थे।
अनुभव बढ़ते रहे , सीख़ मिलती रही, जलता रहा ऐसा वो परवाना था।
दुःख बढ़ते गए ,झूठे सपनों की तलाश में, स्व को छलते रहे।
अश्रु मिले ,वेदना मिली , कुछ सिसकियाँ ! जो माँगा, वो न मिला।
कुछ शिक़वे -शिकायतें रहीं , कुछ'' उससे'' कुछ अपनों से ,
विश्वास की इक ड़ोर बनी ,तड़पने को बस जीवन का वरदान मिला।
पीछे पलटकर जो देखा ,जो चाहा ,वो कहाँ मिला ?
उम्मीदें मिलीं ,अपेक्षाएं बढ़ीं , न पाया स्व को, हाथ ! ख़ाली मिला।
भटकता रहा, इस संसार में ,जो चाहा ,वो न मिला।
धैर्य मिला ,सब्र मिला , तन्हाई मिली , माँगा नहीं ,जो चाहा वो न मिला।
