Zeenat [part 62]

पुलिस के द्वारा ज़ीनत के पकड़े जाने पर ,पुलिस ने उसे बहुत पीटा और पूछा -बता ,तेरे गिरोह में और कौन -कौन शामिल है ?

 गिरोह क्या होता है ? ज़ीनत ने पूछा। 

इतने बड़े -बड़े काम करती है ,गिरोह का नहीं पता ,सीधी बन रही है। बता ,तेरे साथ और कौन -कौन है ?कहते हुए उसकी टांगों में डंडा मारा। 


 मेरा कोई गिरोह नहीं है, मैं किसी को नहीं जानती हूं, डंडे की मार खाकर रोते हुए ज़ीनत ने कहा। 

तेरी बहुत दिनों से शिकायतें आ रहीं थीं ,तू सबसे लड़ती है , हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया,सोचा -ग़रीब है ,लोग तंग करते होंगे ,हमने जाने दिया किंतु तू तो अपने साथ मौत लेकर घूम रही है ,तेरा लक्ष्य तो कुछ और ही था। तू इतनी सीधी नहीं है, जितनी तू दिखती है, कहते हुए इंस्पेक्टर कविता ने उसकी टांगों में फिर से जोर से डंडा मारा और उससे पूछा -बता तुझे यह बिमारी कब से है ? आखिर तू चाहती क्या है ?

मैं कुछ भी नहीं चाहती, मैं बस सुकून से जीना चाहती हूं,पर कोई मुझे जीने ही नहीं देता। 

 दूसरों का सुकून छीनकर, सुकून की बात करती है। बता ,किसने तुझे यहाँ भेजा है ?इंस्पेक्टर कविता को लगा ,शायद यह किसी की चाल भी हो सकती है ? हो सकता है ,इसे किसी योजना के तहत हमारे इलाक़े में भेजा गया हो।  बता जल्दी ! कहते हुए उसने डंडा उठाया। 

रोते हुए,ज़ीनत बोली -ग़रीब हूँ ,तब भी, किसी को मुझ पर तरस नहीं आया। किसी ने मेरी मजबूरी, मेरी परेशानी को नहीं समझा। अम्मी -अब्बू मर गए ,मैं अनाथ हो गयी। मुझ पर तो किसी को रहम नहीं आया। 

तेरे अम्मी -अब्बू ने तुझे, तेरी बहन और जीजा को सौंपा था ,क्या उन्होंने तेरी परवाह नहीं की ? तेरा ख़्याल नहीं रखा ,तूने उनकी भी बदनामी करवा दी और तू वहां से भाग गयी। तू तो उनकी भी सगी नहीं हुई ,जो तुझे पाल रहे थे ,तेरी देखभाल कर रहे थे ,बता !तू  किसके साथ भागी थी, अब वो कहां है ?

इंस्पेक्टर की बात सुनकर ज़ीनत एकदम से रोते -रोते चुप हो गयी ,उसने अपने आंसू पोंछे ,उसका चेहरा एकदम से कठोर हो गया। 

चुप ,क्यों है ? नहीं बताएगी तो , तुझे इसी तरह पीटती रहूंगी। बहुत ढीठ हो गई है। हमें तो पता चल ही जाएगा किन्तु मैं तेरे मुंह से सुनना चाहती हूं। मुझे जो भी सुनाना है, सच-सच बताना , एक भी झूठ नहीं होना चाहिए , इंस्पेक्टर कविता ने कहा। 

तब जो जीनत ने उसे बताया -उसके आधार पर कहानी इस तरह से है - मेरे अम्मी- अब्बू ने मुझे, मेरी आपा  के पास भेज दिया था ,ताकि मैं शहर में रहकर कुछ सीख़ लूँ और साथ ही मेरी आपा की, उसके काम में मदद भी हो जाएगी। उसके तीन बच्चे थे ,वो अकेली थी। वो अम्मी -अब्बू से कहती रहती थी -'बच्चों के साथ घर का काम भी... मैं संभाल नहीं पाती हूँ। मुझे भी चाव चढ़ा था ,अपने बहनोई के घर जाने का... कुछ दिनों तक तो उन्होंने मुझे ठीक से रखा। नई जगह आकर मुझे अच्छा लगा। तब मैंने एक दिन देखा , रफ़ीक मेरी बहन को पीट रहा था, मेरी बहन रो रही थी। वो काम से थक जाती थी। मैं उसके बच्चों को संभालती और घर की सफाई करती थी।

रफ़ीक कौन ?

मेरी बहन का पति ! 

