Rasiya [part 130]

 अभी वे लोग बातें  कर ही रहे थे,कि चतुर ने, उनके साथ कैसी चालबाज़ी खेली है ? तभी दरवाजे की घंटी बजी ,शायद वो आ गया ,उस महिला ने कहा।  तब तक नौकर ने दरवाजा खोल दिया था।

 वो सीधा घर में घुस आया। पहले से ही ऐसे ही आता था। भइया -भाभी क्या हो रहा है ?आइये !गर्मागर्म ज़लेबी लाया हूँ ,भाभी को बहुत पसंद आओ ! खा लो !

उस समय उस महिला का चेहरा उदास था ,मन में गुस्सा भी भरा था ,उसका चेहरा देखकर चतुर को शक़ हुआ ,पूछा -भइया ! क्या हुआ ?क्या आज फिर से आप दोनों में झगड़ा हो गया ?


नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है ,तुम तो जानते ही हो ,ये कितनी ज़िद्दी हैं ,छोटी -छोटी बातों पर नाराज़ हो जाती हैं। 

तभी तो इनके लिए जलेबी लाया हूँ ,इन्हें खाएंगी तो मूड़ तरोताज़ा हो जायेगा। 

मुझे कोई ज़लेबी नहीं खानी, कहकर वो अपने कमरे में चली गयी। 

लगता है ,आज भाभी ! का मूड़ कुछ  ज्यादा ही ख़राब है। अंदर ही अंदर घबरा रहा था इन्हें कहीं कुछ पता तो नहीं चल गया ,बड़ी चालक औरत है। 

चलो ! तुम जाने दो ! थोड़ी देर आराम करेंगी, तो ठीक हो जायेंगीं। आओ ! हम  हॉल में बैठकर जलेबियाँ खाते हैं। 

भइया ! आप खाइये !मैं, भाभी को मनाकर लाता हूँ। उसे विश्वास था ,हर बार की तरह वो जब उनके बालों से खेलेगा उनके क़रीब बैठेगा वो धीरे -धीरे पिघल जाएगी। 

 किन्तु उसके पतिदेव जानते थे। वो क्रोधित तो चतुर से ही हैं। कहीं ये न हो , वे क्रोध में आकर कुछ उल्टा -सीधा न कर दे ,अभी इसके पास हमारा पैसा भी फंसा हुआ है। तब वे चतुर से बोले - तुम यहाँ आकर बैठो ! उन्हें अकेले रहने दो ! कुछ देर आराम करेंगी ,तो मन शांत हो जायेगा। 

चतुर वापस आकर ,उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया और उन पूछा -आख़िर भाभी नाराज़ क्यों हैं ?

दरअसल ये और मैं घूमने के लिए गए थे ,वहां इन्हें एक सोने का सेट पसंद आ गया। बोलीं - 'ये सेट दिलवा दीजिये !' तुम तो जानते ही हो ,इतना पैसा अब हमारे पास नहीं है। 

भइया ! वो सेट कितने का था ? चतुर ने सोचा दस -बीस हजार का हुआ तो मैं ही दिलवाकर बात को रफ़ा -दफ़ा करवा दूंगा और मैं फिर से उनका विश्वास जीत सकूंगा। 

वो सेट 'एक लाख' का था ,तब मैंने कहा -दिलवा देंगे ,अभी थोड़ा हाथ तंग है। तुम तो जानते ही हो ,इन्हें जो चीज पसंद आ गयी ,हट करके बैठ जाती हैं। हार लेकर ही मानेंगीं। 

उनकी बात सुनकर,चतुर एकदम शांत हो गया ,अंदर ही अंदर उसे घबराहट थी। कहीं इन्होंने पैसे मांग लिए तो कहाँ से लेकर दूंगा ? सारा पैसा तो घर में लगा दिया ,अभी तो और भी चाहिए। कहाँ से लाकर दूंगा ? यदि मैंने अपने पैसों में से निकालकर दे भी दिया तो घर का काम रुक जायेगा। 

क्या सोच रहे हो ? उन्होंने चतुर के चेहरे पर आते- जाते भावों को देखकर पूछा। 

कुछ नहीं ,ऐसे समय में भाभी को ऐसी मांग नहीं रखनी चाहिए थी। 

कैसे समय में ?उन्होंने पूछा। 

तब चतुर को अपनी गलती का एहसास हुआ और अपनी बात को बदलते हुए बोला -मेरा मतलब है ,ऐसे समय में ,जब हमारा पैसा उस ज़मीन में फंसा हुआ है। 

हाँ ,वो तो मैं भी कह ही रहा था ,अब तुम बताओ ! अब तक कुछ काम आगे बढ़ा ,कितने प्लॉट बिक चुके ,भई ! मेरा तो सारा पैसा वहीं अटका हुआ है। मेरे पास एक भी पैसा नहीं और तुम इन्हें तो जानते ही हो। अगर ये अपनी ज़िद पर आ गयीं तो वहीं पहुंच जाएँगी। 

