इंस्पेक्टर कविता ,ज़ीनत से पूछताछ कर रही थी। तभी अचानक ज़ीनत एक तरफ को लुढ़क जाती है, डॉक्टर को बुलाया जाता है ,तब डॉक्टर को लगता है -'ये लोग, ज़ीनत के साथ ज़्यादा मारपीट कर रहीं हैं। उसे लगता है, ये कमजोर होने के साथ -साथ थकी हुई भी है। इसे कुछ देर के लिए ऐसे ही छोड़ देना चाहिए। ज़ीनत को वहीं छोड़कर वे लोग ,बाहर आ जाते हैं। वैसे तो डॉक्टर को उसके विषय में, जानने में कोई रूचि नहीं थी। किसी भी अपराधी के विषय में जानने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई किन्तु उसने ज़ीनत के विषय में जानना चाहा ,ये किस अपराध में यहाँ आई है ,आख़िर इसका अपराध क्या है ?देखने से तो बहुत ग़रीब और कमज़ोर भी नजर आ रही है।
डॉक्टर साहब !आजकल के ग़रीब अब ऐसे ग़रीब नहीं रहे ,बहुत चालाकियाँ आ गयी हैं। आप जानते नहीं हैं ,इसने क्या -क्या ग़ुल खिलाये हैं ? अपने मन में ज़हर पाले हुए है और तब मनोरमा ने उसे जो बताया उसको सुनकर डॉक्टर तुरंत ही दुबारा हाथ धोने के लिए जाता है। कविता और मनोरमा जोर से हंसी बोलीं -डॉक्टर ! क्या तुमको तनिक भी जानकारी नहीं, ये छूने से नहीं फैलता है।
ज़ीनत को सोते -सोते लगभग ,चार घंटे हो गए ,तब इंस्पेक्टर कविता ने पूछा -मनोरमा ! क्या वो अभी तक नहीं उठी ?
देखती हूँ ,मैडम ! कहते हुए मनोरमा अंदर गयी और ज़ीनत को देखा तो वो अभी भी सो रही है। तब मनोरमा ने आकर बताया - मैडम ! ये तो अभी भी आराम फ़रमा रही है। हम लोग यहाँ परेशान हैं ,जिन्होंने इसकी शिकायतें दर्ज़ की हैं ,वो पूछ रहे हैं ,उसके केस का क्या हुआ ?
बहुत देर हो गयी ,उठाओ ! उसे ,हमें अपने आगे का काम भी पूरा करना है। इसके लिए हम यहीं नहीं बैठे रहेंगे। उसने मनोरमा को आदेश तो दे दिया किन्तु मन ही मन सोच रही थी -' एक ग़रीब, अनपढ़ औरत का सभी ने लोगों ने बहुत लाभ उठाया है। माना कि ये अनपढ़ है ,क्या ये जज़्बात समझती नहीं है। किसी ने भी इसके जज़्बातों की क़द्र नहीं की ,वो रफ़ीक इसका जीजा, मुझे मिला तो उसे छोडूंगी नहीं ,साले ने, एक बच्ची को नर्क में धकेल दिया। इसकी बहन को तो बुलवाना ही पड़ेगा ,उसने ये सब होने कैसे दिया ?
जिसके सहारे उसने, इसे भगाया था उसने भी इसका इस्तेमाल ही किया। हो सकता है ,अपने घर और शौहर से दूर भेजने के लिए ही, उसने आसिफ़ का सहारा लिया हो। कविता को सोच -सोचकर ही गुस्सा आने लगा ,न जाने कैसे -कैसे लोग हैं ?''हमदर्दी की तो उम्मीद ही नहीं कर सकते ,इंसानियत ही नहीं बची है। बेचारी अनाथ बच्ची लोगों के लिए कमाई और मनोरंजन का साधन बन गयी।''
मैडम ! उसे, मैंने उठाया ,उठ ही नहीं रही थी ,अभी भी लुढ़क ही रही थी ,मैंने उससे पूछा - आगे क्या हुआ ?हमें बता ! तब पूछ रही है - कहाँ हुआ ,क्या हुआ ? मैंने उसे याद दिलाते हुए पूछा -आसिफ़ ने कहाँ -कहाँ चोरी की ,तो पूछती है ,कौन सी चोरी ? मुझे तो लगता है , इसकी नींद उतारनी पड़ेगी।
नहीं, तुम रुको !एक बार डॉक्टर से बात करती हूँ ,कभी उसके इंजेक्शन का असर हो। कहते हुए कविता ने डॉक्टर को फोन लगाया।
कुछ ही देर में डॉक्टर ने फोन उठाया ,जब कविता ने ज़ीनत की हालत बताई, तब वो बोला - ऐसे लोग ,कभी -कभी याददाश्त भूल जाते हैं, कि अभी वो क्या कह रहे थे ? दूसरे ही पल याद भी आ जाता है। कोई बात नहीं ,उसे चाय पिलवाइये ! थोड़ा रिलैक्स हो जाएगी ,तो शायद वो फिर से बता सके।
ओके, डॉक्टर ! कहकर कविता ने फोन रख दिया और जुगनू से तीन चाय लाने के लिए कहा।
मैडम !डॉक्टर ने क्या कहा ?
