'आज से ये कॉलिज नहीं जाएगी' ,काजल के पिता ने क्रोधित होते हुए ,अपनी पत्नी अनुपमा से कहा।
पर पापा मेरी गलती क्या है ,मैंने क्या किया है ?'' करे कोई ,भरे कोई '' गुस्से से काजल ने भी पास रखा कुशन बिस्तर पर फेंककर मारा।
तब तक किशोरी लाल जी अपने कमरे में जा चुके थे।
तब काजल अपने कमरे से बाहर आई और अपनी माँ से पूछा -मम्मी ! ये सब क्या है ? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। कीर्ति भागी है ,फिर मुझे क्यों सज़ा मिल रही है ?
क्या करें ?उसने काम ही ऐसा किया है ,उसके माता -पिता ने उसे पढ़ाने में कितना पैसा लगाया ?ताकि बेटी का जीवन सफ़ल हो जाये, वो अपने जीवन में कुछ बन जाये किन्तु उसने क्या किया ? माँ-बाप की' इज्जत को ताक पर रखकर चली गयी। ''उसके पिता ने, इज्ज़त की ख़ातिर अपनी जान लेने का प्रयास किया। तेरे पिता ने उनकी हालत देखी, तो उन्हें भी बहुत क्रोध आया।
क्या माता -पिता ने, अपनी बेटी को इसीलिए पाल -पोषकर बड़ा किया था ?उन्होंने काज़ल से पूछा - कल को वो छह महीने के रिश्ते के लिए ,बीस बरस का रिश्ता तोड़कर चली गयी। छह महीने का रिश्ता खून के रिश्ते पर भारी पड़ गया।
वो सब तो मैं जानती हूं , किंतु इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि एक लड़की चली गई तो क्या सभी लड़कियां चली जाएंगीं या सभी की उन्नति पर रोक लगा दी जाएगी। वो पढ़ना नहीं चाहती थी किंतु मैं तो पढ़ना चाहती हूं।
हम तुम्हें पढ़ने से मना ही नहीं कर रहे हैं किंतु हालात देखते हुए तो लगता है , अब हमें भी तुम्हारी शादी कर देनी चाहिए। हमारे और तुम्हारे लिए अब यही उचित रहेगा।
मम्मी ! आप यह कैसी बातें कर रही हैं ? कल मेरे कॉलेज में एक कार्यक्रम है, उसमें मुझे भाषण देना है। जब मैं वहां नहीं होंगी और मेरा नाम बोला जाएगा। तब क्या होगा ?
होना क्या है ?वो लोग समझ जायेंगे ,तुम नहीं आ पाई ,मनोरमा जी ने कहा।
ऐसा नहीं होता है ,यहाँ मैं क्या करूंगी ? उस कार्यक्रम का शुरुआत भी मुझे करनी होगी।यह मेरी गैरज़िम्मेदाराना हरक़त होगी। सब कुछ मुझ पर है और मैं यहां कैसे रह सकती हूं ? आप पापा को समझाइए ! कि ऐसा नहीं होता है, क्या हाथ की पांचो उंगलियां बराबर होती हैं ? यदि वह ऐसी निकली तो जरूरी नहीं, कि मैं भी ऐसी ही निकलूँ।
अनुपमा पर उसकी बातों का असर हुआ ,वो बोलीं - मैं, उन्हें समझाने का प्रयास करूंगी।
प्रयास नहीं मम्मी ! मुझे कल अवश्य जाना ही होगा।
देखता हूँ ,तू कैसे जाती है ? जब तुझसे एक बार मना कर दिया ,नहीं जाएगी तो नहीं जाएगी ,अचानक आकर किशोरीलाल जी ने कहा।
पापा ! जैसा कीर्ति ने किया जरूरी नहीं मैं भी वैसा ही करूं।
तू उससे कुछ ज़्यादा ही करेगी ,हमारी'' नाक कटवाने'' की सोच रही है। क्यों ? क्या तुझे, उन लड़कियों से पिछड़ना है। तुझे भी तो आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल होना है। तू आज नहीं करेगी तो... कुछ दिनों पश्चात करेगी क्योंकि हम तो पुराने ख्यालातों के हैं । बूढ़े हो रहे हैं।
शराब -सिगरेट पीना ,लड़कों के साथ घूमना ,'लिव इन' में रहना ,ये ही तो आधुनिकता है। तुम्हें तो लड़कों से बराबरी करनी है। कौन जाने तुम भी उस भीड़ में शामिल हो ,हमें पता ही न चले।
पापा !गलत काम तो गलत ही होता है ,वो चाहे, लड़का करे या फिर लड़की ,पापा आपने अभी तक अपनी बेटी को पहचाना ही नहीं है।
सभी माता -पिता का यही दावा रहता है ,हम अपनी औलाद को अच्छे से पहचानते हैं किन्तु ये सरासर गलत है। बाहर निकल कर न जाने बच्चे, क्या -क्या गुल खिलाते हैं ? मैंने एक बार कह दिया ,अब तू कॉलिज नहीं जाएगी।