तेरा जीजा ,फिर उसका नाम क्यों ले रही है ? ज़ीनत ने घृणा से मुँह बनाया और थूका ,बोली - मेरा तो उसका नाम लेने का भी मन नहीं करता। नीच है।   

क्यों ,उसने ऐसा क्या किया ? 

मुझे पता नहीं चला , रफ़ीक ने मेरी बहन को क्यों पीटा ?मैंने ,उससे बहुत पूछा - जीजा क्यों नाराज है ?

उसने मेरी तरफ देखा और खामोश रही। कुछ दिनों बाद बोली -कितनी महंगाई है ,सारा खर्चा वो ही तो उठाता है ,अब तू भी आ गयी ,उसके मन में परेशानी रहती है। 

ये बात मैंने अपने अम्मी -अब्बू से कही , रफ़ीक परेशानी में है ,मेरा खर्चा भी बढ़ गया। 

 तेरे जाने से ऐसा कौन सा खर्चा बढ़ गया ?

अम्मी ने कहा  -तेरा निक़ाह हो जाये और तू अपनी सुसराल चली  जाये और हमें क्या चाहिए ? तेरी बहन की मदद के लिए ही तो तुझे भेजा है ,वरना हम वापस बुला लेते।

एक दिन मैंने रफ़ीक को ,कहते सुना ,तेरे घरवाले उस घर का क्या करेंगे ? उनके तो कोई बेटा नहीं है ,जो वो संभालेगा। 

तुम्हें ,तुम्हारा हिस्सा मिल गया ,उस घर को ज़ीनत के लिए रख छोड़ा है ,वो उसका है ,अम्मी -अब्बू उसके नाम करेंगे।

 तब मैंने ही अपने उस बहनोई  से कहा - तुम उसे बरत लो ! जब मुझे ज़रूरत होगी ,मुझे दे देना। वो घर उसने किराये पर चढ़ा दिया ,उसकी नियत उस घर को हड़पने की थी। जिससे उन्हें मेरे रहने पर कोई परेशानी ना हो, इसलिए मैंने वो घर उन्हें बरतने के लिए दे दिया। 

मेरे अम्मी -अब्बू ने एक दिन मुझे बुलाया -'अब वहां रहते बहुत दिन हो गये ,अब घर वापस आजा ! मैं अपने घर जाने को तैयार थी ,उसी रात मेरा जीजा, मेरे कमरे में घुस आया और बोला -मैंने, तेरी बहन से कितनी बार कहा है ? मुझे, तेरे साथ सोने दे ! तो लड़ती थी। आज उसे और तुझे' मैं' वो मौक़ा ही नहीं दूंगा। मेरे साथ उसने पूरी रात जबरदस्ती की। 

तेरी आपा कहाँ गयी ? वो नहीं आई। 

मैं खूब चिल्लाई ,पर वो नहीं आई ,तब रफ़ीक ने ही बताया ,-'वो तो नींद की गोली खाकर सो रही है। वो गोली रफ़ीक ने ही उसे खिलाई थी। उसकी नजर तो मुझ पर बहुत दिनों से थी ,पर मेरी बहन उसे, मेरे पास नहीं आने देती थी इसीलिए वो, उसे पीटता था। मेरी बहन ने भी, मुझे कभी नहीं बताया था। 

क्या तूने अगले दिन अपनी बहन को नहीं बताया। 

बताया था ,तब रफ़ीक ने उसे धमकी दी थी , वो अगर ज्यादा बोली -तो वो उसे तलाक़ दे देगा ,तब वो अपने तीन बच्चों के साथ कहाँ धक्के खायेगी ?उसने ,मेरे अम्मी -अब्बू से भी कह दिया था -ज़ीनत ! नहीं आ रही है,वो यहाँ महफूज़ है। 

अम्मी -अब्बू ने तो सोचा था ,मेरी आपा मेरा रिश्ता कराएगी किन्तु उसकी शादी ही मुसीबत में पड़ गयी। इसीलिए वो चुप रही। वो रोज़ रात को मेरी बहन को रोता छोड़कर, मेरे पास आ जाता था ,तब मैं चौदह बरस की थी। मैं बहुत डर गयी थी ,आपा भी डरती थी। वो मुझे ही डांटती थी -तू मेरी ज़िंदगी में ज़हर घोलने आ गयी। 

वो अपने शौहर को तो कुछ कह न सकी,एक दिन दुपट्टे से मेरा गला ही दबा दिया क्योंकि उसके शोेहर ने  उसे धमकी दी थी , वो उसे छोड़कर मुझसे  निक़ाह कर लेगा। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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