Ek aam mahila ki diary

तन्वी ने ,बहुत पहले एक डायरी लिखनी आरंभ की थी, क्योंकि टीचर ने कहा था- कि हमें डायरी लिखते रहना चाहिए। डायरी लिखने से हमें अपने गलतियों का एहसास होता  है और फिर हम अपनी गलतियों को में सुधार भी कर सकते हैं।

 हमने अध्यापिका की बात मानकर डायरी लिखना आरंभ कर दिया किंतु जब डायरी को कुछ दिन बाद पढा तो, उसमें लिखा था- कि  कितने बजे मैं स्कूल से आई और कितने बजे मैंने खाना खाया और कितने बजे ट्यूशन गई ? यह भी कोई डायरी होती है, न ही कोई रोमांटिक बातें हैं ,न कोई रहस्य, न हीं कहीं प्यार.... । न..न.. माता -पिता भी ज़िम्मेदारियों तले दबे थे उन्हें समय ही नहीं था कि प्यार से बैठकर अपनी बच्ची से दो बातें करें। उनके लिए बच्चे की सभी जरूरतें पूरी करना ही प्यार है ,किन्तु ये' अर्धसत्य' था। 


 अपनी ही डायरी पढ़कर कोई मजा नहीं आया,उल्टे दिमाग़ में और सवाल उठ खड़े हुए ,क्या इसी को ज़िंदगी कहते हैं ? अभी मैं यही सोच रही थी तभी, किसी ने मुझसे कहा -डायरी लिखना लड़कियों के लिए कतई भी सही नहीं है। किसी के हाथ लग जाने का खतरा रहता है। कोई भी तुम्हारी डायरी को पढ़कर तुम्हारी बारीक़ से बारीक जो बातों को जान सकता है।''

 उसकी बात समझ नहीं आई , ऐसी क्या बात होगी ? जो वह हमारी बातों को जानकर हमें 'ब्लैकमेल 'करेगा ?

 डायरी लिखने में तो वैसे ही मजा नहीं आ रहा था। एक तरह से देखा जाए तो टाइम टेबल सा लग रहा था।  सोचा -'शादी के बाद ही अपना अरमान पूरा करेंगे। जिसमें ज़िंदगी होगी ,सपने और खुशियों की उड़ान होगी।  कुछ दिन बाद एक नई डायरी लेकर लिखना आरंभ किया -

 आज मैं सो कर उठी, मेरी आंखें सूजी हुई थी क्योंकि मैं रात भर रोती रही, मेरी सास ने मुझे दहेज में गाड़ी न देने के लिए ताने जो सुनाये थे।पति करवट बदलकर सोते रहे। मैं  उम्मीदों से उनकी तरफ देखती रही। 

आज दिन भर मैं उदास रही, क्योंकि तीज - त्योहार पर मेरे मायके से नेग न आने पर मेरी सास ने मुझे, फिर से डाँटा। मेरे घरवालों को जली -कटी सुनाई । मेरे पति ने मेरी बात नहीं मानी, न ही मेरी कोई बात सुनते हैं  क्योंकि वो अपनी मां की बात सुनते हैं। जो इंसान, इतने लोगों के सामने, मुझसे विवाह करके मुझे अपने घर लाया। वो मुझे अपमानित होते हुए खड़े -खड़े देखता रहता है। क्या इसे  ही'' वैवाहिक जीवन'' कहते हैं ?

अब लगता है ,इस जीवन में कोई प्यार, अपनापन नहीं है ,जहाँ बार -बार एहसास दिलाया जाता है। जब तक विवाह नहीं हुआ ,तुम माता -पिता के लिए बोझ थीं और अब इस घर में एक पढ़ी -लिखी नौकरानी बनकर आ गयी हो। जहाँ सम्मान की उम्मीद तो कतई मत करना। 

पति चुप हैं ,उन्हें  बेटे होने का कर्ज़ जो उतारना है ,पता नहीं ,इन्हें मुझसे प्यार भी है या नहीं ,या फिर रिश्ते को ज़बरन ही निभाने का प्रयास कर रहे हैं। इतना तो समझ सकती हूँ ,यदि मेरे पक्ष में कुछ कहा भी तो घर में 'भूचाल' आ जायेगा। इसीलिए उन्होंने चुप्पी ही साध ली है। ये कैसी चुप्पी है ? साधु या ज्ञानी तो वो नहीं हैं ,फिर क्या अनुचित होते हुए देखकर भी अनदेखा करना उचित है ? 

