चतुर से वो महिला नाराज़ थी और जब उसने अपने पति को बताया- कि चतुर ने, हमें कितना बड़ा धोखा दिया है ?
जब चतुर आता है ,तब वे उससे बातें करते हैं ,तब अंजलि छुपकर उनकी बातें सुनती है। उसने सोचा था- ,अब तो इन्हें इस पर क्रोध आएगा ही आएगा किन्तु उनके हाव-भाव, व्यवहार को देखकर, वह सोच रही थी -अब मैं ,इनसे क्या कहूं ? क्रोध में आकर अब तक इन्हें ,इसे घर से बाहर निकाल देना चाहिए था और ये इससे कितने आराम से बातें कर रहे हैं ? मैं, इस आदमी को कभी समझ नहीं पाई। यह मेरे लायक था, ही नहीं , न जाने कितने विचार कितने 'अपशब्द' कितनी बातें उनकी पत्नी के मन में आईं।
उसके जी में तो आया,वो इसे घर से बाहर निकाल कर ,उन्हें भी खूब भला- बुरा सुनाएं और इसे तो धक्के मारकर घर से बाहर ही कर दे ! न जाने, क्या सोच कर रुक गई ? तब उसने देखा- वे चतुर के साथ बाहर जा रहे हैं ,उसे कुछ भी समझ नहीं आया ,कहाँ जा रहे हैं ? कुछ बताया भी नहीं ...
जब वे चतुर के घर पहुंचे, बच्चे बाहर ही खेल रहे थे , उस स्थान पर जगह-जगह बालू रेत , मिट्टी , औजार वगैरह पड़े हुए थे। शायद मिस्त्री भी काम करके जा चुके थे। एक बड़ा सा मुख्य द्वार बना हुआ था, उसके अंदर प्रवेश करके पहुंचे तो, चतुर अपना घर दिखाने लगा,जो अभी भी अधूरा था। उसने बताया -यहां इस जगह पर हम बगीचा बनाएंगे, और यह बहुत बड़ा सा हाल है और यह तहखाना है। जहां पर हमारा काम चलेगा। यहाँ ऊपर मैं बच्चों की पढ़ाई के लिए कमरा बनवाऊंगा। ये रसोई और ये सोने के लिए स्थान ! थोड़ी सी जगह ठीक करके बच्चों को यहीं ले आया हूँ। ताकि यहाँ की देखभाल भी होती रहे और हमारा किराया भी बच जाये। वो यह दिखला देना चाहता था ,वो कितनी समझदारी से और बचत करके आगे बढ़ रहा है ?
तभी अंदर से एक बहुत आदमक़द महिला आती दिखलाई देतीं हैं ,उसे देखकर ,चतुर ने बताया -ये हमारी माताजी हैं ,कल ही गांव से आईं हैं।
अपनी माता जी से उनका परिचय कराया -ये, हमारे बड़े भाई हैं ,जो भी है ,सब इन्हीं की मेहरबानी से हुआ है। अब तक इन्होंने ही मुझे संभाला है। राम -रहीम करके वो महिला बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गयीं।
तब वो एक अलग ही स्थान पर ले गया और उसने बताया -ये जगह ऑफिस के लिए....
ऑफिस ! किस लिए ?चौंककर उन्होंने पूछा।
अब कुछ ना कुछ तो करना ही होगा , मैं सोच रहा हूं, एक स्कूल खोलूंगा ताकि घर के घर में ही काम भी चलता रहे। वो ये सब उन्हें इसीलिए दिखा रहा था ,उसे लगता था ,ये कुछ नहीं कर पाएंगे। चतुर उनकी पत्नी से डरता था इसीलिए उससे कुछ कहने के लिए, उसने मना किया था ।
वो समझ गए ,इसने हमारा पैसा तो हड़पा ही है ,साथ ही अपने पैसे कमाने की भावी योजनायें बनाये बैठा है। अच्छा विचार है, कहते हुए वे आगे बढ़े।
कुछ देर में एक दुबली- पतली सी गोरी महिला उनके सामने आती है , तब चतुर ने उन्हें बताया -यह मेरी पत्नी कस्तूरी है। कुछ देर बाद उसने अपने बच्चों को आवाज़ लगाई, और उन्हें बारी -बारी से बड़े भइया से मिलवाया। सुमित जी ने बड़ी शालीनता और सहजता से उन बच्चों से बातें कीं और अपने जेब से निकालकर उन्हें एक -एक चॉकलेट भी दी। चतुर की पत्नी को एक थैली पकड़ा दी ,जिसमें कुछ फ़ल थे।
भइया ! ये सब क्यों ?भावुक होकर चतुर ने पूछा।
बच्चे हैं ,उनसे पहली बार मिल रहा हूँ ,इतना तो बनता ही है। जब इनके बाप के लिए किया तो बच्चों के लिए क्यों नहीं ?
