Insaniyat mit rahi hei

माता-पिता की आंखों का तारा इकलौता, उनका दुलारा , 'पैरा एथलीट चिराग़ त्यागी ', जीवन में आगे बढ़ रहा था। माता-पिता को उससे बहुत सी उम्मीदें थी। अपने जीवन की जमा -पूँजी उसके सपनो को साकार करने में लगा दी। 

बचपन से ही उसको खेल -कूद का शौक था उन्होंने उसके शौक को बरकरार रखा। ताकि वह जिस भी क्षेत्र में जाए उन्नति करें। चिराग भी बहुत परिश्रम करता था, हालांकि उसकी आंखों से ज्यादा दूर का नहीं दिखता था। शायद यह बीमारी उसे बचपन से थी। किंतु बचपन में घर वालों को पता नहीं चला।  बाद में उनको  इसका एहसास हुआ। बढ़ती उम्र थी ,ऊँची  उड़ान भरने की तैयारी थी।  उत्साह से आगे बढ़ना चाहता था। मंजिलें उसके कदम चूमने को आतुर थीं।


किन्तु क़िस्मत को न जाने क्या मंजूर था ? नियति न जाने क्या रचना रचे हुए थी ?बेंगलुरु वो 'गोल्ड मैडल 'जीतकर आया था। जहाज से उतरकर घरवालों को फोन किया ,कैब करके आ रहा हूँ। घर में ख़ुशी की ल हर दौड़ गयी। उसके इंतजार में,' पलकें बिछाए' बैठे थे। किन्तु वो नहीं आया ,उन्होंने अंदाजा लगाया ,अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था। उसने आने में देर क्यों कर दी ? उसे फोन किया ,उसका  फोन भी नहीं लग रहा था। न जाने उसे क्या हुआ ? उन्हें क्या मालूम था ?बस इतनी ही देर की ख़ुशी थी ,उनके जीवन में अंधकार छाने वाला है। उनके घर पर संताप के बादल मंडरा रहे हैं। 

जिसकी  वो, इतनी देर से प्रतीक्षा कर रहे हैं ,वो अब कभी नहीं आएगा। मन को आशंकाओं ने घेर लिया किन्तु न ही वो आया, न ही उसका कोई संदेश !

उसके चाचा को किसी का फोन आया -आपके भतीजे के साथ शायद  कोई दुर्घटना हो गयी है।  

कई सालों से उसके साथ रहता आया था उसके साथ ही खाता -पीता था ,यूं कहो , ''लंगोटिया यार था। '' वह अपने घर से ज्यादा चिराग के घर रहता था कभी जरूरत होती तो चिराग उसकी आर्थिक सहायता भी कर देता था। बरसों से उठना- बैठना था ,मिलना- जुलना था। कई वर्षों से साथ मिलकर ही आगे बढ़ने का स्वप्न देख रहे थे। न जाने कब ?' यश खटीक' की आंखों में वह चुभने लगा। चिराग ने कभी भी गलत का साथ नहीं दिया और ना ही गलत किया, किंतु उसका दोस्त खेल में भी कुछ चालाकियां करता था किन्तु दोस्ती के नाते अक्सर चिराग उसे समझा दिया करता था लेकिन यह बात भी, उसे रास नहीं आई। 

जरूरत के लिए, यह उसके घर जाता रहता था। माता-पिता को भी कोई आपत्ति नहीं थी। उन्हें लगता था, बचपन के मित्र हैं , उनका एक ही इकलौता बेटा था, एक से भले दो यही सोचकर उसे साथ रहने दिया। किंतु किसी को क्या मालूम था ?उसका यही दोस्त ,उनकी जिंदगी में अंधेरा कर जाएगा उनके लाल को उनसे छीन कर ले जाएगा। चिराग को बेंगलुरु में हो रहे खेल में जीतने के लिए गया था और जीत भी गया था।

 वह तो' कैब ' करके घर आ रहा था किंतु तभी उसके दोस्त का फोन आया ,उसने कहा- कि तू कैब से मत आ ! मैं गाड़ी  लेकर आ रहा हूं , तू हमारा इंतजार कर और तब खुश होते हुए चिराग ने, उसकी प्रतीक्षा की, उसे क्या मालूम था ? उन्होंने 'आस्तीन में सांप पाला हुआ है' , कभी न कभी वह डसेगा ही....  और आखिर यही हुआ दोस्ती के नाते वह उसे साई  बाबा के उपवन में लेकर गया और वहां पर अपनी योजना को अंजाम दिया।

 देखते ही देखते, उनकी दुनिया उजड़ गई। जिसको, उसके घरवालों ने, उसको भाई समान माना था उसकी हर तरह से, सहायता की, वही उसकी जिंदगी को लील गया। 

मां -बाप की जिंदगी में अंधेरा कर दिया। जो लड़का,बेंगलुरु में ४००  की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर , अक्टूबर में जापान के पैरा एशियन गेम्स में खेलने के लिए जाने वाला था, वह रक़्त रंजित साईं उपवन में पड़ा मिला। जो उसका क़रीबी मित्र था ,उसने ही,उस चिराग़ को बुझा दिया। जिसने,  हमेशा उस यश खटीक की आर्थिक सहायता की ,उसको दोस्त से बढ़कर समझा ,उस पर भरोसा किया ,वो तो सर्प निकला ,उसी ने डस लिया।

आज  इंसानियत इसीलिए तो मिट रही है ,इसलिए कोई किसी की सहायता के लिए आगे नहीं आता। जाने वाला तो चला गया किन्तु अपने पीछे अपने बूढ़े होते माता -पिता और उनकी आँखों में जो उम्मीदों की ज्योति जल रही थी। उन आँखों में नाउम्मीदी छोड़ गया। जहाँ लोग कृष्ण -सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हैं। आगे ऐसे उदाहरण भी दिए जायेगें, जिसमें माता -पिता अपने बच्चे से दोस्ती जैसे रिश्ते से भी बचकर रहने को कहेंगे। 

हर बच्चे के अभिभावक अब, अपने बच्चे के मित्र को संदेह की नजर से देखेंगे।कहीं ये 'यश खटीक 'जैसा धोखबाज़ तो नहीं।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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