'' कोख़'' स्त्रियों के लिए, वरदान है। नवजीवन की उत्पत्ति इसके माध्यम से ही होती है, तभी यह संसार आगे बढ़ता है। किंतु यही कोख़ कभी -कभी अभिशाप भी बन जाती है ,तो कभी मनहूस हो जाती है और इसी के कारण, उस महिला को बहुत कुछ सुनना भी पड़ जाता है, जब मनचाही इच्छा पूरी न हो और कभी,-कभी यह कोख़ अपना कार्य नहीं करती है ,तो इसका दोष भी उस महिला को ही दिया जाता है और उसे ''बाँझ'' कह दिया जाता है।
एक तरफ से देखा जाए, तो यह महिलाओं के लिए वरदान है। ईश्वर ने यह गौरव एक नारी को ही सौंपा है ,जिससे माँ बनने का सुख मिलता है, जिसके कारण औरत संपूर्ण होती है, सृष्टि की रचना आगे बढ़ती है।
मैंने तुझे नौ महीने अपनी' कोख़' में पाला है ,घर के सभी काम करते हुए ,तुझे अपने पेट में लाधे रखती थी। कहते हुए रेवती चिल्ला रही थी और बोली -''मुझे नहीं पता था, तू इतना नीच निकलेगा।''तुझे पैदा होने से पहले ही मार देती, न जाने किस पर चला गया है ? मैंने तो तुझे अच्छे गुण सिखाने में कोई कमी न छोड़ी थी। संस्कार दिए ,तेरे पालन -पोषण में कोई कमी नहीं छोड़ी। जब तू छोटा था , रातभर जाग -जागकर ,तेरे कपड़े देखती कहीं तू अपने ही मल -मूत्र में भीग तो नहीं गया।
तूने अपना बिस्तर गीला भी किया तो मैं गीले में सोती थी और तुझे सूखे में लिटाती थी। आज मुझे, तुझे अपना बेटा कहते हुए , लज्जा का अनुभव हो रहा है। जो मां, भगवान से दुआएं मांगती है, एक औलाद होने के लिए, उसकी प्रार्थना करती है- मुझे एक प्यारी सी औलाद दे ,मेरी गोद भर दे ,इस घर का वंशज दे दे ! उसी मां के मुंह से इस तरह की बद्दुआ निकलना कम बड़ी बात नहीं है। कोई भी माँ अपने बच्चे को बद्दुआ तब देगी, जब उसके जी पर बहुत ज़ोर पड़ेगा।
रेवती कितने दिनों से, मन्नत मांग रही थी कि मेरे बेटे को सही दिशा मिले और उसका सही मार्गदर्शन हो और उसे काम मिल जाए। किंतु उसके लड़के अक्षत की तो कुछ भी काम करने इच्छा ही नहीं थी, वह अपनी जिम्मेदारियां समझना ही नहीं चाहता था। लापरवाही से दोस्तों के साथ इधर-उधर घूमता रहता था।
पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था। वह तो अच्छा है, घर में खेती-बड़ी है ,थोड़ा बहुत काम संभल जाता है।किसी का कर्जा नहीं है किन्तु अब वे लोग भी तो, बूढ़े होते जा रहे हैं। आगे से बच्चे के लिए उम्मीद थी कि वह अपनी खेती बाड़ी को संभालेगा अपनी जिम्मेदारियों को समझेगा किंतु वह तो जैसे समझना ही नहीं चाहता । रेवती ने प्यार से और गुस्से से सब तरह से उसे समझा कर देख लिया। किंतु उसके ''कानों पर जूं तक नहीं रेंगीं । ''
अभी इतना ही काफी नहीं था ,अक्षत ने सारे गांव में थू...थू ...करवा दी। दोस्तों के साथ जीप लेकर न जाने कहाँ घूमने निकल गया ?आधी रात को वापस आया तो बहुत घबराया हुआ था।
रेवती ने पूछा -क्या हुआ ?कुछ नहीं ,कहकर अपने कमरे में सोने चला गया।
प्रातःकाल ठीक से दिन भी नहीं निकला था ,पुलिस की जीप गांव में आ गयी और उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया।
पुलिस को देखकर ,वे लोग परेशान हो गए और बोले -इंस्पेक्टर साहब !क्या बात है ?इतनी सुबह -सुबह कैसे आना हुआ ?
