Zeenat [part 65]

धीरे -धीरे आसिफ़ ने अपने रंग दिखाने आरंम्भ किये और अपनी जरूरतें और मजबूरी दिखलाकर, वो ज़ीनत को , उसके तन का सौदा करने के लिए मनाता है। 

ज़ीनत को लगा ,कहीं ये मुझे फंसा तो नहीं रहा है ,अभी तक उसने अपनी बहन के घर में बहुत कुछ देखा है ,तब उससे पूछा - तू ख़ुद कोई काम क्यों नहीं करता है ?


काम तो करता था। उसने इसका कारण भी ज़ीनत को ही बताया , तुझसे मिलने तेरी बहन के घर जो जाता था ,कई छुट्टियाँ हो गयीं ,इसीलिए मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। कई दिनों से धक्के खा रहा हूं , मुझे कोई काम नहीं मिल रहा है ,देख नहीं रही है , मैं रोज घर से निकलता हूँ।  इस घर का भाड़ा भी तो देना है, वरना यह छत भी हमारे सिर पर नहीं रहेगी। जैसे ही काम मिलता है ,तेरी छुट्टी ! उसके बाद हम दोनों शादी कर लेंगे। 

ज़ीनत, उससे प्यार जो करने लगी थी ,उसे लगा-' ये जो भी कह रहा है ,सच ही कह रहा होगा।'

 अब तुम ही बताओ ! पुलिस जी ,जब मेरी बहन और बहनोई भी मेरे अपने न हुए तो इस पर तो यक़ीन करना ही पड़ता।

तब उसे नौकरी मिली या नहीं। 

अब तो 'शेर के मुँह खून लग गया था।''मुझे रोज़ समझाता ,ये बात उसी दिन की नहीं रही ,अब कभी एक -दो ,कभी -कभी तीन -चार  लोग भी आ जाते। वे जो पैसा देकर जाते ,आशिफ़ अपने पास ही रखता। जब मैंने उससे काम के लिए कहा तो बोला -तू ही काम नहीं कर रही है। मैं भी मेहनत कर रहा हूँ। तेरे लिए ग्राहक ढूंढ़कर लाता हूँ ,जिससे तू दो पैसे कमा पाती है।  इसमें भी कम मेहनत नहीं है।

 तब एक दिन उसने मुझसे कहा - यदि और ज्यादा पैसा कमाना है ,तो बड़े -बड़े घरों में झाड़ू -पोछे का काम पकड़ ले ! वो मुझे बड़े -बड़े घर दिखाकर, ऐसे घर में रहने का लालच देता। कभी हमारा भी इतना बड़ा घर होगा ,खूबसूरत सपने दिखाता। मुझे भी लगा, मैं अमीर हो जाउंगी ,तो ठाठ से रहूंगी। बड़े लोगों के घरों में खाना भी खूब बच जाता था। खाने को भी मिल जाता था ,कभी -कभी घर के लिए भी मिल जाता था ।  

जब मैं उन घरों से आती ,तब वो मुझसे पूछता -तेरी मालकिन कैसी थी ? घर में और कितने नौकर-चाकर  हैं ? कितने कुत्ते हैं। कितने कमरे हैं ?

तूने,कभी उससे पूछा नहीं ,तू ये सब क्यों पूछ रहा है ? 

नहीं ,मुझे लगता ,वैसे ही पूछ रहा होगा। 

किन्तु एक दिन बोला -उनके पास इतना पैसा है ,उन्हें पता भी नहीं चलेगा ,थोड़ा सा पैसा या कुछ क़ीमती सामान हटा लिया कर....

नहीं, ये मुझसे नहीं होगा ,उन्होंने रोज़ी -रोटी दी है ,मैं ये सब नहीं कर पाऊँगी ,तू भी तो कुछ कर.... मैं रात में भी, आधी रात तक जागती रहती हूँ ,तूने तो कहा था- तुझे जल्दी नौकरी मिल जाएगी पर आज तक नहीं मिली। 

फिर उसने क्या किया ?

 वो, मुझसे नाराज़ हो गया,मैं समझ गई थी, इसके कारण भी  मैं, यहां आकर फंस गई हूँ ।'' एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई'', जीजा से बचकर आई तो यहां भी मुझे वही सब करना पड़ रहा था  किंतु इस बात की का सुकून था , वह मेरे साथ था। 

वह तेरे साथ नहीं था, तेरा दलाल बन गया था और तुझे बहकाता रहता था, इंस्पेक्टर कविता बोली।

यह सुनकर ज़ीनत चुप हो गई , शायद, वो ये बात पहले से ही जानती है ,तब वो बोली - दिन में मैं, लोगों के घरों में काम करती थी, ताकि' मैं 'आसिफ को लाकर उनके घर की खबर दूँ।  घर में कितने लोग हैं ? घर में क्या काम है, अंदाजन कितना पैसा हो सकता है ? हमें जल्दी से अमीर जो बनना था।

हाँ ,हाँ तेरी ये बात सुन चुकी हूँ ,इससे आगे बता !

