Sunahare garmi ke din

गर्मी की स्वर्णिम रवि किरणों ने,आँचल अपना फैलाया है। 

गर्मी ने , मानव जीवन से तालमेल, कितना बिठलाया है ? 

प्रातः की मनमोहक धूप ,बचपन सा  उजियारा लाया है।

चमक रही धरती जैसे,बालपन में नई उमंगों का साया है। 


मुस्काई धरा ! मंडराते भँवरे !कोकिला ने गीत सुनाया है। 

चमक सूर्य की , चंचल बालक सा देख ! जल लहराया है।

अमराई महक रही ,उपवन में,  बुलबुल ने गान सुनाया है। 

चमक बढ़ी जब जीवन की, रवि ने, स्व का ताप बढ़ाया है। 

कहता सूर्य ! बढ़ती गर्मी में ,संघर्ष बढ़ा हर युवा भरमाया है। 

कठिन परिश्रम ,सह गर्मी का ताप ,जीवन सुनहरा बनाया है। 

ढलते सूरज की सुनहरी धूप में ,जीव -जंतु, हर दिल हर्षाया है। 

दुपहर का ताप सहन किया,जीवन में उसी ने उल्लास पाया है। 

दिनभर की थकन से , थककर अब जीवन में सुकून आया है।

सुनहरे गर्मी के दिनों ने,जीवन को नव रूप- रंग दिखलाया है।    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post