Shaitani sa......5

केतकी, भोजन करके हाथ धोने के लिए नल पर गयी थी ,वहां भी उसे अपने पिता के स्वर सुनाई दे रहे थे - अब और नहीं, अब मैंने सोच लिया है ,अगर यह नहीं पढेगी, तो इसे खेती के कामों में लगा दूंगा। जब काम करेगी, तब इसे पता चलेगा, हमें कितनी मेहनत से,कितने परिश्रम से रोजी-रोटी कमानी पड़ती है ? तब इसे अक़्ल आएगी। इसे खेतों में काम करने के लिए भेज दूंगा। 

ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ? ये अभी बच्ची ही तो है ,अभी तो मैंने, इसे घर के कामों में भी नहीं लगाया है।सोच रही थी ,थोड़ा पढ़ -लिखकर ही आगे निकल जाये। 

  घर के कामों के लिए तुम हो न... 


इसके भाई हैं ,उनसे कहिये ! इसे समझाएं !

कहना क्या है ? वो पढ़ाई कर रहे हैं, उनका ध्यान क्यों भड़काना ?ये तो उनका ध्यान भी भटका देगी ,कहेगी -पढ़कर क्या करोगे ? कमाना ही तो है , खेती करो ! मस्त रहो ! 

उनकी बातें सुनकर ,वो उनकी तरफ देखने लगीं। 

इस तरह क्या देख रही हो ? तुम क्या समझती हो ? मुझे कुछ पता नहीं है।अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी बातें बनाने लगी है।  यदि तुम्हारे बेटों में से किसी ने भी ऐसी हरक़त की होती तो अभी तक मेरे साथ काम में लग गए होते। 

उनकी बातें सुनते -सुनते केतकी अपने कमरे में चली गई थी और न चाहते हुए भी किताबें उठाकर अपने सामने रख लीं। हिंदी की क़िताब उठाई ,'सूरदास की पदावली' अध्यापिका ने पढ़कर आने के लिए कहा था। वो उसे पढ़ तो रही थी किन्तु समझ कुछ नहीं आ रहा था। उसमें ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया था ,पढ़ते -पढ़ते सोचने लगी -ये इन्होने क्यों लिखा ?अध्यापिका तो कह रही थी -'कि ये अंधे थे, फिर इन्होंने कैसे लिखा होगा ? सोचकर उसने अपनी आँखें बंद कीं किन्तु उसकी आँखों के सामने उसे अँधेरे के सिवा कुछ नज़र न आया।

तब हल्की सी आँखें खोलकर कलम उठाती है और फिर से आँखें बंद करके कॉपी के पन्ने पर लिखने का प्रयास करती है। किन्तु जब आँखें खोलकर देखा शब्द लिखे तो किन्तु तिरछे ,कुछ इधर -उधर हो गए।  

ये सब गलत है ,वो अंधे होकर कैसे लिख सकते हैं ? अब उन्होंने लिख भी दिया तो मैं क्यों ये सब याद करूं ? लिखा उन्होंने मुसीबत मेरी... उठाकर किताब बंद करके रख दी और गणित की क़िताब निकाली। जोड़ -घटाव ,गुणा -भाग ये तो सब मुझे आते हैं। सब्ज़ी वाले से जब मम्मी सब्ज़ी खरीदती हैं ,मैं ही हिसाब लगाकर मम्मी को बताती हूँ इसके कितने पैसे बनते हैं ? फिर ये बटे के सवाल क्यों ? इन लोगों को कोई काम नहीं ,इनकी जरूरत ही नहीं है, फिर भी गणित पढ़ो ! 

उसने एक नजर' बीजगणित' पर डाली ,उसे घूरा मान लो ! ये किताब मेरे पास है ही नहीं ,बुदबुदाते हुए उसने झट से वो किताब बस्ते के हवाले की और अपनी फुर्ती पर मन ही मन मुस्कुराई। हर सवाल में मान लो ! मैंने भी मान लिया,ये किताब मेरे पास है ही नहीं, कहकर उसने अपने हाथ उठाकर सर के पीछे लगाए और एक बड़ी सी जम्हाई ली।   

तभी माँ ने केतकी को आवाज़ लगाई -  प्रेम ! आजा, बेटा ! तेरा दूध का गिलास रखा है ,अपना दूध पी ले ! 

मन ही मन गुस्से से, केतकी बुदबुदाई - पता नहीं, यह कौन से पुराने जमाने का मेरा नाम रखा है ? प्रेम ! प्रेम ! नाम रख दिया है किंतु किसी को भी मुझसे प्रेम नहीं है। जहां देखो, जब देखो ! हर कोई डांटता रहता है। मुँह फुलाये हुए बाहर आई ,बाहर आकर उसने इधर -उधर देखा ,पिता कहीं नजर नहीं आ रहे थे। शायद चले गए ,ये सोचकर उसने एक गहरी स्वाँस ली। तब पूछा -मम्मी , पापा गए। 

हाँ ,वो तो चले गए ,किन्तु वो तेरे लिए कितना परेशां थे ? तू क्यों ऐसी हरक़तें करती है ?आज किसके बाग़ में गयी थी ?

