Zeenat [ part 67]

ज़ीनत ,इंस्पेक्टर कविता से बताती है - वो ,अपने प्रेमी आसिफ़ से बहुत मुहब्बत करती थी ,इसीलिए उसकी उचित -अनुचित बातों को भी मान लेती थी। वो भी मुझसे मुहब्बत करता है।  इसी तमन्ना में मैं, उसका कहना मानती रही।

 उस काम को करके मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती थी। कभी -कभी मुझे लगता मैं, उसके हाथों की' कठपुतली' बन गयी हूँ।' ये इश्क़ जो न करवाए वही कम ''कहकर हल्का सा मुस्कुराई किन्तु उस मुस्कुराहट में दर्द था। 


मनोरमा बोली -देख लो ! मैडम ! उसके कारण इसकी क्या दशा  हो गयी है ?और इसे अभी भी इश्क़ सूझ रहा है। अभी भी इसके इश्क़ का बहुत नहीं उतरा। 

नहीं ,पुलिस जी ! उसने, मुझसे इश्क़ ही तो नहीं किया। वो तो मेरा सौदा करता रहा ,मेरी हर रात की कीमत वसूलता रहा। न दिन को चैन, न रात को आराम अब मुझे थकान होने लगी थी। मैं बहुत परेशान थी। अब मुझसे और नहीं हो रहा था। तब मैंने पूछा ,आसिफ़ ! ये सब कब तक चलेगा ?

क्या हमारे खर्चे नहीं हैं ,उनमें भी तो खर्चा होता है। 

 मैं रात -दिन मेहनत करके कमा रही हूँ। तेरा तो पेट ही नहीं भरता। अब तो खाना भी मैं, ही लेकर आ जाती हूँ। इस कबाड़ से घर का किराया ही तो जाता है। तू क्या समझता है ,अब मुझे कुछ समझ नहीं आता। तू चोरियां भी करता है ,मेहनत करना नहीं चाहता। मुझे लगता है ,तू, मुझसे निक़ाह भी करेगा या नहीं। 

आसिफ़ को लगा, शायद अब इसका यक़ीन मुझसे हटने लगा है ,यदि इसने काम करने से मना कर दिया तो बैठे बिठाये जो कमाई हो रही है ,वो मिलनी बंद हो जाएगी। इसकी ये अच्छी बात है ,ज्यादा खर्चा भी नहीं करती और न ही पैसों का कभी हिसाब मांगती है ,क्योंकि इसे गिनती और हिसाब -किताब आता ही नहीं है।  ये चली गयी तो इतनी जल्दी कोई और मिलना मुश्किल है। वो तो इसकी बहन इसे अपने घर से निकालना चाहती थी ,इसीलिए मुझसे कह दिया -इसे यहाँ से ले जा ! इससे प्यार कर ,निक़ाह कर ,कुछ भी कर यहाँ से दूर ले जा ! वो इससे अपना छुटकारा चाहती थी। 

तब आसिफ़, ज़ीनत से बोला -चल ,आज तुझे दिखाकर लाता हूँ ,तू परेशान न हो। थोड़ी कमजोरी आई होगी दवाई खाकर आराम करेगी तो फिर से दौड़ने लगेगी और फिर हम दोनों किसी दूसरे शहर में जाकर निक़ाह करके शान से रहेंगे।

 उसकी उन बातों ने ही मेरे अंदर जैसे जान डाल दी हो। मैं तेज़ी से उठी और उसके साथ डॉक्टर के गयी। मुझे हल्का बुखार और कमजोरी महसूस होने लगी थी, बीमारी तो दिखानी ही थी। 

 तब डॉक्टर ने बताया -कोई बात नहीं ,ठीक हो जाएगी और  बुख़ार ,कमज़ोरी के लिए दवाई दे दी। कुछ दिनों तक तो ठीक सा लगा ,परन्तु बुखार नहीं उतर रहा था। तब डॉक्टर ने मेरे टैस्ट करवाए। 

कैसे टैस्ट ?

मुझे नहीं पता ,मेरा खून लिया ,दुबारा गयी तो और टैस्ट करवाया। 

मुझे डाक्टर ने  घूरकर देखा, जैसे -ये देखती हैं ,उसने मनोरमा की तरफ इशारा किया। 

क्यों ?उसकी हरक़त देखकर दोनों अपनी हंसी न रोक सकीं ,उन्हें लगा मासूम तो है, किन्तु लोगों ने इसकी मासूमित का बहुत लाभ उठाया है। अब जब भी इसे एहसास होता है ,ये छली गयी है। तब -तब इसे गुस्सा आता होगा और ये गालियाँ बकती होगी। उसे ध्यान से देखा -इसकी क्या हालत हो गयी है ?सूखा बदन ,बिखरे बाल ,आँखों में ना उम्मीदी , मन में भरा गुस्सा , ज़बान पर गालियाँ !वो तो अब यहाँ कैद में है। डंडा देखते ही सहम जाती है।

