Jab koi nahi tha

 अपनों से ही बहुत उम्मीदें लगाईं। 

चाहा, कोइ तो खड़ा हो,  साथ मेरे !

समझे, मुझको ! मेरे जज़्बातों को ,

हौसला दे !अपने हाथों में थाम मेरे हाथों को। 


पहचान नहीं थी ,अपनी ही....

लगातीं रहीं नजरें ,उम्मीदों के फेरे !

अपने को बेबस ,अबला समझ ,

लगाई उम्मीदें ! कोई तो खड़ा हो ,साथ मेरे !

अकेली कब तक ? तकती राहें 

स्व को जगाया,अपने को चट्टान किया।

ग़ैरों से आस लगाना छोड़ दिया।  

डटकर खड़ी हुई, जब कोई नहीं था साथ मेरे ! 

 चलती रही ,पथरीली राहों पर , 

आत्मविश्वास जगा ,अपने को ही बुलंद किया । 

हालातों के समक्ष खड़ी ,डटी रही ,

स्वयं खड्ग बनी, जब कोई नहीं था, साथ मेरे !

हौसलों की कमी न थी ,

बस थोड़ी सी घबराहट थी। 

अकेली थी ,डरती थी ,

थपेड़ों से चट्टान हुई ,जब कोई नहीं था ,साथ मेरे। 

आज लता नहीं दरख़्त बन गयी हूँ। 

आज तूफानों से टकराई हूँ।  

वक़्त के थपेड़ों से नाजुक़ नहीं फ़ौलाद बनी हूँ ,

तराश लिया अपने को, जब कोई नहीं था,साथ मेरे। 

अपने को शब्दों में यूँ ढाल लिया। 

कागज़ क़लम से दुश्मन पर यूँ वार किया।

 सफ़र ज़िंदगी का कुछ यूँ तैयार  किया। 

चलती रही,जूझती रही, अकेली राहों पर, 

वक़्त संग पिघलती रही, जब कोई नहीं था, साथ मेरे !      

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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