Rasiya [part 123]

अभी काम से निपट कर उर्वशी, आराम से बैठी ही थी ,तभी उसके' संदेशवाहक' पर ,संदेश आया - और क्या चल रहा है ? भोजन हो गया। 

उस संदेश को देखकर उर्वशी को क्रोध आया और सोचा -पता नहीं, कौन है ? ये....अपना नाम और फोटो तक छिपाये हुए है ,पहले तो उसने, उस संदेश को नजरअंदाज करना चाहा और करवट बदलकर लेट गयी। तभी फिर से संदेश आया -क्या इतनी जल्दी सो गयी ? या पतिदेव वहां हैं। 


इस तरह के संदेश देखकर तो समीर को शक होता या नहीं किन्तु अब जरूर हो जायेगा। सोचेंगे -'न जाने कौन पूछ रहा है ?'क्या ये मुझसे छुपकर, किसी से बातें करती है ? क्या पतिदेव वहीं हैं ?हालाँकि उर्वशी ,समीर से कुछ नहीं छिपाती है किन्तु ,इसके विषय में क्या बताये ? ये कौन है ? मैं तो इसे, स्वयं ही नहीं जानती। उन्हें पता चला ,वो तो कह देंगे -' इसको ब्लॉक कर दो !'किन्तु मुझे जानना है ,ये कौन है ? न जाने क्यों ? अज़ीब सी ज़िद है। 

तब सोचा -ये कुछ न कुछ लिखता ही रहेगा ,समीर आ गए , देखेंगे तो क्या सोचेंगे ? यही सोचकर उर्वशी ने 'हाँ 'लिखा और सभी संदेश मिटाये और शांत होकर लेट गयी, किन्तु नींद नहीं आ रही थी। ये तो अज़ीब ही इंसान है ,इसे इतना कुछ कह देती हूँ किन्तु अपनी हरक़तों से बाज नहीं आ रहा है । अब तो इससे साफ -साफ बात करनी ही होगी। तब तक समीर भी कमरे में आ गए थे, उन्हें देखकर उर्वशी ने तुरंत ही अपनी आँखें बंद कर लीं। 

सुबह के समय काम इतना हो जाता है ,फोन  को हाथ में लेने का समय ही नहीं मिलता  है। वैसे अब दोनों बच्चे बड़े हो रहे हैं। बेटा नौकरी की तलाश में है , बेटी भी कॉलिज जाती है किन्तु अभी भी उर्वशी को काम से समय ही नहीं मिलता।

सफाईवाली लगी हुई है किन्तु उसका भी अपना मुड़ है कभी भी छुट्टी मार लेती है, किन्तु उर्वशी की कोई छुट्टी नहीं। पुराने दिनों को याद करती है ,सब काम मम्मी संभाल  लेती थीं। कितनी बेफ़िक्री थी? किन्तु आज तो जैसे ,एक पल को भी आराम नहीं, रसोईघर से बाहर आओ तो कमरा सम्भालो ! क्या  सामान खत्म हो गया ? क्या सामान घर में लाना है ? कुछ काम तो ऐसे हैं ,उनकी कोई गिनती ही नहीं। कभी -कभी तो अपने लिए भी समय नहीं निकाल पाती हूँ। 

जब अपने घर में थी ,पढ़ाई के पश्चात , प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी ,इतना पैसा तो नहीं मिलता था किन्तु इतना तो सुकून था , मम्मी -पापा का थोड़ा सा बोझ कम कर सकी , यही प्रयास भी रहता था । वो भी क्या दिन थे ?सोचते हुए उसने एक गहरी स्वांस भरी। उसने घड़ी में समय देखा , दस बज रहे थे ,नाश्ता करके उसे अब फुरसत मिली है। तब हाथ में फोन आ ही जाता है। फोन ऐसे ही खोलकर,' व्हाट्सएप' फेसबुक' देखने लगती है। कहीं कुछ नया दिखे, व्हाट्सएप पर भी, अनेक गुड मॉर्निंग के संदेश थे। कभी कुछ नया पढ़ने को भी मिल जाता है ,कोई सामाजिक घटना या फिर कोई 'प्रेरक संदेश' मिल जाता है।  स्क्रॉल करते-करते, फेसबुक पर जाती है और तभी उसे संदेशवाहक में, 'सुप्रभात 🙏 का संदेश पढ़ने को मिलता है। साथ में गुलाब भी था।

पता नहीं, इसको कैसे पता चल जाता है ? सारा दिन क्या ये ऐसे ही फोन लिए बैठा रहता है ?कब मैं फोन खोलूं ?और ये मुझे पकड़े , मन ही मन उर्वशी सोच रही थी, यदि यह कोई बुजुर्ग है तो अभी भी बुढ़ऊ के सभी जज्बात मरे नहीं हैं। अधेड़ होगा तो अपने समय में बहुत ही प्रेम भरी बातें करता होगा। जैसे -'रसिया' 

उसका फिर से संदेश आया -  कैसी हो ? नाश्ता हो गया। 

ठीक हूँ ,नाश्ता कर लिया। 

नाश्ते में क्या बनाया था ?

