आधा दिन तो ठीक से बीत गया , शिल्पा ने घड़ी में समय देखा,अभी डेढ़ बज रहा था ,उसने अपने क़दम तेजी से घर की ओर बढ़ा दिए। जब तक स्कूल में थी ,सब भूल गयी थी किन्तु राह में ,स्मृतियों ने उसे घेर लिया -उसे प्रातः काल की सभी घटनाएं स्मरण हो आई ,जब वो शीघ्र अति शीघ्र घर के कामों को निपटाकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी।
तभी प्रवीण ने उसकी तरफ देखा और पूछा -तुम, जा रही हो ?
हाँ, शिल्पा ने संक्षिप्त सा जबाब दिया।
तुम्हारा अब ये रोज का हो गया ,मैंने सोचा था -तुम कुछ दिन जाओगी और तुम्हारा कमाने का भूत शीघ्र ही उतर जायेगा। तुमसे कमाने के लिए किसने कहा ? बैठे -बिठाये खाने को मिल रहा था ,हज़म नहीं होता। तुमसे घर का काम तो होता नहीं है, स्कूल संभालने चली हो।
मैं, कौन सा काम नहीं करती ? अब तक जो भी काम थे ,कौन कर रहा था ? शिल्पा लगभग चिल्लाते हुए बोली -बैठे -बिठाये तो आज तक किसी ने भी खाने को नहीं दिया , तुम्हारे यहाँ भी सारा दिन घर के कामों में मुफ़्त की नौकरानी बनकर लगी रही हूँ। तुम्हारे माता -पिता की दवाई- गोली ,तुम्हारे बच्चों का पालन -पोषण क्या हवा में ही हो गया ? उसके बदले दो रोटी खा लीं तो तुम्हें लगता है ,तुम मुझे पाल रहे थे।
चिल्लाओ ,मत ! ये घर है ,कोई कंजरख़ाना नहीं। स्कूल में क्या जाने लगीं ? तुम्हारा तो बोल भी निकलने लगा। क्या यही शिक्षा उन बच्चों को देती हो ?
शिल्पा का क्रोध बढ़ गया ,क्या ये कंजरख़ाना मैंने, बनाया है ? अब बाहर क्या जाने लगी ?आपसे बर्दाश्त ही नहीं हो रहा ,ये खुश कैसे है ? कामवालियों की तरह सारा दिन घर के कामों क्यों नहीं लगी रहती ? मुझे प्रसन्न देख ! बड़ी पीड़ा हो रही है।
क्या मैं, तुम्हें खुश देखना नहीं चाहता ?ये शब्द प्रवीण को किसी तीर की तरह जाकर लगे। और ये सब मैं किसलिए कर रहा हूँ ? घर के कार्य करने के पश्चात, सारा दिन घर में खाली ही तो रहती हो,और क्या करती हो ?
हाँ ,तुम्हें तो मेरा काम, काम ही नजर नहीं आता ,गुस्से से शिल्पा बोली।
तुम हद से ज्यादा बाहर जा रही हो ,बताओ !मुझे ,अब कौन सा काम समय पर हो रहा है ?तीन दिनों से शर्ट का बटन टूटा पड़ा है , उसके लिए कितनी बार कह चुका हूँ ? वो आज तक नहीं लगा। नाश्ता बनाती हो तो कभी ऐसे ही सब छोड़ जाती हो ,स्वयं भी कभी भूखी निकल जाती हो। ये क्या तरीक़ा है ?तुम्हें पैसा कमाने की कौन सी आफ़त है ? क्या तुम्हारा खर्चा नहीं चल रहा ? वहां सारा दिन बच्चों में दिमाग़ ख़पा कर आकर थक जाती हो। अपने बच्चों तक की परवाह नहीं है।
आप मुझे एक ग़ैरज़िम्मेदार पत्नी और माँ साबित करना चाहते हैं। अरे,... अब बच्चे बड़े हो रहें हैं ,मेरा पल्लू कब तक पकड़े रहेंगे ?उन्हें भी तो अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए।
ये अच्छा है ,बड़े अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूल जाएँ ,छोटे अपनी ज़िम्मेदारी समझें, व्यंग्य से प्रवीण बुदबुदाया।
तभी शिल्पा उसके सामने आकर खड़ी हो गयी और बोली -मैंने अपनी ज़िम्मेदारी कब नहीं निभाई ? तभी घड़ी में समय देखा ,साढ़े सात बज चुके थे। तभी अपने कपड़े लेकर बड़बड़ाते हुए नहाने के लिए स्नानागार की तरफ लपकी। न जाने, आज किसका मुँह देख लिया ? आज देर हो जाएगी। स्कूल की प्रधानाध्यापक ही देरी से जायगी तो औरों से क्या कहेगी ?उसे झुंझलाहट हो रही थी, वो क्यों प्रवीण से लड़ने लगी ?