अच्छा ये बता !डॉक्टर ने क्या बताया ? मनोरमा ने पूछा। 

मुझे नहीं पता ,किन्तु जब हमारी ज़िंदगी में डॉक्टर आया ,उसने जो कुछ भी आसिफ़ से कहा -   उसे सुनकर आसिफ का रवैया बदल गया। अब वह मुझे डांटने - धमकाने लगा और मुझसे दूर रहता, उसने अपनी भी जाँच करवाई। 

मैंने पूछा ,तुझे क्या हुआ है ? अब तू पहले जैसा नहीं रहा। 

चिल्लाकर बोला - तुझे छूत की बीमारी हुई है ,ये बिमारी कहाँ से लेकर आई ? अब तू यहाँ नहीं रह सकती चल निकल मेरे घर से.... 

आसिफ़ मैं कहाँ जाउंगी ? ये तेरा ही घर नहीं है ,मैंने भी पैसा कमाया है।

 तुझे अभी बताता हूँ ,कहकर मारने के लिए उठ खड़ा हुआ ,परन्तु रुक गया ,अब तो मुझे छूने से भी घबराने लगा और एक दिन तो उसने, मुझे घर से बाहर ही कर दिया।

 मुझे नहीं पता था ,मुझे कौन सी बीमारी लगी है ? परन्तु मैं अभी उन दवाइयों से ठीक थी ,अब मैं सड़क पर आ गई थी। मुझे तो ये ही नहीं पता था ,मेरे साथ उसने ऐसा क्यों किया ? मैं अपने आपको देख रही थी ,मेरा शरीर तो बिल्कुल ठीक लग रहा था ,सिर खुजलाते हुए बोली - पता नहीं ,कैसी छूत की बीमारी  है ? मुझे गुस्सा आया ,इसी बिमारी के कारण मेरे आसिफ़ ने मुझे छोड़ दिया।  

मेरे पास न छत थी ,न ही पैसे थे ,न ही खाने को कुछ था। मेरे पास मेरी पोटली में कुछ कपड़े दवाई और उसका पर्चा था। मैं किसी तरह बस में बैठी और पूछ -पूछकर यहाँ इस शहर में आ गयी। कई साल हो गए थे ,मैं अपना घर भूल गयी थी। अब तो पुलिस जी मुझे थोड़ी अक़्ल आ गयी थी ,मुझे पता था ,मैं सुंदर हूँ , पैसे वाले बेसहारा को देखकर काम भी देते हैं और पैसा भी.... पर मुझे ध्यान था ,आसिफ़ ने मुझसे कहा था  - मुझे छूत की बीमारी है।

 मुझे एक बड़े घर में काम मिला, और रहने को जगह भी मिल गयी। उनके यहाँ में सारा दिन काम करती बदले में मुझे खाना -पीना मिलता। मेरी दवाई खत्म हुई तो मुझे फिर से बुखार होने लगा ,मेरी मालकिन ने मुझे बुखार की दवाई  दी। कुछ दिन ठीक रहती, फिर से हालत बिगड़ जाती। तब एक दिन उन्होंने मुझे डॉक्टर के पास जाने को कहा। 

मैं सरकारी डॉक्टर के पास गयी ,उसने मुझे देखा और पूछा -तुम्हें कब से बुखार है ?

कई महीने हो गए ,डॉक्टर साहब !

तुमने पहले भी ,कोई दवाई खाइ हैं। 

हाँ ,जब दूसरे शहर में रहती थी। 

तुम्हारा शौहर कहाँ है ? अब मैं कैसे कहती ?मेरा तो निक़ाह ही नहीं हुआ। मुझे ड़र लग रहा था ,कहीं इसे पता न चल जाये ,मुझे छूत की बीमारी है और उसने, मुझे अपने घर से भगा दिया। 

मेरा शौहर दूसरे शहर में रहता है। कमाने गया है। 

उसे बुलाओ ! तुम्हारी जाँच करनी होगी। 

अब मैं डाक्टर से क्या कहूं ? तब मैंने कहा -डाक्टर जी ! मेरी  जाँच तो पहले हुई थी ,मेरे पास पर्चा है। 

कल उसे लेकर आना ,कहकर डॉक्टर ने मुझे थोड़ी सी दवाई देकर भेज दिया। 

अगले दिन मैं जाना नहीं चाहती थी किन्तु मेरी मालकिन ने कहा ,बिमारी को बढ़ाना ठीक नहीं ,जाओ !डॉक्टर को दिखाकर आओ !

मेरे पास तो,उसे देने के लिए  फीस भी नहीं है। 

क्या उसने, तुमसे कल फ़ीस मांगी थी ?

नहीं ,

तब तुम जाओ !और दिखाकर आओ ! सच पुलिस जी वो औरत बहुत अच्छी थी ,पर मैं ड़र रही थी ,कहीं इसे मेरी छूत की बीमारी का पता न चला जाये।

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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