दही के साथ ,आलू के परांठे !

आलू के परांठे मुझे बहुत पसंद हैं किन्तु तुम, मुझे दूर से ललचा रही हो ,कभी हमें भी बनाकर खिलाओ !

मैंने, तुम्हें कब ललचाया ? तुमने पूछा ,मैंने जबाब दिया। क्यों ? तुम्हारी बीवी तुम्हें भोजन बनाकर नहीं खिलाती है ।

बनाती है ,अब उसके हाथों में वो बात नहीं रही। अब उर्वशी मन ही मन ये भी सोचती थी ,मैं भी शादीशुदा हूँ और ये भी शादीशुदा है। हम दोनों समझदार हैं ,परिवार वाले हैं, बातचीत करने में कोई बुराई भी नहीं है। 

तब वो बोला -  यहां बात करने में बड़ी परेशानी होती है। 

तो.....

 मुझे अपना व्हाट्सएप नंबर दे दो ! वहीं पर मैसेज कर लिया करूंगा। 

मुझे, तुम्हें व्हाट्सएप नंबर क्यों देना है ?

 ठीक है, नहीं दोगी तो यहीं पर तंग करता रहूंगा। वैसे एक बात पूछूं - तुम, मुझसे परेशान तो नहीं हो। 

यह क्या बात हुई ? परेशान करने के बाद पूछते हो कि कोई परेशानी तो नहीं हुई। 

अच्छा यह बताओ ! आजकल तुम क्या कर रही हो ?

 तुम बताओ !आजकल तुम क्या कर रहे हो ?

यह क्या बात हुई, पहले प्रश्न मैंने किया था।  तुम्हें, मेरे प्रश्न का जवाब देना चाहिए था, प्रश्न के बदले प्रश्न नहीं। 

मेरी इच्छा, में जवाब देना चाहूं या ना देना चाहूं , अब तुम बताओ ! आजकल तुम क्या कर रहे हो ?

मैं तो हमेशा तुम्हारे विषय में ही सोचता रहता हूं , और क्या कर सकता हूं ? अब तुमसे चैट कर रहा हूं। 

तभी उसने एक वीडियो भेजी, जिसमें दिखाया जा रहा था -एक लड़का अपनी गर्लफ्रेंड को फूल दे रहा है। 

यह वीडियो मुझे क्यों भेजा ?

 दोस्ती की खातिर !

 अपने दोस्त को भेजो ! न....  मुझे हो क्यों भेज रहे हो ?

दोस्त को ही तो भेजा है ,क्या तुम, मुझे अपना दोस्त नहीं समझतीं  किंतु मैं तो.... तुम्हें अपना दोस्त समझता हूं। 

वैसे आप पहले क्या करते थे ?

बहुत अच्छे ! पहले तुम से अब आप पर आ गई ,'तुम' ही अच्छा लगता है। 

हां, तो बताओ ! तुम क्या करते थे ? 

हां, जी हम क्या करेंगे ? हमारा कार्य तो प्रेम बांटना है, खुश रहना है, दूसरों के दुख -दर्द परेशानियों को समेट लेना है। 

तुम्हें कौन अपने दुख- दर्द बता रहा है ?

 बहुत सी ऐसी भाभियाँ  हैं , जिन पर उनके पति ध्यान नहीं देते , उनके लिए उनका यह देवर उनकी समस्याओं को सुनने के लिए हमेशा बैठा है। वैसे एक बात है जो बात तुम में है और कहीं नहीं। 

ऐसी बातें कितनों से, कितनी बार कही है ,😂😂😂 उर्वशी ने पूछा। 

नहीं, दिल से कह रहा हूं। 

वही दिल जो इधर-उधर डोलता रहता है। अब तक कईयों को संदेश भेजे जा चुके हैं। 

वैसे तो कई हैं , किंतु उनमें से तुम अलग हो। 

ह्म्म्मम्म  मैं, किस तरह से अलग हूं। हालांकि उर्वशी को उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी किंतु अपनी प्रशंसा सुनना किसको अच्छा नहीं लगता, इसीलिए अपनी प्रशंसा सुनने के लिए चैट को आगे बढ़ा रही थी। अब उसके पास भी समय था। खाली समय में कभी भी, उसका फोन आ जाता, कभी नमस्कार ! से शुरुआत होती तो कभी किसी विषय में पूछताछ होती। बातें करते-करते उन्हें लगभग एक महीना हो गया था। न ही उर्वशी को उसके बारे में कुछ मालूम था ,न ही उर्वशी उसे अपने विषय में ज्यादा कुछ बताती थी।दोनों इतना जानते थे, दोनों विवाहित हैं। अब वह उर्वशी के लिए अजनबी नहीं रहा था। उसके जीवन का खालीपन, अब उस अजनबी के संदेश आने से पूरा हो जाता था। उर्वशी ने उसके  विषय में ज़्यादा जानना भी नहीं चाहा। 

 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post