अब मन सवालों के घेरे में घिरने लगा है ,सवाल करता है - क्या यही जीवन है ,क्या रिश्ते ऐसे होते हैं ? मेरे पास कोई जबाब नहीं था ? न ही किसी से सही उत्तर की उम्मीद थी। वो ग़लत होते देखता रहा और मैं हमेशा सही करने का प्रयास करती रही। अब पति के प्रति मन में वो सम्मान नहीं रहा ,जो लिखती देखते रहे। कम से कम अपनी डायरी से झूठ तो नहीं बोल सकती। 

  उसने कभी मेरी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया। कभी प्यार से बैठकर मेरे मन की बात नहीं सुनी। अब  ये  डायरी ही मेरी' सखी' बन गई है। इससे मैं, अपने सभी सुख- दुख बाँट लेती हूं। तब मैंने जाना, कि एक माँ, मां ही होती है,जो अपने बच्चे को समझ सकती है। सास ,सास ही होती है ,वो कभी माँ नहीं बन सकती अपनी डायरी में यह सभी बातें लिख दीं। 

आज मेरे लिए बहुत ही अच्छा दिन है ,किसको ये बात सुनाऊँ ? आज सुबह से ही मन अज़ीब सा हो रहा है ,काम करने का दिल नहीं कर रहा ,थकान सी महसूस हो रही है। जाँच करने पर पता चला तो मन में थोड़ी देर के लिए ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। किसको ये बात सुनाऊँ ? जो मेरी इस ख़ुशी में शामिल हो सके। 

 आज क्या घर में  कोई काम -धाम नहीं है ,जब देखो !ये महारानी इस  डायरी में न जाने कौन से हिसाब -किताब लिखने बैठ जाती है ?एक  तेज़ और कर्कश आवाज मेरी उस ख़ुशी को लील गयी। अपने आपको समेटा और उठ खड़ी हुई।

  इसमें ऐसा क्या लिखती है ? तू हमें क्या दिखाना चाहती है। तू, कितनी ज्यादा पढ़ी-लिखी है?  किस चीज का हिसाब लगाती रहती है। मन तो किया चीखकर कहूं ,तुम्हारी ज़िंदगी का कब आप हमारी ज़िंदगी से जाओगी ? किन्तु आज मैंने भी पति की तरह ही चुप रहने का प्रयास किया।

बोल ही नहीं निकल रहा ,यदि मैं न कहूँ तो घर के आदमियों को नाश्ता ,खाना कुछ न मिले ,जब मैने कुछ जबाब नहीं दिया तो वो और चिढ गयीं।  आज तो मुझे लगता है। इसमें जिंदगी का हिसाब है, मेरे जीवन के एक -एक पल का हिसाब है ,तुमने जो मेरे दिल को जख़्म दिए हैं ,मेरे उन दर्दों का हिसाब है।

 मुझे कल क्या बनाना है, उसकी मुझे चिंता है , इसलिए रात के समय ही छोले भिगोकर रख दिए हैं। विचार लगा रही हूं। मैं कुछ भूली तो नहीं सास को दूध दे दिया, ससुर को दूध दे दिया। पति के लिए दूध तैयार करके  रख दिया। क्या मैंने अपना दूध लिया ? नहीं, मुझे दूध की आवश्यकता ही क्या है ? मैं तो माता -पिता के यहाँ से ही मज़बूत होकर आई हूँ। मैं तो बस यहां काम के लिए आई हूं।

 मेरी पढ़ाई- लिखाई का इस जिंदगी से कोई ताल्लुक नहीं है। उसमें यह नहीं सिखाया जाता कि जीवन में आने वाले लोगों से कैसे संघर्ष करना है ? बड़ी -बड़ी बातें लिखना और असल ज़िंदगी को जीना ,बहुत फ़र्क होता है।  फिर भी मैं एक पढ़ी-लिखी तो हूँ , जो अपने संस्कारों के तहत बंधी हुई है। उसे सब सहना है और सुनना है।

