Aakhiri mulakat

बरसों पुरानी हवेली आज फिर रोशनी से जगमगा रही थी। आँगन में लोगों की भीड़ थी, हँसी-ठिठोली चल रही थी, मधुर संगीत वातावरण को मोहक बना रहा था लेकिन उस भीड़ के बीच खड़ी अनन्या के मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। दस साल के पश्चात आज वह अपने गाँव लौटी थी।

यह उसके दादा की सौवीं जयंती का समारोह था। परिवार के सभी सदस्य देश-विदेश से आए थे। अनन्या भी आई थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि इस समारोह में उसकी मुलाकात उस व्यक्ति से भी होगी जिसे वह अपनी ज़िंदगी से बहुत पहले विदा कर चुकी थी।


उसका नाम था, कबीर ! एक समय था, जब दोनों एक-दूसरे के बिना अपने भविष्य की कल्पना भी नहीं कर सकते थे किंतु किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था , कबीर के पिता पर भारी कर्ज हो गया था , परिवार टूटने की कगार पर था। कबीर को पढ़ाई छोड़कर, कमाने के लिए बाहर जाना पड़ा। 

इधर अनन्या की मां गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं। ऐसे समय में दोनों पर जिम्मेदारियों  का बोझ आन पड़ा। उन्होंने प्यार से पहले अपनी जिम्मेदारियों को चुना।

कोई धोखा नहीं, कोई झगड़ा नहीं किसी प्रकार की कोई गलतफहमी भी नहीं, बस परिस्थितियों ने दोनों को अलग कर दिया। समय के साथ -साथ दोनों अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में इतने व्यस्त हो गए ,पहले दोनों फ़ोन पर बातचीत तो कर लिया करते थे किन्तु अब धीरे-धीरे बातचीत  भी कम हो गई और फिर बंद हो गई।

ज़िम्मेदारियों और दूरियों ने उन्हें और दूर कर दिया और एक दिन दोनों की कहानी बिना किसी अंतिम संवाद के समाप्त हो गई।

अनन्या आँगन में खड़ी थी, जब उसकी नज़र सामने खड़े कबीर पर पड़ी। 

वह कुछ दूरी पर खड़ा लोगों से बातें कर रहा था।समय ने उसके चेहरे पर परिपक्वता की रेखाएँ खींच दी थीं, किन्तु  उसकी आँखें आज भी वही बोलती सी नज़र आ रही थीं।

एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।दस साल जैसे एक क्षण में सिमट गए। आज दोनों एक दूसरे को किसी अज़नबी की तरह देख रहे थे। जाने -पहचाने से अज़नबी ,कबीर धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा और बोला -"कैसी हो, अनन्या?"

अनन्या के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।"ठीक हूँ और तुम?"

"ज़िंदा हूँ।"दोनों हँस पड़े।दोनों एक दूसरे को नजरें चुराकर देख रहे थे। अनन्या देख रही थी ,कबीर कितना बदल गया है ?आँखों पर चश्मा भी लग गया है। 

अजीब बात थी ,दस साल की दूरी के बाद भी बातचीत में कोई बनावट नहीं थी। शाम ढलने लगी थी ,तभी कबीर बोला -आओ !चलते हैं। 

शोरगुल से दूर दोनों हवेली की छत पर चले गए।वही छत, जहाँ कभी वे दोनों घंटों बैठकर बातें किया करते थे ,भविष्य के सपने देखा करते थे। किन्तु आज जैसे उनके पास शब्द ही नहीं रह गए हैं। 

कुछ देर दोनों चुप रहे फिर कबीर बोला -"जानती हो, मैंने कई बार सोचा था कि अगर कभी हमारी मुलाकात हुई तो तुमसे बहुत सारी शिकायतें करूँगा।"

"फिर?"अनन्या ने उसकी तरफ देखा। 

"अब याद ही नहीं कि शिकायत क्यों और किस बात पर करनी थी ?"

अनन्या मुस्कुराई ,"मेरे साथ भी ऐसा ही है।"सोचती थी - तुमसे मिलूंगी तो लड़ाई करूंगी ,तुमने मुझे क्यों भुला दिया ?

हवा में ठंडक घुल रही थी ,दोनों दूर खेतों में चमक रहे जुगनूओं को देख रहे थे।

"तुमने शादी कर ली?" अचानक कबीर ने पूछा।

"नहीं।"

"क्यों?"

