Shahar ki roshniyan

रात के अंधेरे में चमचमाती रोेशनी कितनी अच्छी लगती है ?' मुंबई 'शहर महानगरी है, रोे शनी से झील मिला रही है इसकी चकाचौंध  सबको अपनी ओर आकर्षित करती है। ऊँची-ऊँची इमारतों की खिड़कियों से झाँकती रोशनियाँ मानो आसमान के तारों को चुनौती दे रही हैं । हर तरफ भागती गाड़ियाँ, हॉर्न की आवाज़ें और लोगों की भीड़ थी। लेकिन इस भीड़ में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह अकेले होते हैं।ऐसा ही अक़ेलापन कपिल भी महसूस कर रहा है। 

कपिल अपने गाँव से ढेर सारे सपने लेकर शहर आया था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहस्थी में व्यस्त रहती ,समय मिल जाने पर सिलाई करके घर चलाने में मदद करती थीं। उनके परिश्रम को देखकर अक़्सर कपिल कहता -बाबा ! मैं शहर जाऊंगा और ढेर सारा पैसा कमाकर लाऊंगा। फिर आपको इतने परिश्रम की  आवश्यकता नहीं होगी। कभी हमारा ये गांव भी रौशनी से जगमगायेगा। उसकी ऐसी सोच देखकर  परिवार ने अपनी जमा-पूँजी लगाकर उसे शहर भेजा ताकि वह कुछ बन सके और अपने परिवार का भविष्य बदल सके।


शुरुआत में शहर उसे किसी जादुई दुनिया जैसा लगा। रात में जगमगाती सड़कें, बड़े-बड़े मॉल, ऊँची -ऊँची इमारतें और हर चेहरे पर व्यस्तता। लेकिन कुछ ही महीनों में उसे समझ आ गया कि शहर की रोशनियाँ जितनी सुंदर दूर से दिखती हैं, उनके बीच ज़िंदगी इतनी आसान नहीं होती।

शहर की महंगाई और खर्चे देखकर कपिल ने सोचा -यदि यहाँ रहना है तो काम करना होगा। तब उसने एक जगह नौकरी कर ली।  दिन में  कंपनी में काम करता और रात को पढ़ाई करता। उसका वेतन भी  इतना  नहीं था कि वह आराम से रह सके। वह एक छोटे से कमरे में तीन अन्य लड़कों के साथ रहता था। कमरे में एक पंखा था, जो गर्मियों में भी गर्म हवा ही देता था।

एक रात ऑफिस से लौटते समय वह मेट्रो स्टेशन के बाहर बैठा था। जेब में केवल सौ रुपये बचे थे और महीने के अभी दस दिन बाकी थे। वह सोच रहा था कि आखिर कब उसकी ज़िंदगी बदलेगी ? इस तरह तो उसके पूरे नहीं होंगे। दूर खड़ी इमारतें उसे जैसे चिढ़ा रही थीं। 

तभी उसकी नज़र एक बुज़ुर्ग महिला पर पड़ी।महिला सड़क किनारे फूल बेच रही थी। उम्र लगभग साठ साल की रही होगी। ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उनके पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था।

कपिल ने देखा, कि लोग उनके पास से गुजर रहे थे, लेकिन कोई फूल नहीं खरीद रहा था।खरीदेंगे भी कैसे ?ये सब प्रेम , ख़ाली समय में और शांति के लिए खरीदे जाते हैं। उसने अपने आस -पास देखा ,सभी इतने व्यस्त थे ,इधर से उधर  आ जा रहे थे। किसी को फुरसत ही कहाँ थी ?जो तनिक रुककर उन अम्मा को भी देखे या उनकी परेशानी समझे। 

बस वही अपनी परेशानियों को पता नहीं क्यों, लिए बैठा था। कहते हैं ,न.. दिल से दिल को राहत होती है वह उनके पास चला गया।

"अम्मा !फूल  कितने के हैं ?" उसने पूछा।

महिला मुस्कुराईं ,"बेटा, दस रुपये का एक गुलाब है।"

कपिल ने बीस रुपये निकालकर दो गुलाब खरीद लिए ताकि  वो भूखी न रहें। 

महिला ने उसे आशीर्वाद दिया, और बोली -"भगवान तुम्हारे सारे सपने पूरे करे।"आज मेरी बोहनी भी नहीं हुई किसी ने एक भी फूल नहीं खरीदा। यह एक साधारण-सी बात थी, लेकिन उस दिन के बाद से कपिल  रोज़ उस महिला से मिलने लगा।

धीरे-धीरे उसे पता चला कि उनका नाम शांति देवी था। उनका कोई अपना नहीं था। पति कई साल पहले गुजर चुके थे और बेटा एक दुर्घटना में दुनिया छोड़ गया था। अब वे अकेले फूल बेचकर अपना गुज़ारा करती थीं।

एक दिन कपिल  ने पूछा, "माँ जी, आप इतनी उम्र में भी काम क्यों करती हैं?"