जल्दी -जल्दी तैयार हुई ,जरूरी सामान पर्स के हवाले किया और मुँह बनाते हुए बोली - नाश्ता मेज पर रख दिया है।
बड़ा एहसान ! मैं तो बनाकर भी खा लेता, उसका व्यंग्य सुनकर भी वो घर से बाहर निकल गयी। अब लौटते समय सम्पूर्ण घटना स्मरण हो आई।
घर पहुंची तो.... ढेर सारे गंदे बर्तन उसका मुँह चिढ़ा रहा थे। उन्हें देखकर उसने मुँह बनाया ,आज इच्छा नहीं हो रही थी ,अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गयी किन्तु भूख भी तो लगी थी। उसकी नजर अपने बिस्तर के दाईं तरफ गयी ,टेबल पर एक पैकेट रक्खा था ,उसने वो पैकेट उठाया ,देखा तो उसमें फल रक्खे हैं। उसकी जान में जान आई और उसने कुछ फल खाये ,पेट को राहत मिली ,तन में थोड़ी जान आई फिर भी बिस्तर पर लेटी रही ।
सोचने लगी - प्रवीण भी तो सारा दिन अपने व्यापार में लगे रहते हैं , घर आकर, आराम करते हैं , अब ऐसे में उन्हें समय पर भोजन भी न मिले तो कहेंगे ही.... अब मुझे कितनी भूख लगी थी ? कुछ फल मिल गए तो आराम मिला। वैसे उन्हें मेरी परवाह तो है ,तभी फ़ल रखकर गए हैं। तभी उसे जैसे कुछ स्मरण हुआ ,वो रसोई की तरफ दौड़ी। भगोना उघाड़कर देखा ,तो उसने ''माथा पीट लिया। ''लड़ाई के चक्कर में, उसने खाना तो बनाया ही नहीं था। जल्दबाज़ी में नाश्ता रखकर चली गयी थी।
अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था ,ये बात तो प्रवीण सही कह रहे हैं - मेरी इस नौकरी से घर अस्त -व्यस्त होता जा रहा है। अब उसका आलस्य न जाने कहाँ ग़ायब हो गया ?उसने तुरंत ही रसोई साफ की ,बर्तन साफ किये और सब्जी छौंक दी ,घड़ी में समय देखा ,अभी तो चार ही बजे हैं। उसने अपने लिए चाय बनाई और आटा गूंथकर रख दिया। जैसे ही प्रवीण आएंगे ,तुरंत खाना बना दूंगी।
अपनी चाय और हल्का नाश्ता लेकर बिस्तर पर आई और आराम से चाय पीने लगी, सोच रही थी - मेरे विवाह को अट्ठारह बरस हो गए। प्रवीण कमाने में व्यस्त हो गए और मैं घर में ,कभी सास -ससुर का अलग खाना बनाना ,बच्चों के लिए अलग ,कब दिन निकलता और कब रात होती ? पता ही नहीं चलता था।
नए जोश के साथ दिन में उठती,और देर रात्रि तक निढ़ाल हो जाती। प्रवीण ने भी जैसे विवाह करके अपने माता -पिता के कहे से, विवाह करके अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण किया। उसके बाद शुरू के दिनों में एक -दो पिक्चर दिखाकर लाये। उसके बाद तो इन्होने पूछा भी नहीं। शिल्पा कैसी हो ? चलो !आज कहीं घूमने चलते हैं। आज तक उन दो फिल्मों के अलावा कभी नहीं कहा -तुम खुश तो हो न.... आओ ! चलो आज कोई नई फ़िल्म देख आते हैं या फिर कोई उपहार भी लाये हों।
अब थोड़ा सुकून मिला है ,तो सोचा ,अब अपनी इच्छा से कुछ करूंगी ,हालाँकि ये कार्य भी ज़िम्मेदारियों से भरा है किन्तु इसे करके लग रहा है ,मैं अपने लिए ,अपनी ख़ुशी के लिए कुछ कर रही हूँ। मैं भी हूँ। अब प्रवीण को परेशानी होने लगी। मुझे सारा दिन घर में देखने की उसकी आदत जो हो गयी है इसीलिए उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा कि मैं अपनी ख़ुशी के लिए कुछ करूं।
