bachapan jine do

कहने को ज्ञान का भंडार ,

या कहूं ,पुस्तकों का रेला है। 


 इतना बोझ न सह पाउँगा। 

जीवन से मिलता, क्या ज्ञान कम ? 

पुस्तकों का ज्ञान ,न सह पाऊंगा। 

अभी दया करो ! मुझ पर,

 बचपन क्यों ?मेरा छीन रहे हो।

इस बस्ते का बोझ अधिक है , 

क्यों ? स्पर्धा में खड़ा किये  हो ?  

लड़खड़ाते क़दमों से लगता ,

आगे ,अब न चल पाउँगा।

 पुस्तकों का भार न सह पाउँगा। 

माना, आगे बढ़ते जाना मुझको ! 

कुछ तो सुकूँ से रहने दो !मुझको !

डर इनका ,न मन में भरने दो !

ये पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं। 

संभाल सकूँ मैं ,इस पूंजी को 

अब सलोना बचपन जीने दो ! 

अभी खेल में आगे बढ़ने दो !

मेरा बचपन मुझको जीने दो !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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