Shaitani sa......2

माली से डांट खाकर,' निर्मला,' जब आम के  बग़ीचे से बाहर आई ,वो अपमान और केतकी के दिए धोखे से  तिलमिलाई हुई थी। उसने उन खेतों के आस -पास देखा। ' प्रेम' तो दूर एक खेत के किनारे पर खड़ी हुई थी। उसे देखते ही निर्मला को क्रोध आया, और उसकी तरफ बढ़ चली, मन में तो आ रहा था, इसे खूब ''खरी -खोटी सुनाऊँ '', उसके नजदीक जाकर देखा, तो प्रेम वहां खड़ी मुस्कुरा रही थी।

 तुझे ,बड़ी हंसी सूझ रही है, चोरी तूने की और फंसा मुझे दिया ,क्रोध से उसे घूरते हुए निर्मला बोली। 


 

मैंने चोरी कहां की ? मैंने तो मेहनत से फल तोड़े हैं , यह बात अलग है, कि वे आम, हमारे बाग़ के नहीं थे।

तूने,कौन सा परिश्रम किया  ?

क्या पेड़ पर चढ़कर आम तोडना परिश्रम नहीं है ?

 वे आम तेरे बाग़ के थे ? तू तो उन्हें इस अधिकार से तोड़ रही थी , घूरते हुए निर्मला ने पूछा। 

 हमारे तो बाग़ ही नहीं है,पगली ! तो फल कहां से तोड़ेंगे ? हँसते हुए प्रेम ने कहा -यदि हमारे  यहां बाग होता तो तुझे भी आराम से बहुत सारे आम तोड़ने देती,भौंहे मटकाते हुए 'प्रेम' ने जबाब दिया।  

केतकी ! देख, मुझे इन बातों से मत फुसला, 'मुझे' तुझ पर बहुत गुस्सा आ रहा है। तूने चाचा के यहाँ का एक आम भी नहीं लेने दिया। क्या तूने तीनों आम खा लिए ?ललचाई नजरों से उसकी तरफ देखते हुए निर्मला ने पूछा। शायद उसे अभी भी उम्मीद थी ,ये मेरे लिए एक आम तो छोड़ ही देगी। 

नहीं, दूसरा खा रही हूं ,लापरवाही से प्रेम बोली। 

मैं डांट खाऊं और तू आम खाए , ऐसा नहीं हो सकता, ला... एक आम मुझे भी दे ! कहते हुए प्रेम की तरफ झपटी ,उसे लग रहा था ,जब मैंने डांट खाई है ,तो एक आम पर मेरा भी अधिकार बनता है। 

तूने भी तो चाचा से मेरी शिकायत की थी।  वह तो उन्हें ,मैं दिखलाई नहीं दी, नहीं तो चाचा मुझे भी डांट लगाते। चल ! तू भी क्या याद करेगी ? किस रईस से पाला पड़ा है ? यह आम तू ले ले ! प्रेम ने ज़िंदादिली दिखानी चाही। 

उसको  इस तरह एहसान दिखाते हुए ,आम देना निर्मला को अच्छा नहीं लगा ,और बोली - नहीं, मुझे कोई आम नहीं लेना है ,अपना आम तू ही खा ले ! नाराज होते हुए निर्मला आगे बढ़ गई। उसके पीछे -पीछे आते हुए प्रेम बोली सुन तो....कहाँ चली ? इसमें मेरी कोई गलती नहीं ,जब तुझे ही पेड़ पर चढ़ना नहीं आता तो मैं क्या कर सकती हूँ ?  कहते हुए ,प्रेम अपने घर की ओर बढ़ चली।

 न... न.... आप अभी  जाइएगा नहीं , अब हम आपका परिचय 'प्रेम' के दूसरे नाम से भी करवाते हैं।  क्या आपने ध्यान नहीं दिया था, निर्मला  बार-बार' प्रेम' को ' केतकी' कह रही थी। दरअसल बात यह है,' प्रेम' नाम उसके घर वालों ने बड़े ही' प्रेम'' से रखा था। किंतु' प्रेम' को अपना यह नाम बहुत पुराना लग रहा था इसलिए उसने, अपना नाम स्कूल के रजिस्टर में' केतकी' रखवा दिया था। उसे उसकी सभी सहेलियां 'केतकी'  के नाम से ही पुकारती हैं।

 प्रेम भी, अपने नए नाम से प्रसन्न है ,अपने इसी नाम को पुकारने के लिए कहती है।' प्रेम' नाम तो सिर्फ नाम का ही है , जिसे  घर वाले ही बोलते हैं। कभी-कभी तो घर वालों से भी यह नाम सुनकर' केतकी'  चिढ़ जाती है इसलिए आगे से हम एक ही नाम  से कहानी को आगे बढ़ाएंगे।

 ध्यान से इस क़िरदार को पढ़िए ! जो अनेक रिश्तों से होता हुआ ,सास के रिश्ते तक पहुंच जाता है। इस चरित्र को पढ़कर आप 'सास 'नामक रिश्ते के साथ न्याय कर पाएंगे। सास ग़लत ही क्यों होती हैं ?या फिर क्या हर सास ही ग़लत होती है, ये रिश्ता इतना बदनाम क्यों है ? 