यह सब देखकर चतुर को बहुत अच्छा लगा , तब चतुर ने अपने परिवार के लोगों को बताया - आप , मेरे बड़े भैया हैं ! मैं इनके यहीं रहता था , इन्होंने कभी मुझे अपना नौकर नहीं समझा,छोटे भाई जैसा प्यार दिया , घर के सदस्य की तरह ही समझा। मैं इनका बहुत मान करता हूं, कहते हुए उसने, अपने बच्चों से कहा - अपने ताऊजी के पैर छूओ !
मन ही मन वे सोच रहे थे, जिंदगी भी अजीब पहेली है ,' दोस्ती के चोले में दुश्मन है, सम्मान कर रहा है,'वो सम्मान उन्हें जैसे 'मुँह चिढ़ा रहा है। ''जब तक ये मुझे अपना दोस्त समझ रहा है। इसे, मुझसे कोई ड़र नहीं है। ये निश्चिन्त होकर मेरे साथ खड़ा है। वे उस घर को देख रहे थे। यदि इसके मन में कोई खोट नहीं था तो अपने हिस्से से मकान बनवा लेता ,इतनी बड़ी हवेली बनवाने का क्या प्रयोजन था ?
मेरी पत्नी ,मेरी सम्पत्ति, सबको अपने अधिकार में ले लिया ,सोचकर उनका मन कसैला हो गया। दुनिया में यही तो होता आया है।'' जो जितना झुकता है ,सरल है ,अपने व्यवहार से लोग उसे इतना मजबूर क्यों कर देते हैं ? कि वो अपनी प्रकृति के विरुद्ध कार्य करे ! सरल जीवन किसी को पसंद ही नहीं है।'' लूट -खसौट करके ज़िंदगी जीना चाहते हैं। कहने वाले तो कह देते हैं।' सम्पत्ति आनी -जानी माया है। 'जब इतना ज्ञान है ,तब परिश्रम करके क्यों नहीं कमाते ? क्या किसी के मौन को उसकी कमज़ोरी समझ लेते हैं या फिर उसे मुर्ख़ समझने की गलती कर बैठते हैं ?
उन्होंने, अपने बच्चो के साथ बैठे चतुर की तरफ देखा ,ये कितना खुश है ,दूसरे का ज़िंदगी भर का कमाया पैसा लूटकर भी इसके चेहरे पर प्रसन्नता कैसे हो सकती है ? अपनी गलती पर इसे तनिक भी पछतावा नहीं है। न जाने, इसका अभी हमसे और क्या लालच हो सकता है ?
जब से इसने मेरे घर में क़दम रक्खा था ,तब से झूठ ही झूठ बोल रहा था, मेरे घर को लूटता रहा और आज मैं इसके इस घर [सोचते हुए, उन्होंने उस घर को देखा। जो मेरी ज़िंदगी भर की कमाई की बुनियाद पर टिका है। अपने बच्चों के साथ अन्याय करके, इसके बच्चों के सामने झूठी प्रसन्नता लिए बैठा हूं। मुझे गुस्सा आना चाहिए, ऐसे में कोई और होता तो गोली मार देता किंतु मैंने ऐसा नहीं किया।
अभी वो यह सब सोच ही रहे थे, तभी चतुर की पत्नी उनके लिए थाली में भोजन ले आई , बड़े मान- सम्मान के साथ दोनों ने भोजन किया। हालांकि मकान अधूरा बना हुआ था किंतु अब वह बस गया था। उस घर में बच्चों की किलकारियां ,भोजन की खुशबू ,एक अन्नपूर्णा की मुस्कान,एक माँ के जीवनभर के सपने बस गयें हैं। रहने वाले तो उस अधूरे मकान में ही रहने लगे थे और अच्छे मकान की कल्पना में खुश हो रहे थे।
चतुर की योजनाएं तो अच्छी थीं , किंतु इसे यह पैसा अपनी मेहनत के बल पर कमाना चाहिए था। न कि चोरी करके .... भोजन करने के पश्चात तब वे बोले- अच्छा, अब मैं चलता हूं। तुम्हारे परिवार से मिलकर बहुत अच्छा लगा।
चलिए ! भैया मैं भी आपके साथ चलता हूं। उन्होंने एक नजर उसकी तरफ देखा, इसके मुख से शहद जैसी वाणी अभी भी टपक रही है।
नहीं, अब इस औपचारिकता की जरूरत नहीं है , जब तक हमें नहीं मालूम था- कि तुम्हारा अपना घर परिवार है, तो तुम घर में आते थे। अब जब तुम्हारा अपना परिवार है, बच्चे हैं तो तुम यहीं पर रहो ! मैं अपने आप चला जाऊंगा। कहते हुए आगे बढ़े , चतुर उनके साथ मुख्य द्वार तक गया। उनके जाते ही चतुर में तुरंत में दरवाजा लगा दिया।
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