उन्होंने बताया है , ऐसे रोगी कुछ देर के लिए अपनी याददाश्त भूल जाते हैं।
अब ये नया बखेड़ा ,मैडम !
इसका केस कोई साधारण केस नहीं है ,ये वैसे भी तो बिमार ही है। हम इससे जानकारी लेकर इसके गुनहगारों ,को सजा दिलवाने का प्रयास करेंगे।
मैडम ! आप ये क्या कह रहीं हैं ? शिक़ायतें इसके ख़िलाफ़ हैं , इसने लोगों के साथ जो अपराध किया है ,उसकी सज़ा हमें, इसे दिलवानी है। कहीं आप इसकी कहानी को सुनकर भावुक तो नहीं हो गयी हैं ,आप नहीं जानतीं, ये कितनी ड्रामेबाज़ है ? इसने पहले भी लोगों को अपनी कहानी सुना -सुनाकर उनकी हमदर्दी का अनुचित लाभ उठाया है।
मैं सब समझती हूँ ,ये हमारा काम है ,इसकी सारी कहानी जानकर इसको तो सजा मिलेगी ही ,इसे क्या सज़ा मिलेगी ,इसको तो जीते जी सज़ा मिल रही है। इसका इलाज़ ही चलेगा ,किन्तु हमें भी अपनी ड्यूटी निभानी है ,वो तो पूरी ही करेंगे। तब तक जुगनू चाय लेकर आ गया था ,जा एक चाय अंदर उस अपराधी को दे आ !
ये अच्छा, अपराधी है ,इससे पहले तो किसी को मार के सिवा कुछ नहीं मिला ,इसको चाय मिल रही है ,जुगनू बोला।
तुम अपना काम करो !और जाओ !कविता ने कहा। जब जुगनू ज़ीनत को चाय देने गया ,पागलों की तरह चाय लेने के लिए झपट पड़ी ,और गर्मागर्म चाय ऐसे पी रही थी ,जैसे ठंडी हो गयी हो।
चाय पीकर वो बोली - इतनी सी चाय है ,मनोरमा ने उसकी तरफ देखा और कहा ,यहां किसी भी अपराधी को चाय नहीं मिलती ,समझी ! तेरे लिए ही मंगवाई है ,अब तू ठीक है।
हाँ ,मुझे क्या हुआ ?
चल अब बता,आगे क्या हुआ ?मनोरमा के जोर से डांटने से वो घबराई ,कौन सी बात ?
मैडम ! ये देख लीजिये ! ये लोग हमदर्दी के लायक ही नहीं हैं ,अभी भी कुछ भी बताने को तैयार नहीं है। इसे ख़ुराक चाहिए।
कविता मुस्कुराते हुए गयी और ज़ीनत से पूछा -अब कैसी हो ? तुमने चाय पी !
हाँ ,पुलिस जी !
अभी और चाय पीनी है ,ये बात सुनकर वो खुश हो गयी और' हाँ' में गर्दन हिलाई।तुम कितनी चाय पीती हो ?
पुलिस जी , लोगों ने ही आदत डाल दी ,जहाँ भी जाओ ! खाने को कुछ नहीं देते ,चाय पकड़ा देते।
अभी चाय मंगवाते हैं , ये तो बताओ ! आसिफ़ चोरियां करता था ,क्या उसके साथ और भी लोग थे ?या वो अकेला ही चोरी करने जाता था।
उसने मुझे कभी नहीं बताया ,घर से तो अकेला ही निकलता था ,उसके साथ कितने लोग थे ? मुझे कभी नहीं बताता था।
कविता ने मनोरमा की तरफ देखा और मुस्कुराई। क्या वहां किसी को तुझ पर शक़ नहीं हुआ ?
मुझ पर कैसे शक़ होता ? मैंने चोरी थोड़े ही करी है।
अच्छा ,वो तुमसे वहां की जानकारी लेता और चोरी करने जाता ,चोरी का सामान कहाँ रखता था ?
पता नहीं ,मुझे कोई पैसा नहीं देता था , मेरे पैसे भी वही रख लेता था। मुझे पैसे नहीं, उसकी मोहब्बत चाहिए थी ,मुझे उसके साथ घर बसाना था ,इसीलिए तो वो पैसे जमा कर रहा था।
क्या कभी तुम्हारे घर पुलिस नहीं आई ?
मुझे नहीं पता ,पर वो कहता अब यहाँ ठहरना ठीक नहीं ,यहाँ के लोग ठीक नहीं ,अब हमें यहाँ से जाना होगा ,तब हम अपना सामान बांधकर दूसरे शहर में चले जाते। तब वो बहुत डरता था जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो , तब हम दूसरा शहर बदल लेते।
क्या तुझसे, आसिफ़ ने फिर भी शादी नहीं की।
नहीं, हर बार यही कहता , पैसा इकट्ठा होने दे ! अभी पैसा बहुत कम है, फिर वापस अपने शहर जाएंगे और वहां से घर खरीदेंगे और वहीं पर ठाठ से रहेंगे।
