Kiskai dulhan [part 4]

महल के एक कक्ष में ,सभी बड़े और कुछ अतिथिजन के मध्य वार्तालाप चल रहा है और तब ये बात सामने आती है।' रूद्र प्रताप सिंह' तो इस परिवार का जैविक पुत्र तो है ही नहीं। तब उस परिवार के बड़े चाचा रणवीर सिंह कहते हैं - ये ख़बर, हमारे परिवार के लिए एक ख़तरा है ,और ये विवाह भी अब अधर में लटक जायेगा।

तब उस परिवार का छोटा बेटा यानि 'भानू प्रताप सिंह''  इस वार्ता के मध्य धीरे से अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ,उसने अपने बड़े भाई की तरफ देखा और बोला -"भैया...!"


यह शायद कई वर्षों बाद ऐसा हुआ था, जब उसने रूद्र को इस तरह से संबोधित किया। ऐसा लग रहा था ,जैसे उसे अपने भाई से सहानुभूति है। तब वो बोला -अगर भाभी..." वह एक क्षण के लिए वो रुका, "...अगर 'मोहिनी' आपको चुनती है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।"कमरे में बैठे सभी लोग, उसकी बात सुनकर चौंक गए।

किसी ने भी भानु से ऐसी बातों की उम्मीद नहीं की थी। 

लेकिन तभी...विक्रम सिंह ने ज़ोर से कहा -"नहीं!"उनकी आवाज़ में ऐसा अधिकार था कि पूरा कमरा पूरी तरह शांत हो गया।

"यह शादी अब पहले जैसी नहीं हो सकती।"उन्होंने एक गहरी साँस ली और बोले -"हमारा परिवार पहले से ही सवालों के घेरे में है ,अब अगर शादी भी पहले की तरह ही हुई..."...तो अदालत तुरंत विरासत का मामला खोल देगी।"

रणवीर सिंह ने,भी अपने भाई की बात का समर्थन करते हुए ,बात आगे बढ़ाई -और बोला -अदालत जब तक अपना निर्णय नहीं सुनाती है ...परिवार की अधिकांश संपत्ति और ट्रस्ट पर रोक लग सकती है।"

सावित्री देवी घबरा गईं और उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा - तो फिर... क्या करें?"

रणवीर सिंह ने धीरे से कहा - एक ही रास्ता है।"

कमरे में बैठे ,सभी लोग उनकी तरफ देखने लगे ,'दुल्हन 'इसी परिवार की बहू बने...लेकिन उस बेटे की पत्नी, जिसकी वैधानिक स्थिति पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।"

कमरे में एक लंबी खामोशी छा गई ,फिर सबकी नज़र भानु पर आकर टिक गईं ।

"मतलब...?"

शादी भानु से होगी।"

ये स्वर सुनते ही दरवाज़े के बाहर खड़ी मोहिनी का ह्रदय जैसे धड़कना भूल गया ,उसके कानों में सिर्फ़ एक ही वाक्य गूँज रहा था—"शादी भानु से होगी।"इन्होंने क्या विवाह को खेल समझा है ?उसने सोचा, शायद उसने गलत सुना है ,लेकिन अगले ही पल भीतर से सावित्री देवी के रोने की आवाज़ उसे सुनाई दी वो रोते हुए कह रहीं थीं -'यह अन्याय है। "

'रूद्र ' उस निर्णय को सुनकर जैसे टूट सा गया ,वो धीरे से उठ खड़ा हुआ ,उसकी आँखों में दर्द था, लेकिन आवाज़ पूरी तरह स्थिर -'मैं 'इस फैसले के खिलाफ हूँ।"

रणवीर सिंह ने शांत स्वर में पूछा -और अगर इस फैसले से पूरा परिवार बच सकता हो तो..."अगर तुम्हारी एक ज़िद से यह हवेली, यह कारोबार और हजारों कर्मचारियों की रोज़ी खतरे में पड़ जाए। तब क्या करोगे ?

'रूद्र ' चुप हो गया ,एक तरफ उसका प्यार !दूसरी तरफ...वह जानता था...'राजवीर 'समूह में हजारों लोग काम करते थे ,उनकी ज़िंदगी भी इस परिवार के फैसलों से ही जुड़ी थी।यही बात उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गयी ,वह हमेशा खुद से पहले दूसरों के विषय में जो सोचता था।

तब भानु ने, पहली बार गुस्से से कहा,"मुझे किसी की मजबूरी नहीं चाहिए।""मैं ऐसी शादी नहीं करूँगा।"

