केशवदास जी, घर पर भोजन करने के लिए आए थे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को बुलाया और उनसे कहा - तुम प्रेम के बड़े भाई हो , क्या तुम्हें इतना भी ध्यान नहीं रहता ?कि उसकी पढ़ाई को देखो !वो क्या कर रही है ?क्या नहीं ?
पापा ! हम तो उसे बहुत कहते हैं किन्तु वो कोई न कोई बहाना बनाकर हमें टाल देती है।
वो बहाना बनाती है और तुम उसके बहकावे में आ जाते हो ,उन्होंने उसे डाँटा और बोले -वो तुमसे उम्र में छोटी है या बड़ी....
क्या तुममें इतनी भी अक़्ल नहीं है कि उसका ध्यान रख सको ! तुम्हारी दोनों बहनें अपनी ससुराल में हैं ,उन बेचारियों की शिक्षा पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया किन्तु अब ये घर में है ,कम से कम आठवीं या दसवीं तो कर ले, तो कम से कम तुम्हारी बड़ी बहनों की तरह हमसे शिकायत तो नहीं करेगी।
पापा ! हम कोशिश तो करते हैं किन्तु उसके भेजे में ही नहीं भरता ,गुस्से से मंझले भाई ने कहा।
उन्होंने सख़्ती से उसे डांटा और बोले -तुम कितनी बार उसे पढ़ाने बैठे हो ?और ऐसे तेवर दिखा रहे हो जैसे कितना पढ़ाते हो।
हमें कौन पढ़ाता है ? हम भी तो स्वयं ही लगे रहते हैं। वो जब पढ़ना ही नहीं चाहती,हमसे छोटी तो है किन्तु बातें तो बड़ों जैसी करेगी ,बस पढ़ाई में ही दिमाग़ नहीं है।
उनका लहज़ा थोड़ा नर्म हुआ और बोले -वो छोटी है ,नादाँ है ,उसे इतनी अक़्ल ही होती तो हमें उसकी फ़िक्र करने की क्या आवश्यकता थी ? जिसको भी थोड़ा बहुत समय मिले उसे पढ़ाने का प्रयास करो !वो घुम्मकड़ हो गयी है ,सारा दिन गांव में घूमती रहेगी तो कैसे काम चलेगा ? उसे बड़े भाई होने के नाते डांटों और उसे पढ़ाओं ! त्रेमासिक परिक्षा में ,एक नंबर से ही पास है ,वो भी नहीं आता तो फेल हो जाती।
पापा !जब वो पढ़ना ही नहीं चाहती तो उसे पढ़ाना ही क्यों है ? सबसे छोटे मनोज ने पूछा -पढ़कर ,उसे क्या नौकरी करनी है ? जब वे दोनों नहीं पढ़ीं तो ये ही कौन सा तीर मार लेगी ?
तीर तो नहीं मारेगी किन्तु मैं नहीं चाहता उन दोनों की तरह, उसकी भी अपनी कोई ज़िंदगी न रहे , ये कुछ तो करे। तेरह बरस की हो गयी है ,कम से कम दसवीं ही कर ले।
पर.... पापा ! तभी बड़े भाई ने उसके हाथ पर हाथ मारा और इशारे से पिता से कुछ भी कहने से मना किया।
तीनों भाई अब शांत खड़े थे ,तब केशवदास जी ,अपनी बात को अंतिम चरण देते हुए बोले -अब सब समझ गए ,तुम अपनी पढ़ाई तो करो ही , अपनी बहन का भी, ख्याल रखा करो ! उसे कुछ चीजें समझ में न आएं, तो बता दिया करो ! अपने बच्चों को समझाकर केशवदास जी तो चले गए।
पापा ! वो तो कुछ पूछती ही नहीं है ,उनके जाने के पश्चात छोटा कहकर हंस रहा था।
पूछेगी, कैसे ?उसे सब आता है। बस जब परीक्षाएं होती हैं ,तब भूल जाती है ,कुछ भी लिखकर नहीं आती और फेल हो जाती है। हम उससे पढ़ने के लिए कहते हैं, तो हम पर चिल्ला देती है।
तभी बड़े भाई बोले - यह सब तेरी मां के कारण बिगड़ी है, यह उसे, कभी डांटती ही नहीं है , कह देती है -नादान है, बच्ची है, इसे अगले घर जाना है। ये समझना ही नहीं चाहती, लड़की का पढ़ना कितना जरूरी है ? कहते हुए उसने अपने माथे पर हाथ रक्खा।
अपने बेटों की हरकतें चिंता यानि उनकी माँ [चिंतामणि ]देख रही थी ,कमरे में आते हुए बोली -तुम्हें शर्म तो आती नहीं है ,अपने पिता की नकल करते हुए।
माँ को देखकर तीनों एकदम से शांत हो गए।
ये सब क्या हो रहा था ?तुम्हारे पिता तुम्हें समझाकर गए हैं ,कुछ भेजे में भरा है या नहीं।
मम्मी !आप और पापा हमें ही कहते हो ,उसे कुछ नहीं कहते। हर बार वो ही संवाद सुन -सुनकर हम थक गए हैं। हमने कितनी बार उसे समझाने का, पढ़ाने का प्रयास किया किंतु वह सुनना ही नहीं चाहती है, ना ही पढ़ना चाहती है। याद तो उसे ही करना होगा,हम तो समझा सकते हैं। मुझे तो यह ही समझ नहीं आ रहा कि आप लोग, उसके साथ इतना जबरदस्ती क्यों कर रहे हैं ? कल को उसका भी विवाह कर देना, बात खत्म !
