Zeenat [part 63]

मेरी बहन मुझसे प्यार तो करती थी किन्तु उस रफ़ीक के कारण मैं ही, उसकी दुश्मन भी गयी थी। मैं भी क्या करती ? बेबस थी ,किसी तरह मेरे अम्मी -अब्बू को कुछ भनक लगी ,शायद बहन ने ही फोन करके उनसे कहा हो ,या फिर मेरी शिकायत की हो। जब अम्मी -अब्बू हमसे मिलने आ रहे थे ,तभी उनका टेम्पो पलट गया और उन्हें बहुत चोट आई ,अम्मी ने तो वहीं  दम तोड़ दिया था ,क्योंकि वो सड़क के बीच में आकर गिरीं ,दूसरी तरफ से तेज आती गाड़ी उन्हें कुचलकर चली गयी थी। अब्बू अस्पताल में अल्लाह को प्यारे हो गए। 

 मेरी बहन को मुझ पर अक़्सर गुस्सा आता


और वो मुझे घूरती ,रफ़ीक के चले जाने पर वो मुझ पर चिल्लाई -तू मनहूस है ! अम्मी -अब्बू को खा गयी और अब मेरे शौहर पर भी जादू कर दिया है  

आपा ! मैं क्या करूं ?कहाँ जाऊँ ? तेरा शौहर मेरी ज़िंदगी का भी तो नाश कर रहा है। अब तो अम्मी -अब्बू भी नहीं रहे, मैं कहाँ जाऊं ?

डूबकर मर जा ! या उस घर में वापिस चली जा ! जा किसी और को फंसा ,मेरे शौहर को छोड़ दे ! मैं, तेरे हाथ जोड़ती हूँ। मेरी ज़िंदगी बख़्श दे ! तू तो मेरी सौतन बन गयी ....कहकर वो  गुस्से में आकर ,जोर -जोर से छाती पीटकर रोने लगी।

 एक दिन उसने गुस्से में आकर दुपट्टे से मेरा गला खींच कर मुझे मारने का कोशिश की किंतु मार नहीं पाई ,वो रफ़ीक जो आ गया था। मैं मरी तो नहीं, हां मेरी आवाज खराब हो गई ,कई दिनों तक तो मैं बोल ही नहीं पाई। मेरे गले की नसों में खिंचाव जो आ गया था। किन्तु वो हरामी रफ़ीक को मुझ पर थोड़ा सा भी रहम नहीं आया ,ऐसी हालत में भी वो, मेरे कमरे में घुस जाता,अब तो मेरी बहन के सामने ही मुझे खींचकर ले जाता।  

 मुझे बोलते हुए जोर पड़ता था।नसों में सूजन थी। मैं तुतलाने लगी थी। तब एक दिन मैंने अपनी बहन से कहा -आपा ! तुमने तो अपना दुःख रोकर चिल्लाकर कह दिया। मेरा क्या ? मैं किससे कहने जाऊँ ,तुम तो अपने शौहर के घर में हो। मैं कहाँ जाऊं ?मेरे तो अब अम्मी -अब्बू भी नहीं रहे। अब मुझसे शादी कौन करेगा ? मैं अपने ही बहनोई की रखैल बनकर रह गयी हूँ ,अभी मेरी उम्र ही क्या है ? बहन ने मेरे दर्द को समझा। उस दिन हम दोनों बहनें गले लगकर खूब देर तक रोती रहीं। 

तब मेरी बहन ने सोचा,इसकी भी क्या गलती है ? ये भी तो यहां आकर फंस गयी है। हो सकता है ,रफ़ीक इसके हिस्से की ज़ायदाद के चक्कर में हो , पूरा हरामी है। तब उसने सोचा - मुझे, इसका निकाह करवा  देना चाहिए। उसने कई जगह मेरे रिश्ते की बातें भी की , किंतु मेरा जीजा रफ़ीक नहीं चाहता था कि मेरा निक़ाह हो ,वो आये दिन कोई न कोई अड़ंगा लगा ही देता था।कहता -'इसे कुछ नहीं आता ,और इसे बोलना भी नहीं आता। 

 न ही वो, मुझसे निकाह  करना चाहता था और न ही मेरा निकाह होने देना चाहता था। निक़ाह कैसे करता ?बाहर तो बड़ा इज्ज़तदार बना फिरता है।  मेरी बहन के लिए मैं, उसकी दुश्मन बन गई थी। उसे रात- दिन  यही चिंता सताती रहती थी - किस तरह से इससे मेरा  पीछा छूटे ?