शांति देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, जब तक साँस है, तब तक आस है।"कमाऊंगी नहीं तो क्या खाऊँगी ?भीख तो नहीं मांग सकती। 

उनकी यह बात आरव के दिल में उतर गई।वह जब भी निराश होता, शांति देवी की बातें उसे हिम्मत देतीं।समय बीतता गया।

एक दिन अचानक शांति देवी अपनी जगह पर नहीं दिखीं।कपिल को चिंता हुई।अगले दिन भी वे नहीं आईं।

तीसरे दिन कपिल ने आसपास पूछताछ की। तब उसे पता चला कि उनकी तबीयत बहुत खराब है और वे पास की एक झुग्गी में ही रहती हैं। कपिल तुरंत वहाँ पहुँचा।उसने देखा, कि शांति देवी बुखार में तप रही थीं। उनके पास दवा खरीदने तक के पैसे नहीं थे।उस क्षण आरव को अपनी माँ याद आ गई।उसने उन्हें अस्पताल पहुँचाया और इलाज करवाया। अपनी बचत का बड़ा हिस्सा उसने उनके इलाज में लगा दिया।

जब शांति देवी ठीक हुईं, तो उनकी आँखों में आँसू थे।"बेटा, तूने मेरे लिए इतना सब क्यों किया?"

कपिल ने धीरे से कहा, "क्योंकि इस शहर में आपने मुझे माँ का प्यार दिया है।"शांति देवी रो पड़ीं।

उस दिन से दोनों का रिश्ता और गहरा हो गया लेकिन ज़िंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कुछ महीनों बाद जिस कंपनी में कपिल  काम करता था, वहाँ कर्मचारियों की छँटनी शुरू हो गई।एक सुबह उसे भी नौकरी से निकाल दिया गया। उसके' पैरों तले ज़मीन खिसक गई।'किराया देना था, पढ़ाई की फीस भरनी थी और घर भी पैसे भेजने थे।

निराश कपिल समुन्द्र के किनारे बैठा ,उस रात वह शहर की रोशनियों को देख रहा था।उसे लग रहा था,जैसे  ये रोशनियाँ उसका उपहास कर रही हैं। वह टूट चुका था।सोच रहा था ,मैं कब इन रोशनियों को छू पाउँगा ?दूर से ये रोशनियां कितनी अच्छी लगती है किन्तु इनको पाना  इतना सरल नहीं है। 

उसी समय शांति देवी उसके पास आईं। उन्होंने पूछा, "बेटा ! क्या हुआ ?"इतने उदास क्यों लग रहे हो ?

आरव ने,उन्हें  सब बता दिया।कुछ देर चुप रहने के बाद शांति देवी ने अपने पुराने कपड़ों में छिपा एक छोटा-सा डिब्बा निकाला। उसमें कुछ गहने थे।"ये मेरे पति की आखिरी निशानी हैं। इन्हें बेच दो !और कोई नया काम शुरू कर लो।"

कपिल चौंक गया।"नहीं माँ जी, मैं ऐसा नहीं कर सकता।"

शांति देवी मुस्कुराईं ,"जब अपना बेटा मुसीबत में हो, तो माँ अपनी सबसे कीमती चीज़ भी दे देती है।"बस तुम साहस मत छोड़ना !

कपिल  की आँखें भर आईं ,उसने गहने नहीं लिए, लेकिन उस दिन उसे, फिर से हिम्मत मिल गई।

उसने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किए। दिन-रात मेहनत की। लगातार असफलताओं के बावजूद उसने हार नहीं मानी।आखिरकार छह महीनों के पश्चात उसे एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई।उसकी तनख्वाह पहले से तीन गुना अधिक थी।धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी।

जब उसके पास थोड़ा पैसा हो गया ,उसने सबसे पहले अपने माता-पिता के लिए गाँव में नया शानदार घर बनवाया।जिसकी खिड़की की रौशनी से रात्रि में वहां की गली भी रोशन रहती थी। 

फिर उसने शांति देवी के लिए एक छोटा-सा फूलों का स्टॉल खुलवा दिया ताकि उन्हें सड़क किनारे न बैठना पड़े।स्टॉल के उद्घाटन वाले दिन शांति देवी की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने कहा, "देखा बेटा, शहर की रोशनियाँ बुरी नहीं होतीं। ये हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं, बस उनके पीछे छिपे अंधेरों से हमें लड़ना पड़ता है।"

कपिल मुस्कुरा दिया।उस रात वह स्टॉल के सामने खड़ा होकर शहर को देख रहा था।सड़कें पहले जैसी ही थीं।गाड़ियाँ पहले जैसी ही दौड़ रही थीं। इमारतों की रोशनियाँ पहले जैसी ही चमक रही थीं।लेकिन आज  वे कुछ अलग लग रही थीं।

उसे समझ आ गया था कि शहर की असली रोशनी इमारतों में नहीं, बल्कि उन लोगों के दिलों में होती है जो कठिन समय में एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। कुछ साल बाद कपिल एक सफल अधिकारी बन गया।लेकिन उसने कभी शांति देवी को नहीं भुलाया ,जब -जब भी वो  ज़िंदगी के थपेड़ों से घबराता था ,वो उसे हौसला देती थीं। 

जब भी कोई उससे सफलता का राज पूछता, वह केवल एक बात कहता—"मैंने शहर की रोशनियों से नहीं, बल्कि उन इंसानों से जीना सीखा, जो अंधेरे में भी दूसरों के लिए दीपक बन जाते हैं।"

और सच यही है—शहर की चमक-दमक भले ही आँखों को आकर्षित कर ले, लेकिन दिल को सुकून हमेशा इंसानियत की रोशनी ही देती है। वही रोशनी सबसे उजली, सबसे सुंदर और सबसे अमूल्य होती है।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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