किसी के भी नहीं,कहते हुए उसने दूध का गिलास उठाया। वैसे, उनसे क्या किसी ने मेरी शिकायत की है ?

की ही होगी ,तभी तो बता रहे थे। 

माली ने तो  निर्मला को पकड़ा था ,मैं तो उसे मिली भी नहीं ,फिर उसने मेरी शिकायत कैसे की ?

उसे सोचते हुए देखकर ,माँ ने कहा -इसका मतलब है ,वो सही कह रहे थे ,तू ऐसी हरक़तें क्यों करती है ? तू ये मत भूल !तू एक लड़की है ,तुझे अगले घर भी जाना है। 

अगले घर जाना है ,दाँत पीसते हुए वाक्य दोहराया ,बोली -अगले घर जाना है ,तो क्या मैं जीना छोड़ दूँ ?कहकर वो,  दूध गटागट पी गयी और चुपचाप अंदर चली गई।

कहाँ जा रही है ?इधर तो आ ! जाते -जाते केतकी रुक गयी। अच्छा ये बता ! यदि तेरे पापा ने नाराज होकर तुझसे ,खेती का काम करवाया तो क्या तुझे अच्छा लगेगा ? तेरे भाई ,तेरी सहेली सब पढ़ते हैं। पास भी होते हैं। तू क्यों नहीं पढ़ती ?

पढ़ती तो हूँ ,मम्मी वो अध्यापिका ही ऐसी है ,मुझसे चिढ़ी रहती है। ऐसे सवाल देगी ,जो मुझे आते ही नहीं। 

फिर तुझे कौन से सवाल आते हैं। तेरा 'प्रश्न पत्र 'क्या वो अलग से बनाती हैं और भी तो उन्हीं सवालों के जबाब देकर आते हैं। 

पता नहीं ,दिमाग़ पर जोर लगाते हुए बोली -मुझे लगता है ,वो उन्हें प्रश्न पहले ही बता देती होगी। तभी मैं कहूँ केशव अपने खेतों की सब्जी मैडम जी के यहाँ क्यूँ ले जा रहा है ? एक दिन तो दिनेश को भी, मैंने गन्ने ले जाते  देखा था। तभी मैं सोचूं, ये सब पास कैसे हो रहे हैं ? गोबर- मिटटी से लिपी जमीन को अँगुलियों  से कुरेदते हुए बोली। 

माँ ,अपने सभी बच्चों को देखती ,जानती और समझती है। हंसकर बोली -तू दिमाग़ पर ज्यादा जोर मत दे !ख़र्च हो जायेगा। बस तू पढ़ाई कर.... तेरी उस अध्यापिका को तो हम देख लेंगे। 

अब तो मुझे बहुत जोरों की नींद आ रही है ,मेरी अध्यापिका ने कहा है - सुबह को उठकर पढ़ना अच्छा रहता है। जल्दी याद भी रहता है ,सुबह को उठकर पढ़ लूंगी ,मुझे जल्दी जगा देना ! कहकर अंदर चली गयी। 

क्या करें ? इस लड़की का.... इसे पढ़ाना चाहते हैं तो ये पढ़ना ही नहीं चाहती।

 इसके पिता ने दोनों बड़ी बेटियों को नहीं पढ़ाया ,जबकि वो दोनों पढ़ना चाहती थीं। सोलह बरस की होते ही उनका ब्याह कर दिया। चिट्ठी -पत्री तो वो भी लिख लेतीं हैं। घर के काम सभी काम भी कर लेती हैं, किंतु उन्हें आए दिन अपने पतियों से कुछ न कुछ ताने सुनने को मिल ही जाते हैं। वह भी, बेचारी क्या करतीं   ?हमने कभी उनकी पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं दिया। सोचा था ,पढ़कर क्या करेंगी  ? अगले घर ही तो जाएंगी, इन्हें घर संभालना आना चाहिए ।

 किन्तु उनकी शिक़ायतें सुनकर तो अब हमें भी लगने लगा था,'' बेटियों के लिए शिक्षा भी आवश्यक है।'' तब  हमने सोचा - इसे, उन दोनों से  ज्यादा पढ़ाएंगे किन्तु ये पढ़ना नहीं चाहती। हठी इतनी है, किसी की भी सुनती नहीं। मैंने कितनी बार समझाया ,अपनी बहनों की हालत देख !आज वे परेशान हैं। 

तब कहती है - 'अपने कर्मों से परेशान हैं ,सारा दिन जीजाओं के पीछे लगी रहतीं हैं। जैसे उनके बिना इनका जीवन दूभर हो जायेगा। 

बताओ !अभी से कैसी बातें करती है ?' भला, पति के बिना भी कोई जीवन है।' न जाने, ये क्या करके बैठेगी ? 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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