सुमित अग्रवाल ,चतुर का घर देखकर अपने घर वापस जाने के लिए, उसके घर से बाहर निकले ही थे ,तभी चतुर ने अपने घर का मुख्य द्वार बंद कर लिया। अब तक चतुर हमेशा उनके साथ रहता था। आज भी उसने,उनके साथ चलने के लिए कहा। तब उन्होंने ,उसे अपने साथ चलने से इंकार कर दिया। तब चतुर उन्हें मुख्य द्वार तक छोड़कर वापस चला गया।
हालाँकि ये उनका अपना निर्णय था किन्तु चतुर के इस तरह उन्हें छोड़कर जाने के कारण ,वो अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे। अब तक उनके कोई भी निर्णय लेने के पश्चात भी, वो उनके साथ रहता था। उनके न मानने पर ,उनकी पत्नी से कहता, किन्तु आज का व्यवहार उनके मान को तोड़ गया। ऐसा लग रहा था ,जैसे वो इसी बात की प्रतीक्षा में था उनकी सहमति मिलते ही उसने, उनके मुँह पर ही दरवाज़ा बंद कर दिया।
यह मेरे साथ क्या हुआ ? मैंने जिंदगी भर इतना पैसा कमाया , क्या इसके लिए ? जब उसने दरवाजा बंद किया ,तब उन्हें लगा ,ये अब तक झूठ बोलकर जो औपचारिकता निभाता आ रहा था ,वो भी अब कब की समाप्त हो गई ?
वो चाहती थी ,वो उसे सब बताएं कि वो चतुर के साथ क्यों और कहाँ गए थे ?किन्तु वे तो चुपचाप सोने के लिए जाने लगे,विवश हो ,उसने ही पूछा - आपने कुछ बताया नहीं।
वे ,करवट बदलकर बोले -क्या बताना था ?
आप चतुर के साथ कहाँ और क्यों गए थे ?वहां क्या हुआ ?
क्या बताऊं ? अपने अरमानों की लाश अपने कांधे पर ढ़ो रहा हूँ ,बेइज्जती का तमाचा खाकर आ रहा हूँ।
हुआ क्या ?आपको, जब मैंने पहले ही बता दिया था -कि वो क्या कर रहा है ?आप फिर भी उससे मुस्कुराकर बातें कर रहे थे। आपने तभी उसे घर से बाहर निकल जाने के लिए क्यों नहीं कहा ?उसे धक्के मारकर क्यों नहीं भगा दिया ?
तुम्हें क्या लगता है ? क्या मैं ऐसा कर सकता था ?या मुझे करना चाहिए था ,निराश स्वर में बोले -उसने मेरे साथ आज ही विश्वासघात नहीं किया ,वो कई सालों से मेरे साथ विश्वासघात कर रहा है ,जिसमें तुम्हारा भी योगदान रहा है। वो मेरे घर की इज्ज़त से खेल रहा है। क्या मैं आज तक कुछ कर पाया ?नहीं न.... अभी क्या हो जायेगा ? उसने थोड़ा पैसा ही तो लिया है ,वो तो मैं और भी कमा सकता हूँ, क्या तुम मेरी इज्ज़त वापस ला सकती हो ?
तुमने कभी ऐतराज़ नहीं किया ,कभी ये नहीं कहा ,उससे मत मिलो !
मेरे कहने से क्या हो जाता ? क्या तुम मान जातीं ? मेरे रोकने पर भी न समझतीं तो, मेरा क्या रह जाता ? तुम मेरी पत्नी हो ,मैंने तुम पर कभी बंधन नहीं लगाया । कभी पति होने के अधिकार को ज़बरन नहीं जतलाया न ही थोपा। मैंने सोचा था -'तुम भले ही मेरी पत्नी हो किन्तु मैं समझता था ,तुम भी एक इंसान हो ,तुम्हारी भी एक अलग पहचान है। इस तरह अपनी इज्ज़त ,मान -सम्मान को तुम्हें ही तो संभालना था। इंसान को अपने चरित्र की ,उसे स्वयं उसकी रक्षा करनी होती है। तुम्हारा मान -सम्मान मेरे मान -सम्मान के साथ जुड़ा है। जो तुमने एक बार नहीं न जाने कितनी बार तोडा ?