मेरा साल बर्बाद हो जायेगा ,थोड़े तेज स्वर में काज़ल बोली।
कोई बात नहीं,कहकर वो कमरे बाहर निकल गए।
मम्मी ! आशा भरी नजरों से काज़ल ने अनुपमा की तरफ देखा किन्तु अनुपमा चुपचाप उठकर चली गयी।
'मैं स्त्री हूँ ,' यह शीर्षक काज़ल ने दोहराया और मुस्कुराई बोली - हमें आज भी अपने को प्रमाणित करना पड़ता है। स्त्री ,नारी , औरत ,अबला जाने कितने नामों से जानी जाती हूँ किन्तु सबसे ज़्यादा मुझे 'अबला' समझा गया।ज़्यादातर इसी रूप में देखना पसंद भी करते हैं। गृहणी रही तो लक्ष्मी ,अन्नपूर्णा ! माँ बनी तो जननी , धात्री, माता , रिश्तों के आधार पर उसके नाम बदलते रहे। युद्ध के समय पर वही लक्ष्मी , दुर्गा या काली बन गयी। नारी एक ही रही किन्तु उसके कार्यों और रिश्तों के आधार पर उसके नाम भी बदलते रहे किन्तु सबसे ज्यादा उसके पारिवारिक रूप को ही सराहना मिली और उसे 'अबला' बना दिया गया।
पुरुष प्रधान समाज उसे 'सबला 'होते हुए देखना ही नहीं चाहता। उसे घूंघट में रखा गया। इस बात से मुझे कोई विरोध नहीं, उस समय परिस्थितियां ही ऐसी रहीं होंगी ,लोग अपने घर की इज्जत को पर्दे में रखने को विवश हो गए।
पुराने समय से ही नारी पूजनीय रही है ,सम्मानित रही है किन्तु कुछ परिस्थितियों के चलते जो स्त्री जीवन में आगे बढ़ रही है ,उन्नति करना चाहती है ,उसकी उड़ान को रोक दिया जाता है। पुरुष प्रधान समाज स्त्रियों को आगे बढ़ने देना नहीं चाहता है किन्तु स्त्री ने हमेशा से ही अपने को साबित कर दिखाया है।
विद्योत्तमा हो या रानी लक्ष्मीबाई ,इंदिरा गाँधी हो या फिर स्वर कोकिला लता मंगेशकर ,कल्पना चावला हो या फिर बछेंद्री पाल !ये एक ही नहीं न जाने कितने उदाहरण हैं ? जहाँ पर स्त्री की पहुंच न रही हो। भक्ति ,प्रेम ,घर ,दफ्तर ,देश की सेवा सभी में तो अग्रणी रही है। तब भी कई बार उसकी परीक्षा ली जाती है ,उस पर अविश्वास किया जाता है। आज हम नारियों को अपने को बार -बार क्यों प्रमाणित करना पड़ता है ?
कोई पड़ोस की लड़की भाग जाये या फिर उसने कोई गलत क़दम उठा लिया ,तब भी जो लड़कियां उड़ान भरना चाहती हैं। जीवन में कुछ करना चाहती हैं ,परिक्षा उनको भी देनी पड़ जाती है। मैं भी एक बेटी हूँ ,बहन हूँ ,एक स्त्री हूँ ,उड़ान भरना चाहती हूँ। सुख -दुःख ,उचित -अनुचित सभी के जीवन में लगे रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है।'' एक पंछी दिशाहीन हो जाये तो सभी पंछियों के पर क़तर दिए जाएँ।''
कॉलिज के अध्यापक और अध्यापिका जी ये देख रहे थे ,ये सब तो इसके भाषण में नहीं है ,इसने तो कुछ और ही लिखा था और बोल कुछ और रही है।
दरअसल हुआ ये था ,काज़ल ने,अपने माता -पिता को भीड़ में बैठे देख लिया था। वो तो कमरे में बंद थी, किन्तु उसे आज यहाँ आना था इसीलिए काज़ल ऊपर के कमरे में बैठकर काम करने का बहाना करके छत पर चली गयी थी और पड़ोसियों की छत से होते हुए कॉलिज पहुंच गयी थी। जब वो भाषण दे रही थी। तब उसने अपने पिता और माँ को आते हुए देख लिया था। वो उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी किन्तु वो सुनना ही नहीं चाहते थे।
अपनी बेटी को भाषण देते देखकर, उसकी बातें सुनकर किशोरीलाल जी को अपनी गलती का एहसास हुआ उन्होंने अपनी बेटी के साथ कुछ ज़्यादा ही ज़्यादती कर दी और उन्हें देखकर काज़ल का भाषण बदल गया। भाषण समाप्त होते ही ,वो मंच से उतरी और अपने पिता की तरफ देखा ,उन्होंने हाथ के इशारे से दूर से उसे अपना आशीष दिया। कुछ देर पश्चात काज़ल को उसके कई कार्यों के लिए उसे सम्मानित किया गया। अब तक किशोरीलाल जी ने भी अपना निर्णय बदल दिया था।