आसिफ़ ने मुझसे  यही कहा था, जितनी जल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसा इकट्ठा होगा, उतनी ही जल्दी हम यह काम छोड़कर, अपना घर बसाएंगे। इसी उम्मीद से मैं, उसके साथ मिली हुई थी। मेरे कारण उसने पैसा तो बहुत कमाया किंतु मुझे पता नहीं कितना पैसा उसके पास था, या है। मैं जब भी उससे पूछती , अब कितना पैसा हो गया ? तो कहता,- हमारे सुखी जीवन के लिए अभी और पैसे की जरूरत है और मैं अगले दिन फिर से काम पर लग जाती। मुझे सोने के लिए कम ही समय मिलता था।

 मैंने कई घर पकड़ लिए थे। 1:00 बजे तक घरों के काम निपटा कर उसके बाद खाना खाकर सो जाती थी।  और फिर आसिफ मेरे लिए  ग्राहक लेकर आता। 

चोरी करते हुए ,क्या तुम पर किसी की दृष्टि नहीं गई, तुम्हारी शिकायत किसी ने नहीं की, तुम पर किसी को शक नहीं हुआ, इंस्पेक्टर कविता ने पूछा।  

जिस किसी को भी शक होता, तो मुझे, देखकर कोई कह नहीं सकता था , कि यह चोरी भी कर सकती है ,जब मैं चोरी करती ,तभी तो मुझ पर शक़ होता। 

क्या मतलब ?

 क्योंकि मैंने कभी चोरी की ही नहीं थी।  उन्हें, मैं अपने अम्मी -अब्बू की दुर्घटना की कहानी सुनाती। जीजा के शराब पीने की कहानी सुनाती। उसके मारपीट की कहानी सुनाती।  लोगों को मुझ पर तरस आ जाता , कई बार तो मुझे वहीं पर ग्राहक भी मिल जाते, किसी का बेटा या किसी का पति , जिनसे मुझे पैसा ऐंठने  को मिलता। मेरी दोगुनी कमाई हो रही थी। 

आसिफ़ हमारी फोटो खिंच लेता और उन्हें, वो तस्वीरें दिखाकर उनसे पैसे ऐंठता या किसी बूढ़ों के घर में जाकर उनके यहाँ चोरी कर आता। 

तू तो कह रही थी ,मेरा कोई गिरोह नहीं है और ये सब क्या था ? तू और तेरा आसिफ़ ही थे ,या उसके साथ उसके कोई और दोस्त भी थे ? ज़ीनत चुप रही ,बोली ही नहीं। 

चुप, क्यों है ? बताती क्यों नहीं ?

क्या बताऊँ ? क्या पूछ रही हो ?कहकर वो एक तरफ को लुढ़क गयी। इंस्पेक्टर कविता ने मनोरमा से कहा - देखो !इसे क्या हुआ है ?या फिर ये नाटक कर रही है ,आगे कुछ बताना ही नहीं चाहती है। 

मनोरमा, ज़ीनत के करीब गयी और उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे ,लेकिन ज़ीनत तब भी नहीं उठी। तब उसने उसके ऊपर बहुत सारा पानी उड़ेल दिया और बोली - मैडम  !ये लोग बड़ी ढीट होती हैं ,मार खा-खाकर इनकी चमड़ी मोटी हो जाती है। 

मनोरमा तुम इसे छोडो !थोड़ी देर में देखते हैं वरना डॉक्टर को बुलाना पड़ेगा।

अचानक इसे क्या हुआ होगा ? इंस्पेक्टर कविता चिंतित होते हुए बोली। लगभग एक घंटा हो गया किन्तु ज़ीनत नहीं उठी तब ड़ॉक्टर को बुलाया गया। 

डॉक्टर ने ज़ीनत की जाँच की ,तब वो बोला - इसका तन बहुत कमजोर है , आप लोग इसे ज़्यादा मत मारिये !

ये पिटनी तो बहुत चाहिए किन्तु अभी तो इसे एक ही डंडा लगा है ,इसने बहुत कांड किये हैं। अभी  तो ये अपनी कहानी सुना रही थी ,अचानक बोलते -बोलते पीछे को लुढ़क गयी। आप ये बताओ ! इसे क्या हुआ है ?

देखिये ! मैंने इसके इंजेक्शन लगा दिया है ,जब इसे होश आएगा ,तब पता चलेगा। मुझे लगता है ये थकी भी है ,आप इसे ऐसे ही लेटे रहने दीजिये ,थोड़ा आराम करेगी ,तो शायद ये अपने को बेहतर महसूस कर सके।  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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