निर्मला अपने कमरे में चारपाई पर लेटी हुई थी, और अपना गृहकार्य कर रही थी, दोनों ही सहेलियां छठी कक्षा में पढ़ रहीं  हैं । तभी केतकी, उसके घर पहुंच गई, उसने अच्छा सा सूट पहना हुआ था और निर्मला के समीप जाकर  बोली -क्या तुझे आज, पवन के यहां नहीं जाना है। 

उसे देखकर निर्मला को उसकी हरक़तें स्मरण हो आईं किन्तु अब वो उसके घर आई है ,बात तो करनी ही है क्यों ,उनके यहां क्या हो रहा है ?

अरे, तुझे पता नहीं है,' पवन' चाचा बन गया ,उसके यहां गीत गाए जा रहे हैं। मैं तो जा रही हूं, तू भी चल !अपनी चुन्नी संभालते हुए केतकी बोली। उसका उद्देश्य निर्मला को अपना नया सूट दिखाना भी था। 

मैं वहां जाकर क्या करूंगी ? मेरा तो अभी तक गृह कार्य भी पूर्ण नहीं हुआ।उदास स्वर में निर्मला ने जबाब दिया।  

केतकी उसके समीप आकर बैठ गई और बोली - तू, पढ़कर ही क्या कर लेगी ?कहते हुए उसकी किताब उठाकर , बंद करके बराबर में रख दीं। वैसे निर्मला अभी भी केतकी से नाराज थी किंतु केतकी  पर इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसे जो कार्य करना था, वह उसने कर लिया। बाकी वह आगे जिंदगी में आगे बढ़ चली। 

किसी पर उसके व्यवहार से, किसी के दिल पर क्या फर्क पड़ता है ?उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है। नहीं।

 मैं ,नहीं जा रही, निर्मला ने मुँह बनाते हुए कहा। उसे अध्यापिका और घरवाले दोनों का ड़र था।  

ठीक है, मत जा ! कहते हुए केतकी ने कंधे उचकाये और आगे बढ़ चली। तब जाते-जाते बोली -तुझे पता है, आज उनके यहां खाने को बताशे भी मिलेंगे और भी बहुत सारा सामान खाने को मिलेगा। अब तेरी मर्जी तुझे जाना हो, तो चल ! नहीं जाना हो तो, मत जा !

निर्मला ने कुछ देर सोचा और बोली -तू, ठहर ! मैं अभी आती हूं। कहते हुए, उसने अपनी किताबें रखी और उसके साथ जाने के लिए खड़ी हो गईं  और तैयार होने लगी।

 तैयार होकर जब वो बाहर आई ,तब निर्मला की माँ ने पूछा - कहाँ जा रही है ?

केतकी के साथ जा रही हूँ ,निर्मला झट से बोली। 

वो तो ठीक है, किन्तु जा कहाँ रही है ?

ये ले जा रही है ,निर्मला को मालूम था ,माँ डाँटेगी। 

तूने स्कूल का काम कर लिया। 

चाची ! इसने काम कर लिया है ,बस थोड़ा सा ही रह गया है ,वो आकर कर लेगी ,हमें देर हो रही है ,कहते हुए निर्मला का हाथ खींचा और बाहर की तरफ तेजी से निकल गयी।

तू जानती है , मेरे घर में मुझे डांट पड़ेगी। 

कुछ नहीं होगा ,तू डरती बहुत है। जब घर जाएगी ,चुपचाप काम कर लेना किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। 

तेरा गृहकार्य हो गया ?

नहीं ,आगे बढ़ते हुए केतकी बोली -उस मैडम से तो तब भी डांट  पड़ेगी ,चाहे मैं कितना भी अच्छा लिख लूँ ?इसलिए काम करके क्या हो जायेगा ?वो तो रोज़ ही डांटती है ,कल और सही कहकर हंसने लगी। 

निर्मला सोच रही थी ,ये डांट भी खाती है फिर भी मजे से घूमती है ,क्या इस पर किसी बात का कोई असर नहीं होता ? कुछ देर के पश्चात, दोनों उस घर में पहुंची ,जहां पर पहले से ही ढोलक की ताल पर गीत गाए जा रहे थे। दोनों को बच्चियाँ समझकर, उन्हें बैठने के लिए जगह दे दी गई ।

ए लड़कियों ! तुम्हारी माँ न आई , जो तुम दोनों को भेज दिया ,पवन की मम्मी ने पूछा।  


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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