तुमने मुझे कभी समझा ही नहीं ,तुम मेरा दर्द क्या समझोगी ? तुमसे मिलकर जब वो मेरी तरफ मुस्कुराता था। मेरे सीने पर सांप लौटते थे ,ऐसा लगता था ,जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो। तब क्या मुझे, उन चंद टुकड़ों के लिए उससे लड़ना चाहिए था। वे पैसे जो मैंने, तुम्हारी ख़ुशी के लिए उसे दे दिए , मेरे लिए तुमसे ज़्यादा क्या वो ,मूल्यवान हैं ?
उनकी बातें सुनकर अंजलि बिखर गयी और मन ही मन उसे पछतावा हुआ ,उसने ऐसे सच्चे और अच्छे आदमी के साथ क्या कर डाला ?आज उसकी आँखों में पछतावे के आंसू थे। मैंने अपने जीवन को स्वयं ही कलंकित कर डाला। ये सब कुछ जानते हैं ,कायदे से तो इन्हें ही , मुझे घर से बाहर कर देना चाहिए था। और कोई इंसान होता तो ऐसा ही करता ? अंजलि की कोई आवाज़ न सुनकर उन्होंने पलटकर देखा। उसकी आँखों में आंसू थे।
तुम क्यों रो रही हो ? तुम्हारी आँखों में आंसू न आएं इसीलिए मैंने ,तुमसे कभी कुछ नहीं कहा। आज किसलिए ? पैसे जाने का ग़म है या इज्ज़त ! मैं कमज़ोर नहीं हूँ किन्तु अब उस धन का क्या लाभ ? कम से कम उसका घर तो बस रहा है। जहाँ उसकी एक पत्नी है ,जो उससे बहुत प्यार करती है ,उसके तीन बच्चे हैं ,जो उसे पिता का मान देते हैं। मैंने ये सब किसलिए किया ? मुझे तो समझ ही नहीं आया ,मैं क्यों और किसके लिए जी रहा हूँ ? कहते हुए उनकी आँखों में आंसू आ गए।
मन ही मन आज अंजलि को उनके आंसू अंदर तक तोड़ गए। उसने मन ही मन निश्चय किया ,जो मैंने किया उसकी सज़ा तो मुझे मिलेगी ही किन्तु अब मैं,अब उसे भी चैन से नहीं रहने दूंगी। उसने मुझे ही नहीं,इन्हें भी धोखा दिया है। इन्होंने, मेरे कहने पर ही तो उसे पैसे दिए थे। वास्तव में , इनकी असली गुनहगार तो मैं ही हूँ ,मैंने ही अपने पति सम्मान को ठेस पहुंचाई है। ईश्वर ! मुझे, कभी क्षमा नहीं करेगा, सोचकर वो चुपचाप अपनी पलकें मूंदकर लेट गयी। उसके पास अब पश्चाताप के सिवा कुछ न था।
एक दिन जब चतुर के घर में हवन हो रहा था ,घर पूर्ण होने के पश्चात उसने घर को अच्छे से सजवाया था और बहुत सारे मेहमानों को बुलवाया। आज उसने, अपने माननीय भइया -भाभी को भी बुलवा लिया,''दर्द देकर जख़्मों पर नमक छिड़कना, तो कोई उससे सीखे'' ,जबकि वो जानता था। ये सब देखकर अंजलि नाराज होगी, उसने, उनसे झूठ बोला ,छल किया।
अब उसे किसका ड़र था ? अंजलि यदि उससे पूछेगी कि तुमने हमसे झूठ क्यों बोला ?या फिर इतना पैसा उसके पास कहाँ से आया ? तो मुझे क्या ? अब वो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी ।
वो हवन के समीप बैठकर पूजा में व्यस्त था। तभी अचानक उसके घर पुलिस की गाड़ी आकर रुकी ,और चतुर से कहा -आपको हमारे साथ चलना होगा।
पूजा का कार्य हो जाने दीजिये ,तब हम बात करते हैं। उसने उन पुलिसवालों से कहा।
ठीक है ,आप पूजा कीजिये !किन्तु अब किसी का भी पूजा में ध्यान नहीं था। वहां उपस्थित मेहमान ,मौहल्लेवाले ,भइया -भाभी पुलिस को देखकर सोच में पड़ गए, आखिर इसने क्या किया है ? सबसे ज़्यादा आश्चर्य तो तब हुआ। वो जो पुलिस वाला था ,वो उसी का मित्र निकला। वह भी चतुर का घर, उसके ठाठ-बाट देखकर आश्चर्य चकित रह गया।
पूजा के पश्चात ,चतुर ने लोगों को आश्वस्त किया और बोला -आप सभी लोग प्रसाद गृहण करें ,परेशानी की कोई बात नहीं है ,ये मेरा बचपन का मित्र है।