 तब  एक दिन मोहल्ले में से एक लड़के को लेकर आई ,न जाने उसे, कहाँ से वह लड़का मिल गया ? उसने बताया -ये लड़का, दूसरे शहर में अच्छा कमाता है ,वहीं रहता है ,इसके परिवार में कोई नहीं है। वो मुझसे शादी करना चाहता है। 

मैंने उस लड़के को देखा ,वो मुझे भी पसंद आ गया। पसंद क्या ? मुझे, उससे इश्क हो गया। उसने मेरी कहानी सुनी ,न जाने आपा ने मेरे बारे में उसे क्या बताया था ? उसने कहा -ये लड़का तुझे बहुत पसंद करता है। मैंने इसे सब बता दिया है ,तू जैसी भी है ,तू इसे पसंद है। वो मेरे लिए उपहार लाता ,कभी चूड़ियां ,कभी सूट ! कभी मिठाई उसके आने से मेरे जीवन में जैसे बहार आ गयी। अब तक जो दर्द मैंने महसूस किया मैंने सब भुला दिया। 

 जीजा के चले जाने के बाद हम, मिलते थे। वह लड़का मुझे बहुत अच्छा लगा , मुझे बहुत प्यार करता था, मैं भी उससे बेइंतहा प्यार करने लगी थी। वो कहता था ,जब हम निकाह करके यहाँ से चले जायेंगे। तब तू मेरा घर संभालना ,मेरे बच्चे बनाना ,मुझे ऐसे ही सुंदर -सुंदर ख़्वाब दिखाता। तब मैं उससे कहती -तू मुझे कब लेकर जायेगा ? चल न... अभी चलते हैं। 

निक़ाह करके जायेंगे,भागेंगे नहीं।  

मेरा जीजा हमारा निक़ाह होने नहीं देगा ,मैंने उससे कहा। 

क्यों ? क्या तेरा जीजा नहीं चाहता ? कि तेरी शादी हो। 

मेरी बहन ने उसे बताने से मना किया था किन्तु जब वो मेरी बात सुन ही नहीं रहा था ,तब एक दिन मैंने उससे बता ही दिया। मेरे जीजा की नजर मुझ पर है ,ज्यादा वक़्त नहीं बीता था और एक दिन मेरे जीजा को यह बात पता चल ही गयी ,कि हमारे घर में कोई आता है ,अभी उसे ये नहीं पता चला था कि वो मेरे लिए आता है। 

यह सुनकर वह नाराज़ हुआ ,घर आकर रफ़ीक ने पूछा - आजकल हमारे घर में कौन आ रहा है ?

कोई भी तो नहीं ,आपा ने जबाब दिया ,आपसे किसने कहा ?

अब क्या तू मुझसे सवाल -जबाब करेगी ?कहते हुए उसने बहन के एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाया। झूठ बोलती है ,पड़ोसी क्या झूठ बोल रहे हैं ? बता ! क्या तूने कोई नया यार पाल लिया है ?

मैं तुम्हारे बच्चों की माँ हूँ ,कुछ तो लिहाज़ कीजिये। तब जीजा ने मुझे घूरा, मैं चुपचाप वहां से उठकर अपने कमरे में गयी। जीजा भी पीछे -पीछे पहुंच गया और बोला - क्या तेरे बदन में  आग लगी है ? तू तो उसे नहीं बुला रही ,मेरे पास कोई जबाब नहीं था ,होता भी....  तो क्या होता ? वो मुझे भी पीटता ,तब मेरे ऊपर चढ़ बैठा ,पता नहीं ,मुझमें कहाँ से हिम्मत आई मैंने धक्का दिया। मुझे, उससे घिन्न आने लगी थी ,शायद ये हिम्मत मुझे आसिफ़ की मोहब्बत ने दी थी। 

मेरे धक्का देने से उसकी बेइज़्जती हो गयी ,उस दिन उसे बहुत गुस्सा आया और उसने वहां रक्खा डंडा उठाकर मुझे बहुत पीटा ,मेरे रोने की आवाज़ सुनकर आपा दौड़ी आई,तब उन्होंने मुझे, उससे छुड़ाया। तब वो बोला -आगे से ऐसी जुर्रत भी मत करना। अब तो इसने मेरा दिमाग़ खराब कर दिया। रात को आऊंगा ,तैयार रहना ,कहकर वो चला गया। 

उस हादसे के बाद ,आसिफ़ मुझसे मिलने आया ,मैं, उससे लिपटकर रोने लगी। मेरी बहन ने भी, उससे कहा - अब इसका यहाँ ठहरना ठीक नहीं ,लगता है ,किसी पड़ोसी ने उससे चुग़ली कर दी है। वो आज बहुत नाराज हो रहा था। आज तो उसने मारपीट भी कर दी। अब तू इसे लेकर यहां से ले जा ! इसी में हम सबकी भलाई है। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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