अपनों से ही बहुत उम्मीदें लगाईं।
चाहा, कोइ तो खड़ा हो, साथ मेरे !
समझे, मुझको ! मेरे जज़्बातों को ,
हौसला दे !अपने हाथों में थाम मेरे हाथों को।
पहचान नहीं थी ,अपनी ही....
लगातीं रहीं नजरें ,उम्मीदों के फेरे !
अपने को बेबस ,अबला समझ ,
लगाई उम्मीदें ! कोई तो खड़ा हो ,साथ मेरे !
अकेली कब तक ? तकती राहें
स्व को जगाया,अपने को चट्टान किया।
ग़ैरों से आस लगाना छोड़ दिया।
डटकर खड़ी हुई, जब कोई नहीं था साथ मेरे !
चलती रही ,पथरीली राहों पर ,
आत्मविश्वास जगा ,अपने को ही बुलंद किया ।
हालातों के समक्ष खड़ी ,डटी रही ,
स्वयं खड्ग बनी, जब कोई नहीं था, साथ मेरे !
हौसलों की कमी न थी ,
बस थोड़ी सी घबराहट थी।
अकेली थी ,डरती थी ,
थपेड़ों से चट्टान हुई ,जब कोई नहीं था ,साथ मेरे।
आज लता नहीं दरख़्त बन गयी हूँ।
आज तूफानों से टकराई हूँ।
वक़्त के थपेड़ों से नाजुक़ नहीं फ़ौलाद बनी हूँ ,
तराश लिया अपने को, जब कोई नहीं था,साथ मेरे।
अपने को शब्दों में यूँ ढाल लिया।
कागज़ क़लम से दुश्मन पर यूँ वार किया।
सफ़र ज़िंदगी का कुछ यूँ तैयार किया।
चलती रही,जूझती रही, अकेली राहों पर,
वक़्त संग पिघलती रही, जब कोई नहीं था, साथ मेरे !
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