विक्रम सिंह उसकी ओर बढ़े ,"तुम्हें यह शादी करनी ही होगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज पहली बार 'मैं' तुमसे बेटे की तरह नहीं...इस परिवार के मुखिया की तरह आदेश दे रहा हूँ।"दोनों की नज़रें  एक-दूसरे से टकराईं ,कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर भानु ने अपनी नज़रें फेर लीं ,उसकी मुट्ठियाँ इतनी ज़ोर से भींची हुई थीं, कि उँगलियों की नसें उभर आई थीं।

उधर बाहर खड़ी 'मोहिनी ' ये सभी बातें सुनकर अब और खड़ी नहीं रह सकी, वह लड़खड़ाते कदमों से हवेली के पीछे बने पुराने बगीचे में चली गई।

 रात्रि धीरे -धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही थी ,अभी भी चारों तरफ़ सन्नाटा था ,उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे ,वो उस अदृश्य ताकत से लड़ रही थी ,जो उसकी बातों का जबाब नहीं दे सकती थी -"हे भगवान...!मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था ? कहते हुए उसने आसमान की ओर देखा।

उसे स्मरण हुआ ,छह महीने पहले रूद्र ने, उससे कहा था—"अगर कभी पूरी दुनिया तुम्हारे विरुद्ध हो जाए... तब भी मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूँगा।"आज...वह दुनिया सचमुच उनके खिलाफ खड़ी थी। रूद्र के उस वायदे का क्या हुआ ?

तभी पीछे से कदमों की आहट उसे सुनाई दी। मोहिनी ने ,जैसे ही पलटकर देखा,उसके पीछे अपराधबोध लिए रूद्र खड़ा था। कुछ क्षण दोनों बिना कुछ बोले, एक-दूसरे को देखते रहे ,फिर' मोहिनी' दौड़कर उसके सीने से लिपट गई।रोते हुए  बोली -रूद्र ! कुछ बोलो..! कुछ तो कहो ! यह सब क्या हो रहा है ? कह दो !ये सब झूठ है ,तुम्हारे इंकार करने से सब रुक जाएगा "कहो, कि हम शादी करेंगे।"

रूद्र की आँखें नम हो आईं ,उसने काँपते हाथों से मोहिनी के आँसू पोंछे "काश..."बस, यही एक शब्द उसके मुँह से निकला।

मोहिनी समझ गई ,वह आदमी, जो हर मुश्किल का समाधान ढूँढ़ लेता था...आज पहली बार पूरी तरह असहाय था।

उसी समय दूर अँधेरे में खड़ा एक व्यक्ति यह सब देख रहा था ,वो और कोई नहीं ,'भानू प्रताप सिंह'  था। 

उसने दोनों को इस तरह बिछड़ने का ग़म सहते देखा ,उनकी आँखों में अपनी मुहब्बत की मौत का दर्द देखा ,जो अपने अश्रुओं से उसे श्रद्धांजलि दे रहे थे। 

आज पहली बार...उसे अपने आपसे घृणा हुई ,उसे लगा -'जैसे वह किसी और की ज़िंदगी छीनने वाला अपराधी बन गया है। उसने तुरंत चुपचाप मुड़कर वहाँ से वापस जाने का फैसला किया।

लेकिन तभी...उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी। बगीचे की मिट्टी में किसी के ताज़ा जूतों के निशान थे। ये निशान न ही रूद्र के जूतों के थे...न ही मोहिनी जूतों के...और न ही उसके अपने।

ऐसा प्रतीत हो रहा था ,जैसे कोई तीसरा व्यक्ति कुछ देर पहले वहीं मौजूद था। भानु नीचे झुका ,उन निशानों के पास उसे एक छोटी-सी धातु की वस्तु चमकती दिखलाई दी ,उसने उसे उठाकर देखा। वह एक पुराना पीतल का बटन था ,उस पर उभरा हुआ था—"आर.एच."और उसके पीछे बहुत छोटे अक्षरों में खुदा था—"तहखाना–2"

भानु  की भौंहें सिकुड़ गईं और सोचने लगा ,ये बटन किसका हो सकता है ?ये "तहखाना... 2 क्या है ?"

उसने पूरी हवेली में बचपन से लेकर आज तक कभी, किसी दूसरे तहखाने के बारे में नहीं सुना था।

दूर खड़ी 'मोहिनी'भी अनजाने में अपनी मुट्ठी को और कस लेती है ।उसे अभी तक यह पता नहीं था कि उसके हाथ में दादीसा की दी हुई चाबी पर भी वही अंक उकेरा हुआ था—

"२"

और उसी क्षण, हवेली की तीसरी मंज़िल की उसी अँधेरी खिड़की के पीछे से...किसी ने धीरे से पर्दा हटाया।दो ठंडी आँखें ,नीचे खड़े तीनों युवाओं को देख रही थीं।फिर वह साया फुसफुसाया—"खेल... आखिर शुरू हो ही गया।"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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