गर्मी की स्वर्णिम रवि किरणों ने,आँचल अपना फैलाया है।
गर्मी ने , मानव जीवन से तालमेल, कितना बिठलाया है ?
प्रातः की मनमोहक धूप ,बचपन सा उजियारा लाया है।
चमक रही धरती जैसे,बालपन में नई उमंगों का साया है।
मुस्काई धरा ! मंडराते भँवरे !कोकिला ने गीत सुनाया है।
चमक सूर्य की , चंचल बालक सा देख ! जल लहराया है।
अमराई महक रही ,उपवन में, बुलबुल ने गान सुनाया है।
चमक बढ़ी जब जीवन की, रवि ने, स्व का ताप बढ़ाया है।
कहता सूर्य ! बढ़ती गर्मी में ,संघर्ष बढ़ा हर युवा भरमाया है।
कठिन परिश्रम ,सह गर्मी का ताप ,जीवन सुनहरा बनाया है।
ढलते सूरज की सुनहरी धूप में ,जीव -जंतु, हर दिल हर्षाया है।
दुपहर का ताप सहन किया,जीवन में उसी ने उल्लास पाया है।
दिनभर की थकन से , थककर अब जीवन में सुकून आया है।
सुनहरे गर्मी के दिनों ने,जीवन को नव रूप- रंग दिखलाया है।