"शायद ,कोई सही व्यक्ति मिला ही नहीं ....।"

फिर उसने सवाल लौटा दिया -"और तुमने ?"

दूर अँधेरे में देखते हुए कबीर ने सिर हिलाया ,"नहीं।"

"क्यों?"अनन्या ने उसकी दृष्टि का अनुसरण किया। 

कबीर कुछ क्षण चुप रहा।"क्योंकि कुछ लोग दिल में ऐसी जगह बना लेते हैं, जहाँ किसी और को बैठाना मुश्किल हो जाता है।"

अनन्या ने उसकी ओर देखा।

कबीर की आँखों में कोई शिकायत नहीं थी,सिर्फ़ सच्चाई थी।"तुम आज भी वैसे ही बोलते हो," उसने कहा।

"और तुम आज भी वैसे ही सुनती हो।"दोनों हँस पड़े एक -दूसरे की तरफ देखा और नज़रें स्वतः ही झुक गयीं और वहां मौन स्थापित हो गया।  

रात गहराने लगी,नीचे समारोह अपने चरम पर था, लेकिन छत पर समय जैसे धीमा पड़ गया था।

"क्या तुम्हें कभी लगा कि हमने हार मान ली थी?" अनन्या ने पूछा।

कबीर ने आसमान की ओर देखा,"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि हार तब होती, जब हम अपनों को छोड़कर भाग जाते। हमने प्रेम खोया था, लेकिन अपने कर्तव्य नहीं छोड़े थे।"

अनन्या की आँखें नम हो गईं, क्योंकि दस साल बाद किसी ने उसके मन का बोझ शब्दों में ढाला था।

अचानक नीचे से किसी ने आवाज़ लगाई -"कबीर! तुम्हारी फ्लाइट का समय हो रहा है!"

अनन्या चौंक गई ,"क्या ,तुम आज ही जा रहे हो?"

"हाँ, रात की फ्लाइट है।"

उसके भीतर एक अजीब खालीपन उतर आया ,अभी कुछ भरने सा लगा था किन्तु अब लगा जैसे सब रिक्त हो गया। उसे एहसास हुआ कि यह मुलाकात शायद सचमुच आखिरी थी।

वे दोनों नीचे आए, हवेली के मुख्य दरवाजे तक साथ चले,सामने टैक्सी खड़ी थी।

कबीर ने अपना बैग उठाया ,कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

दस साल पहले उनके पास विदाई का मौका भी नहीं था।आज था।

"कबीर..." अनन्या ने धीमे से कहा।

"हूँ?"

"अगर जीवन हमें दूसरा मौका देता तो?"

कबीर मुस्कुराया।

"तो शायद हम फिर वही गलतियाँ करते।"

"और अगर सही निर्णय लेते?"

"तब शायद यह मुलाकात इतनी यादगार नहीं होती।"वो यादगार लम्हें हमारे जीने का संबल बनेंगे। 

अनन्या की आँखों में आँसू आ गए ,लेकिन इस बार उसने उन्हें छिपाया नहीं।

कबीर ने धीरे से कहा -"हर कहानी का उद्देश्य साथ रहना नहीं होता। कुछ कहानियाँ हमें बेहतर इंसान बनाने के लिए होती हैं।"

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया ,अनन्या ने थाम लिया ,दोनों कुछ क्षण वैसे ही खड़े रहे ,कहीं  कुछ टूट रहा था। 

 कबीर टैक्सी में बैठ गया। गाड़ी चल पड़ी।अनन्या सड़क के किनारे खड़ी उसे जाते देखती रही।

गाड़ी दूर होती गई ,धीरे-धीरे उसकी लाल टेल लाइट अंधेरे में खो गई।

और उसी क्षण अनन्या को एहसास हुआ कि कुछ लोग हमारी मंज़िल नहीं बनते।वे हमारे सफर का सबसे खूबसूरत हिस्सा बनते हैं ,वह मुस्कुराई -प्यारी यादें दे गया ,फिर कभी न भुलाने के लिए। 

आँखों में आँसू थे, लेकिन दिल में शांति थी क्योंकि इस बार उनकी कहानी बिना अधूरे शब्दों के समाप्त हुई थी। उसके ह्रदय ने उससे पूछा -क्या यह सचमुच उनकी ''आखिरी मुलाकात'' थी ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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