चौधरी साहब आप तो समझ ही सकते हो हमारा तो काम ही मुजरिमों को पकड़ना है।
तब आप मुजरिमों को पकड़िए ! यहां पर कैसे आना हुआ ? क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं ?
हां मदद तो आप ही करेंगे , आपका बेटा कहां है? इंस्पेक्टर ने पूछा।
क्यों क्या हुआ ? मेरा बेटा तो अभी सो रहा है।
उसे उठाइये ! उससे कुछ पूछताछ करनी है।
इंस्पेक्टर साहब !आप हमें कुछ बताएंगे कि आखिर हुआ, क्या है ?
आपके बेटे ने कांड किया है, क्या आपकी काली जीप जिसका नंबर 733 आप ही की है।
जी हां हमारी ही है , लेकिन हुआ क्या है ? यह तो बताइए !
कल चार लड़कों ने एक लड़की के साथ अनाचार किया और उसे मारने का प्रयास भी किया।
यह आप कैसे कह सकते हैं ? कोई और भी तो हो सकता है ?
क्या आपका लड़का कल घर से बाहर नहीं था ? जहां वह गया था , उस ढाबे का मालिक उसे जानता है अक्सर उसका आना -जाना वहीं लगा रहता है। वह ढाबे वाले ने सारी घटना बताइ। पहले आप उसे बुलाए नहीं तो, हम अंदर चले जाते हैं।
रेवती उनकी सारी बातें सुन रही थी, उन बातों को सुनकर तो उसका जैसे दम ही निकल गया , कुछ होश नहीं था फिर भी हिम्मत करके उठी और अपने बेटे के कमरे में पहुंची। उसे उठाया, उससे कुछ नहीं कहा वह जानती थी, यह भाग जाएगा। तब वह अपने बेटे से बोली -अक्षत, बेटा उठ ! इतनी देर से सो रहा है, जल्दी से आ ! तेरे पिता तुझे बुला रहे हैं।
क्या बात हुई ?माँ !अलसाते हुए उसने पूछा।
कुछ काम है तभी तो बुला रहे हैं। कहते हुए वह उसे बाहर ले आई।
सामने पुलिस को देखकर लड़के ने भागने का प्रयास किया किंतु रेवती ने उसकी गिरेबान कसकर पकड़ ली और बोली -इंस्पेक्टर साहब ! इसे यहां से ले जाइए ! इंस्पेक्टर को आश्चर्य हुआ, एक मां अपने बेटे को पुलिस के हवाले कर रही है , उन्होंने भी तुरंत ही अक्षय को पकड़ लिया।
तब इंस्पेक्टर ने अक्षय से पूछा -बातचीत से पता चल गया था, वह भी उस कांड में शामिल था, मां का दिल रो उठा।
मैं जानती थी, अवश्य ही उसने ऐसा कांड किया होगा , क्योंकि एक दो बार तो पहले भी इस तरह की बातें हुई थी, पर बात इतनी बड़ी नहीं थी ,इसके पिता ने इसे छुड़ा लिया था। किंतु आज उसे लगा कि इसे अपने कर्मों का दंड मिलना ही चाहिए। यह सोचकर, रेवती ने अक्षय को पुलिस के हवाले कर दिया।
सारे गांव को भी यह खबर हो गई, तब रेवती रोते हुए -उससे कह रही थी -मैंने , तुझे कितना समझाया , सही राह पर चल! पर तूने मेरी एक बात नहीं मानी। न जाने मेरी 'कोख' से किस राक्षस ने जन्म लिया है ? कहते हुए रोने लगी और अपनी 'कोख़ '' को ही कोसने लगी। ऐसी औलाद से तो मैं ,बिन औलाद ही रह जाती। जिसने बदनामी के सिवा कुछ नहीं दिया।