तुम्हारे पिता उसे पढ़ाना चाहते हैं, वह चाहते हैं 'कि यह किसी बात के लिए भी,अपने पति पर निर्भर न रहे। अब ज़माना बदल रहा है ,हमें भी तो अपनी सोच बदलनी होगी। हमारे यहां अभी नौकरी का चलन नहीं चला है किंतु अगर यह पढ़ी- लिखी होगी, तो समझदारी से काम लेगी। तभी कुछ न कुछ तो जीवन में अच्छा करेगी ही....
समझदार तो वो बहुत है ,मम्मी!' बड़ों -बड़ों के कान काट दे !'आप उसे घर के काम ही सिखाइएं !
कोशिश तो कर रही हूँ ,किन्तु उसका तो घर के कामों में भी मन नहीं है ,मैंने ये बात तुम्हारे पापा को भी नहीं बताई ,वो और नाराज़ होंगे।
उसे बैठाकर पढ़ाने का हम भी प्रयास करेंगे किंतु मुझे इतना विश्वास है कि वह पढ़ना ही नहीं चाहती है या फिर उसके भेजे में कुछ भरता ही नहीं है।
सब मिलकर कोशिश करेंगे तो वह पढ़ लेंगी, मां ने सहजता से बच्चों को समझाया- कम से कम इस क्लास से तो ऊपर निकल जाए। हो सकता है ,वो पास हो जाये तो उसका हौसला बढ़े और आगे पढ़ना चाहे।
ठीक है, अब हमारी जिम्मेदारी, यह साल तो उसे पास करा ही देंगे, आगे पढ़ने के लिए दोनों बड़े भइया तो शहर चले जाएंगे ,मैं ही अकेला रह जाऊंगा।
ठीक है ,जब तक जिसको भी समय मिले, अपना काम करो ! हमें अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना है बाक़ी उपरवाले के हाथ है ,वो जैसा चाहेगा ,कहकर माँ बोली -आज मकई की रोटी बनाई हैं ,दूध में भिगोकर रख दूँ।
नहीं ,आज मकई की रोटी का चूरमा बना दो !बड़ा मन कर रहा है।
एक गृहणी ,जो माँ है ,पत्नी है ,घर के कार्यों के साथ -साथ पति की इच्छा -अनिच्छा का भी ख़्याल रखती है और अपने बच्चों के भविष्य के लिए भी चिंतित रहती है। स्वयं थक जाये, किन्तु बच्चों में ,नई उम्मीदें जगाती है। वर्तमान में जी कर भी भविष्य के स्वप्न देखती है। उम्मीदें ,सकारात्मक सोच उसे थकने नहीं देतीं। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न सजाती है और प्रतिदिन की तरह अपने कार्यों में जुट जाती है।
इतनी तेज गर्मी पड़ रही थी, सभी गर्मी के कारण परेशान थे, गांव के सभी लोग आस लगाए बैठे थे , अब तो बरसात हो जानी चाहिए। इतनी उम्मीदों के पश्चात, आज मौसम में थोड़ा बदलाव था। कुछ' बादल' गांव की तरफ आते दिखलाई दिए। तभी जोरों से हवा चलने लगी ,सबकी बंधी उम्मींदें उस हवा पर आकर ठहर गयीं।
तभी टप से एक बूँद किसी के चेहरे पर तो किसी के हाथों पर गिरी ,चेहरों पर प्रसन्नता छाई और निगाहें आसमान पर टिक गयीं। महिलाएं छतों पर सूख रहे गेहूं ,कपड़े उतारने लगीं। वो बरसात के आगमन की तैयारी में जुट गयीं। बादल घुमड़ कर आ रहे थे, खेत सूखे पड़े हैं ,यह देखकर लोगों को फिर से उम्मीद बंध गई थी।
