Zeenat [part 64]

रफ़ीक को पता चल गया था ,कोई उसके घर में आता है ,अब तक तो उसे यही लगता था। दोनों ही मुझ पर निर्भर हैं ,मैं मारूं -पिटूं कहाँ जा सकती हैं ? किन्तु उसे अब डर लगा ,जब उसे पता चला उसके पीछे उसके घर में कोई आता है। उसने ज़ीनत और उसकी बहन को पीटा और जानना चाहा कि उसके पीछे घर में कौन आता है ? किन्तु दोनों ने ही उसे कुछ नहीं बताया।

रफ़ीक के जाने के पश्चात आसिफ़ जब घर में आया, तब घबराई हुई नाज़िया आसिफ़ से कहती है -इसे लेकर यहाँ से लेकर भाग जा ! वरना  वो न ही हम दोनों को छोड़ेगा और न ही तुझे छोड़ेगा।


 

उनके  इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए आशिफ़ तैयार नहीं था ,तब वो बोला - अब इस वक़्त मैं, इसे कहाँ ले जाऊंगा ? एक ही कमरा है ,उसमें मैं अपने दोस्तों के संग रहता हूँ, इसे लेजाकर कहाँ रखूंगा ? मैं तो पहले ही बहुत दिनों से मकान ढूंढ़ रहा हूँ , मकान मिलते ही इसे तुरंत ले जाऊंगा। 

तू ,इसे कहीं भी लेकर जा ! परन्तु ले जा ! इसके जीजा को पता चल गया है ,कोई यहाँ आता है। अभी तो उसे  शक़ है। यक़ीन हो गया तो इसे नहीं छोड़ेगा ,न ही मुझे ,तेरा तो क्या हाल करेगा ? मैं नहीं जानती, कहते हुए उसने सामान और कपड़ों का एक थैला उसके सामने रख  दिया। मुझे अपने बुर्खे में छुपाकर उसने हमें ,पीछे की गली से, दोनों को बाहर कर दिया। 

तू, हमें ये जो कहानी सुना रही है ,सच है ,या तेरी पहली कहानी की तरह ही तूने  झूठी कहानी बनाई  है। तेरी किसी भी बात पर यकीन नहीं होता। तूने इतने झूठ बोले हैं ,अब तुझ पर यक़ीन करना मुश्किल है।' तूने लोगों की हमदर्दी को छला है, अब तुझ पर कौन यक़ीन करेगा ?'

जब सच्ची कहानी सुना रही हूँ तो यक़ीन नहीं हो रहा। पुलिस जी ,तुम्हें यकीन न हो, तो मेरी बहन के घर जाकर पता कर लो ! जहाँ दो लड़के रहते हैं ,मेरी बहन के ही बच्चे हैं ,उन्हें मेरे जीजा ने उस घर को हथियाने के लिए छोड़ा हुआ है। मुझे भी तो बहुत धोखे मिले हैं ,तब किसी ने नहीं सोचा ,इस बच्ची पर क्यों अत्याचार हो रहे हैं ?

ज्यादा मत बोल !कहते हुए ,उसने डंडा बड़े जोरों से मेज पर मारा। तू तो लोगों की ज़िंदगियों से खेल रही है। 

वो तो बाद की बाद में देखेंगे पहले तू , ये बता !अपनी बहन के घर से भागकर तुम दोनों कहाँ गये थे  ?क्या फिर तुझे किसी ने ढूंढा या नहीं। 

किस्मत फूटी थी ,तो अच्छा नसीब कहाँ से लिखवाकर लाती ?कहते हुए उसने अपने माथे में हाथ मारा।  मेरी बहन ने हम दोनों को वहां से भगा दिया। वह तो यही चाहती थी, किसी तरह से  मुझसे,  उसका पीछा छूटे। मैं भी आसिफ़ की आशिकी में खो गई थी। वह जो भी था ,कैसा भी था ,मुझे अच्छा लगता था। क्योंकि एक तरफ तो मेरा अपने जीजा से पीछा छूट गया था और दूसरी तरफ मेरा कहीं से भी रिश्ता नहीं आ रहा था ,अब आसिफ ही मेरा सहारा था। उस रात हम किसी बनती हुई बिल्डिंग में गए ,चुपचाप हमने वहां रात बिताई। जोश और गुस्से में बोली - वो भी हरामी ही था ,उसने भी मेरे साथ वही किया जो जीजा करता था। ''हर हरामी आदमी को औरत का शरीर ही नजर आता है।'' 

तू तो ,उससे इश्क़ करती थी ,फिर उसे' हरामी' क्यों बोल रही है ? मेरे सामने गाली बक रही है। 

