मन की सुंदरता देखी उसने, तन में उसने क्या पाया ?
वही क्षणिक आकर्षण जो, वक़्त के साथ ढलकाया।
जिसमें मिलावट, रंगों की,असल रूप समझ न आया।
चमक न थी, चेहरे पर, लाली- पाउडर का रंग चढ़ाया ?
मन का मोती चमका जब , बदल रही थी, उसकी काया।
करुणा से वो सराबोर थी ,प्रेम सुधा, सेवा भाव था, पाया।
झूठी काया, मुख मंडल पर तेज ! तन -मन था, भरमाया।
छोड़ ! तन के मोह को, उसने सुंदर मन को समझाया।
सुंदर तन, सुंदर मन से अधिक समय तक,न टिक पाया।
