आप लोगों ने क्या समझा ?' मैं' क्या लिखना चाहती थी ?'' शैतानी सांस या फिर सास ! कोई भी कुछ भी समझे, किंतु दोनों ही शैतान होती हैं। अगर सांसें अटक जाए तो इंसान का जीना दूभर हो जाए ,जब उसे सांस ही ना आए तो फिर वह जिंदा कैसे रहेगा ? दो पल में ज़िंदगी का खेल समाप्त !और यदि सास बिगड़ जाए , तो वह वैसे ही बहु का जीना दूभर कर देगी। वैसे देखा जाये तो ' सास 'हमेशा 'दामाद' को तो अच्छी मिलती ही है। अपने दामाद का सम्मान करती है ,उसकी बेटी का पति जो है।
किन्तु यही सास वाला रिश्ता ,बहु के साथ सांप -नेवले जैसा हो जाता है। कभी सोचा है ,ऐसा क्यों ? जबकि रिश्ते का नाम एक ही है -सास !
यह केवल एक रिश्ते की बात नहीं है , यह एक चरित्र की बात है, एक ऐसा किरदार जिसका इस धरा पर पदार्पण होता है और वह इंसान जिस भी रिश्ते में जाता है ,चाहे फिर वह रिश्ता सास का हो, बहन का हो, बेटी का हो, पत्नी का हो या फिर बहू का... वह क़िरदार किसी भी रिश्ते में आए दूसरे का जीना दूभर कर ही देगा। इसीलिए हम किसी एक विशेष रिश्ते को इल्जाम नहीं देते हैं कि सास ही कठोर और शैतान होती है।
दोनों ही सूरत में यह रिश्ता इंसान को असली जिंदगी दिखा देता है। जो इंसान सरलता से अपनी जिंदगी जी रहा है। उसके जीवन को इतना दूभर बना देते हैं कि उसे अपनी जिंदा होने पर दुख होता है अपने जीवन को जीने में परेशानी महसूस होती है, वह जीना ही नहीं चाहता।
विशेष रूप से देखा जाये तो सास का रिश्ता ही गलत नहीं होता, सास बनने से पहले तो वह, किसी की बेटी थी, बहन थी, ननद भी थी ,मौसी ,बुआ कई रिश्तों की ड़ोर से बंधी थी। शादी के पश्चात वह किसी घर की इज्ज़त ,लक्ष्मी 'बहु' बनती है, पत्नी बनती है, मां बनती है। उन चरित्रों को निभाते हुए ,तब सास की पदवी ग्रहण करती है।
सभी रिश्तों को निभाते हुए ,वो इस पदवी तक पहुंच जाती है किन्तु इस बीच उसने बहुत अनुभव प्राप्त किये ,ज़िंदगी के उतार -चढाव देखे। देखा जाये तो ये पदवी सम्मानित होनी चाहिए , वर्षों के अनुभवों के पश्चात ये शीर्ष स्थल प्राप्त हुआ। जब उसे भी किसी पर हुक्म चलाने का अधिकार मिला।अब तक तो वो सबकी सुनती आई है। वो सबसे अनुभवी महिला बन जाती है, जो बुजुर्ग की श्रेणी में भी आ जाती है। किन्तु इस रिश्ते को अथवा उस पदवी को लोग सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते ,विशेषकर उस घर में आने वाली नई बहु ! तब वो किरदार बन जाता है -'शैतानी सास ''
सबसे ज़्यादा उसके संपर्क आती हैं ,उसके लाड़ले बेटों की पत्नियां ,उस घर की बहुएं ! इसीलिए सभी रिश्तों में ये रिश्ता सबसे ज़्यादा बदनाम है, किन्तु क्या यही सच्चाई है ? 'सास भी तो, कभी बहु थी।'' कई बार बहुये ऐसी आती हैं ,वो सास की' नाक में ही नकेल डाल देती हैं।'' किन्तु बहु के साथ तो सभी की संवेदनाएँ होती हैं। बेचारी ! उस परिवार में नई आई है ,अभी नई ज़िंदगी में क़दम रक्खा है। बेचारी कुछ जानती नहीं। क्या यही सच्चाई है ? फिर सबसे ज्यादा सास का रिश्ता क्यों बदनाम होता है ? कभी सोचा है ?