इश्क़ करने लगी थी ,तभी तो उसे अपने पास आने दिया, अगले दिन हम छुपते -छुपाते दूसरे शहर में पहुंच गए। 

तेरे जीजा को पता नहीं चला होगा। 

पता भी चला होगा ,तो मुझे क्या ? मुझे लगता था ,अब मैं अपने आसिफ़ के साथ महफूज़ हूँ। तीन -चार दिनों तक तो वो अच्छे से रहा ,मुझे एक पुराने सड़े से घर में रख दिया और काम पर जा रहा हूँ ,कहकर निकल जाता। सुबह चाय -नाश्ता लाता और शाम को रोटी लाता। दिनभर मैं भूखी उसका इंतज़ार करती। 

पांचवे  दिन उसने भी अपना असली रंग दिखलाया और बोला - हमें यहां'' खाने के लाले पड़ जाएंगे''। हमें कुछ तो करना होगा , पहले मैं अकेला कमाता था ,अब हम दो हो गए ,खर्चा बहुत बढ़ गया। तुझे तो खाना बनाना भी नहीं आता ,बाहर से कब तक लाता रहूंगा ?ऐसे कह कर वह सुबह को निकल जाता और उदास होकर वापस आ जाता।

वो क्या काम करता था ?

पता नहीं ,कमाने के लिए सुबह -सुबह ही निकल जाता था।  इस तरह से दो-चार दिन और बीत गए। मैं दो  दिन से भूखी थी, आसिफ़ ने पता नहीं, खाना खाया था या नहीं, वह तो बाहर चला जाता था , किंतु मुझसे  यही कहता था- कि मेरे पास पैसे नहीं है, क्या करना चाहिए ? इसी बात से मैं परेशान थी। 

तभी एक दिन खुश होते हुए आया, और बहुत सारा खाना भी लेकर आया। मैं उस खाने पर टूट पड़ी। दो दिनों से भूखी थी।  खाना खाकर मैंने आसिफ़ से पूछा -आज तुम्हें खाना कैसे मिल गया ? तुम दो दिनों से कहाँ थे ?

वह बोला , तेरे ही कारण मिला है।

  क्या मतलब ? मैं कुछ समझी नहीं। 

तू इतनी भी नासमझ नहीं है , तुझे बस एक आदमी को ख़ुश करना है ,वो तुझे पसंद करता है , उसी ने मुझे पैसा दिया और तेरे लिए मैं खाना लेकर आया हूं और भी पैसा देगा जब तू उसे ख़ुश कर देगी।

 यह तू क्या कह रहा है ? क्या मैं, तेरे साथ इसीलिए भागकर आई हूँ ? मैंने पूछा। 

वही कह रहा हूं ,जो तू समझ रही है,तभी वो अकड़ते हुए बोला। तभी तो हम दोनों सुकून से रह सकेंगे। तुझे क्या करना है ? जैसे तू जीजा के साथ रहती थी ,मेरे साथ रहती है । ऐसे ही उसके साथ रहना नहीं है, बस उसे एक रात के लिए खुश करना है। वो ख़ुश हो जाएगा तो और भी पैसा देगा। 

तुझे किसने बताया ? जीजा मेरे साथ सोता था। 

तेरी बहन ने ही तो कहा था -वो तुझसे छुटकारा चाहती थी ,तभी तो वो मुझे, तेरे पास लेकर गयी ,कह रही थी -उसे, तुझसे निज़ाद पाना था। तू, इसे कहीं भी ले जा !पर यहाँ से दूर ले जा !कम से कम इससे तो मेरा पीछा छूटे। 

 मुझे पसंद नहीं करता ,प्यार नहीं करता उदास होते हुए ज़ीनत ने पूछा। 

आसिफ़ ने सोचा ,कहीं ये नाराज़ होकर न चली जाये ,हाथ आया ग्राहक, न निकल जाये ,इसीलिए बोला - तू ,मुझे पसंद है, इसीलिए तो साथ लाया हूँ किन्तु अभी तो हम पर भी परेशानी आन पड़ी है। उसने अपने शब्दों में शहद की सी मिठास घोलते हुए कहा -क्या तू ,मेरे प्यार की खातिर यह सब नहीं कर सकती ?देख बहुत बेइज्जती हो जाएगी। जो पैसे उसने दिए थे ,मैंने खर्चा कर दिया ,वो वापस भी मांगने लगा तो मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है। ये बड़ा शहर है ,यहाँ पति -पत्नी दोनों को मिलकर कमाना होता है। अब तू मेरी पत्नी बनेगी तो हमारे पास पैसा भी तो होना चाहिए। तभी तो घर बसायेंगे। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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