हम्म्म्म !ये बात तो चतुर अच्छे से जानता है ,ये अगर गुस्से में आ गयीं तो मुझे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। उसके चेहरे पर परेशानी स्पष्ट झलक रही थी। तब चतुर के हमदर्द बनकर वो बोले -क्या कोई बात है ? कुछ परेशान दिख रहे हो। ये तो आज उस ज़मीन पर जाने वालीं थीं किन्तु मैंने रोक दिया और कहा। चतुर आ जायेगा ,उसके साथ चली जाना। तब जाकर रुकीं। 

अब तो चतुर बुरी तरह घबरा गया ,यदि भाभी को पता चल गया तो मुझे छोड़ेगी, नही.....इनके क्रोध के सामने तो इनके बच्चे और पति, इनमें से कोई नहीं बोलता। अभी मुझ पर विश्वास करती हैं ,उन्हें जैसे ही पता चलेगा ,मैंने उनका विश्वास तोडा है ,मुझे घर से बाहर करने में कोई देरी नहीं करेंगी। मुझे धोखाधड़ी के केस में जेल भी भिजवा सकती हैं। तब उसे अपने सामने बैठे ,वो भइया ही नज़र आये ,जो उनके कोप से उसे बचा सकते थे। 

तब चतुर एकदम जमीन पर घुटनों के बल आ गया और उनसे बोला -भइया !मुझे बचा लो ! मुझसे एक बहुत बड़ी गड़बड़ हो गयी।

 वो तो पहले से ही जानते थे कि इसने क्या किया है ? अनजान बनते हुए  बोले -तुमने ऐसी कौन सी गड़बड़ कर दी ?

दरअसल भइया ,चार प्लाट तो बिक़े हैं एक को अभी भी छुपा गया। 

फिर  तुमने हमें क्यों नहीं बताया ?तब उसने इधर -उधर  देखा और बोला -क्या बताता, किस मुँह से बताता ? कि वो पैसे मैंने खर्च कर दिए। 

किस काम में ? चार प्लाट भी गए तो' चालीस लाख 'रुपया तुमने कहाँ लगा दिया ?उन्होंने धैर्य से पूछा। 

दरअसल हुआ यूँ ,गांव में मकान बन रहा था ,पिताजी ने पैसे मांगे तो मुझे देने पड़े। 

क्या बात कर रहे हो ? आश्चर्य से उन्होंने पूछा -गांव में इतना रुपया कौन लगाता है ? तुम तो अनाथ थे ,फिर ये पिता कहाँ से आ गए ? 

वह भैया ऐसा है, मैंने भाभी के कारण झूठ बोला था। 

क्या उसने, तुम्हें झूठ बोलने पर विवश किया था ? यह क्या बात हुई ? यदि तुम मुझसे सच कहते तो क्या हो जाता ?

उस समय मुझे पैसे की सख्त जरूरत थी, और भाभी किसी ऐसे इंसान को चाहती थी, तो ज्यादा से ज्यादा वक्त उन्हें दे सके इसीलिए मैंने उनसे झूठ बोल दिया-कि मैं अनाथ हूं ?

 इतना बड़ा झूठा कौन बोलता है ? जीते जी तुमने अपने माता-पिता को मार दिया और गांव में यदि तुम्हारे पिता ने पैसे मांग भी लिए थे तो गांव में 40 लाख रुपया लगाकर कौन मकान बनाता है ? दरअसल भैया बात यह है कि मेरे पिता ने बहुत वर्षों पहले एक जमीन यहां पर खरीदी हुई थी उस जमीन पर अब उन्होंने अपना कार्य आरंभ कर दिया है और हमारे रहने के लिए मकान भी बनवा रहे हैं। 

क्या वह जानते हैं तुम हमारे साथ रहते हो। 

नहीं,

फिर तुम क्या वहां जाकर अकेले रहोगे ? इस प्रश्न पर चतुर की आंखें नजरें नीचे झुक गई और बोला -भैया आप मेरी कसम खाओ! आप नाराज तो नहीं होंगे। मैं भला तुमसे नाराज क्यों होगा ?तुमने कौन सा गलती की है ? यदि की है ,तो उसका परिणाम तो तुम्हें भुगतना ही होगा। 

यदि आप मेरी कसम खाते हैं और यह बात भाभी को ना बताएं तो मैं आपको बताता हूं। 

हां, क्या बात है ? बताओ !

दरअसल में पहले से ही शादीशुदा हूं। मेरा 18 वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया था किंतु मुझे कमाने के लिए बाहर आना था इसलिए बीवी -बच्चों को गांव में ही छोड़कर बाहर आ गया था। किंतु अब पिताजी जोर दे रहे हैं कि अपने बीबी -बच्चों को अपने साथ ले जा ! इसीलिए मैंने सोचा क्यों ना एक छोटा सा मकान बना लिया जाए। बच्चे कहां किराए पर  धक्के खाते रहेंगे ? वो बहुत ही घबराया हुआ था। उसने नज़र उठाकर देखा। वो शांत थे। 

तब उन्होंने अपना पैतरा बदला और बोले -यह तो अच्छी बात है। तुम्हारा अपना परिवार है। तुम्हारे कितने बच्चे हैं ?

तीन ,शरमाते हुए बोला। 

तुम तो बड़े' छुपे रुस्तम' निकले। हमें कहते रहे -तुम्हारा हमारे सिवा कोई नहीं।  


 

 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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