सास से तो उसके परिवार के सभी सदस्य पहले से ही परिचित होते हैं। बेटा अपनी माँ को ,पति अपनी पत्नी को और सास अपनी बहु को अच्छे से समझती है ,वही बहु जो अब स्वयं सास बन चुकी है,फिर भी वे ,उसे कुछ नहीं कहते ,कहकर भी क्या हो जायेगा ?जब वो उसका आज तक कुछ नहीं बिगाड़ सके तो बहु के आने पर ही क्या बिगाड़ लेंगे ?😂
अब उस परिवार में जो कोई भी नया सदस्य आता है , वो उस परिवार में किसी को नहीं जानती है। तब वो नई बनी सास, उसको जिंदगी का एक नया ही रूप दिखलाती है। सास बनकर उस पर अधिकार ही नहीं जतलाती ,वरन उसकी नादानी का सम्पूर्ण लाभ उठाती है।किन्तु ये वही सास हो सकती है ,जो पहले बहु बनकर अपनी सास से भिड़ चुकी है। ख़ैर छोड़िये !अभी ये बात आपको समझ नहीं आएगी।
एक ऐसा ही चरित्र 'प्रेम प्यारी '' जो अपनी ही धुन में मस्त रहती है। अपनी इच्छा से ही सब कुछ करती थी। पिता ने उसे कई बार डांटा भी था, समझाया भी था किंतु उसकी समझ में कभी कुछ नहीं आया।
'प्रेम प्यारी ' का नाम ही प्रेम था किन्तु उसके अंदर न ही ' प्रेम' की कोई भावना थी , इंसानियत किस चिड़िया का नाम है ?वो नहीं जानती और न ही वह समझना चाहती थी। वह जिंदगी अपने तरीके से जीना थी। कहने को तो वह गांव की रहने वाली लड़की थी, किंतु उसकी आकांक्षाएं ,इच्छाएं बहुत बड़ी थीं। सब कुछ अपने अधिकार में कर लेना चाहती थी। एक तरीके से कहा जाये ,तो अपना नियंत्रण चाहती थी। सब कुछ उसके तरीके से हो, किंतु पिता के गुस्से से डरती थी। तब भी वह इतनी चालबाजियां खेल जाती थी कि घर वालों को पता ही नहीं चलता था कि उसने बाहर जाकर क्या किया है ?
सास हो या साँस जो भी गले में अटक जाती है ,एक से प्राण के संकट आ जाते हैं ,और दूसरी से ज़िंदगी ! जिसके कारण जीवन में संकट ही संकट आ जाते हैं।
चलिए ! ऐसी बातें बहुत हो गयीं ,अब हम आपको' प्रेम 'से मिलवाते हैं। जो अभी तेज क़दमों से दौड़ते हुए ,आम के पेड़ पर जा बैठी। झट से पके हुए तीन आमों के गुच्छे पर उसका हाथ पहुंचा और अपनी सहेली निर्मला से बोली - देख ! ये आम तो मेरे हिस्से में आये ,ये तो तुझे मैं देने वाली नहीं।
तू, तो दौड़कर ऐसे गई थी ,जैसे मेरे लिए भी लेकर आएगी।
मैं, तेरे लिए आम क्यों तोडूं ?जो तुझे लेने हैं ,अपनी मर्जी से तोड़ ले ! कहते हुए पेड़ से कूदी और एक आम का आगे का हिस्सा हटाया और आम चूसने लगी।
निर्मला को उसकी हरकतों पर क्रोध आया ,वो जानती थी ,ये ऐसी ही मतलबी है किन्तु उसकी बातों को नजरअंदाज कर जाती थी। निर्मला उसे घूरते हुए डरते हुए ,पेड़ पर चढ़ने लगी। कितनी ढीठ है ? ये जानती है , कि मुझे पेड़ पर चढ़ते हुए ड़र लगता है। तभी उसे आहट महसूस हुई जैसे उस बगीचे में कोई आ रहा है। निर्मला ड़रकर एकदम से पेड़ से कूदी और बोली - केतकी भाग ! मुझे लगता है ,माली !आ गया।
तब तक वो एक आम खा चुकी थी ,निर्मला डर के कारण भागी किन्तु प्रेम ने इधर -उधर देखा और एक पेड़ के पीछे छुप गयी।
माली ने निर्मला को दौड़ते देख लिया था और चिल्लाते हुए बोला -अरे ! रामफल की, ठहर जा ! तू रोज़ चोरी करने आ जाती है , कहते हुए उसकी तरफ दौड़ा। जैसे ही वो उसके करीब पहुंचा ,तभी घबराकर निर्मला डरकर वहीँ खड़ी हो गयी और बोली -चाचा !मैंने आमी नहीं तोड़ी वो तो केतकी मुझे यहाँ लाई।
झूठ बोलती है , वो तो यहाँ है, भी नहीं ,उसने चारों तरफ देखते हुए कहा।