कभी -कभी सोचती हूँ , मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? यह तो मैंने सोचा ही नहीं, बस डायरी लिख रही हूं, जिसमें गम है, खामोशी है, चिंताएं हैं। क्या इसी को जिंदगी कहते हैं ? क्या इसी तरह मेरी डायरी उदासियों के घेरे में घिरी रहेगी, क्या जीवन में उम्मीद की कोई नई लहर नहीं दौड़ेगी ? इस जिंदगी का क्या हिसाब किताब लगाना ? यह तो अपने तरीके से ही चल रही है। इससे हम क्या सीख लेंगे ? किंतु जब भी इसको पढ़ेंगे तो अपने दर्दों का, अपनी कमियों का, न जाने कितनी गलतियों का एहसास होगा ,क्या  मुझे यह डायरी लिखते रहना चाहिए ?

अब घर में सभी को पता चल गया , घर में एक नया मेहमान आने वाला है ,किन्तु अभी भी सभी के चेहरों पर प्रश्नचिन्ह है ? लड़का या लड़की ! किन्तु जो भी हो ,अब मुझे मेरी डायरी में दर्द नहीं ,एक नई ज़िंदगी ,उत्साह ,उमंगें लिखनी है ,अपने लिए नहीं, अपने आने वाले बच्चे के लिए ,ताकि वो अपनी माँ पर गर्व कर सके। 

अचानक ही घरवालों को पता चल गया ,मेरी कोख़ में लड़की है। अब मुझे लड़ना होगा ,अब तक मैं क्यों कमज़ोर रही ? उसे वो सब सिखाना होगा ,जो मैं समझ न सकी।

जिन लोगों की जैसी प्रकृति होती है ,उसको बदला नहीं जा सकता ,रावण कभी राम नहीं बन सका।  बाद में चाहे उसके कितने भी पुतले जलाये जाएँ किन्तु जीते जी वो ब्राह्मण होते हुए भी राक्षस प्रवृति का ही रहा। उन्हें राक्षस की श्रेणी उनके जन्म से नहीं कर्मों के आधार पर मिली ,वरना कंस और कृष्णा दोनों ही एक ही जाति और वंश  के थे। 

 जीवन में तो कुछ बदलने वाला नहीं है ,तो क्यों ना डायरी को ही बदल दिया जाए ?जिस डायरी में मेरे अरमान हो, मेरी कहानी हो, कविता हो, क्योंकि जिंदगी तो जैसी है ,वैसी ही चलती रहेगी , यह सोचकर, उस आम लड़की ने डायरी लिखना बंद ही कर दिया। कभी-कभी लगता इससे लिखकर भी क्या होगा ?जीवन के हिसाब -किताब से क्या होगा ? उससे कोई सीख तो नहीं मिलेगी ,सीख तो अनुभव से ही मिलेगी ,कार्य करते रहने से मिलेगी ?

किन्तु ये ही तो मेरी' सखी' है , तब मैंने  डायरी को  एक नए रूप में परिवर्तित कर दिया और अब मैं डायरी नहीं लिखती हूं ,दर्द भी नहीं, प्रेम लिखती हूं ,अरमान लिखती हूं, उम्मीदें लिखती हूं।अपने जीवन का संघर्ष लिखती हूँ। एक प्रेरणा अपने और अपने आने वाले बच्चे के लिए संदेश लिखती हूँ। 

चंद ही दिन हुए थे ,सकारात्मक विचारों को लेकर जी रही थी ,कर्कश आवाज आई -''इसे गिरा दे !

 नहीं ,मैं मां हूँ, हत्यारिन नहीं !समझाने का प्रयास कर रही थी -एक नारी, एक घर की नींव होती है ,आज की औरत किसी से कम नहीं ,क्या तुम और मैं नारी नहीं ? ये उस डायरी की आख़िरी पंक्ति थीं , क्योंकि अगले दिन उस डायरी में प्रश्न उभरने बंद हो गए ,नादान थी ,किसे समझाने  चली थी।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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