Zeenat [part 58]

ज़ीनत चाहती थी, जिन लोगों के घर उसने पहले काम किया है, जिनसे उसकी जान -पहचान है। वे ,उसके  काम न करने के बाद भी, उसे उसी तरह मन से अपने घर बुलाएं  ! भूमि के पड़ोस में आये नए पड़ोसी ,उन लोगों ने ज़ीनत को ,अपनी बेटी की शादी भी नहीं बुलाया, जबकि वो वहीं खड़ी हुई थी। वह भीख नहीं मांगती थी, किंतु खाने के लिए, या फिर खाने के समय कहीं भी पहुंच जाती थी। ऐसे समय में कोई उसे खाने के लिए भी न पूछे तो उसकी बेइज्जती हो जाती थी।

 तब ज़ीनत ने भूमि के घर जाकर भूमि को बताया और उससे पूछा - क्या तुम लोगों को भी, उन्होंने नहीं बुलाया ? शायद वह सोच रही थी , इनके निमंत्रण पर ही मैं भी, इनके साथ चली जाऊंगी। 

बुलाया है , किंतु हम लोग तो शाम को जाएंगे।

ऐसे कई उदाहरण थे, जिनके कारण उसकी इज्जत और बेइज्जती का सवाल आ जाता था। कहती थी -मुझे पुलिस वालों ने डंडा इसीलिए दिया है, कोई गलत करेगा तो उसको डंडे से मारूंगी। दरअसल हुआ ये था ,ज़ीनत हर शाम को बताती थी, कि मेरी ड्यूटी लगती है क्योकिं मैं 'पुलिस' हूँ। न जाने वो बाहर जाकर क्या करती होगी ?

 भूमि ने सोचा- मुझे, इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए फिर चाहे ये वहां जाकर कुछ भी करे। एक दिन बड़ी घबराई सी आई और बोली -आंटी ! कुछ काम करवा लो !

नहीं ,अब शाम के समय कोई काम नहीं है ,तुम अपने काम पर जाओ ! वैसे वो लोग, तुमसे क्या काम करवाते हैं। 

बाजी ! मेरी शाम की ड्यूटी होती है ,मैं 'चालान' काटती हूँ।

 ये बिना पढ़ी -लिखी, क्या चालान काटती होगी ?फिर सोचा जब वहां जाती है ,तो वे कुछ तो लाभ उठाते ही होंगे। इससे छोटा -मोटा काम करवाते होंगे। तुम आज अपने काम पर क्यों नहीं जा रही हो ?किन्तु उसने कुछ नहीं बताया। थोड़ी देर रुकी खाना खाया चली गयी, अगले दिन भी इसी तरह वहीं रहने की ज़िद करने लगी।

 तब भूमि ने पूछा -तुम तो ड्यूटी करती थी  ,छुट्टी भी नहीं करती थी  ,तब अब  यहाँ कैसे रुकना चाहती हो ?

तब थोड़ा नजरें नीचे करती हुई बोली - मेरा वहां झगड़ा हो गया। 

किससे ,और क्यों ? भूमि इतना तो जानती थी , ये पुलिसवालों से लड़ने का साहस तो नहीं करेगी। 

तब वो बोली - मेरा एक चायवाले से झगड़ा हो गया ,मुझसे पुलिसवालों ने कहा था -चार चाय के लिए कहकर आ ! मैंने चायवाले से चाय मांगी किन्तु उसने मुझे चाय नहीं दी, डांटकर भगा दिया। मैं वापस आ गयी ,थोड़ी देर बाद वो चाय लेकर आया ,तो मुझे उस पर गुस्सा आया ,इसने मुझे चाय नहीं दी।इसने मेरी बेइज्जती की।  तब मैंने, उसकी टांगों में डंडा मारा और उसकी चाय उसके ऊपर फेंककर मारी। इस बात पर झगड़ा हो गया ,अब पुलिस वालों ने मुझसे कहा है -'दो -चार दिन यहाँ मत आना।' 

तुम्हारे पास तो पैसे नहीं होते ,पुलिसवाले भी तुम्हें, तुम्हारी ड्यूटी का कोई पैसा नहीं देते। तब तुम क्या उससे चाय मुफ़्त में मांगने गयीं थीं ?

वहां सभी पुलिसवाले मुफ़्त में ही चाय पीते हैं ,उसने मुझे ही चाय नहीं दी।  

तुम क्या सोचती हो ? उन्होंने यह डंडा तुम्हें ,किसलिए दिया है ?

जब मुझे कोई परेशान करे ,तो डंडा मारना। 

सही ,ये डंडा तुम्हारी सुरक्षा के लिए दिया  है , हर किसी पर चलाने के लिए नहीं, तुमने उन आंटी की तरफ डंडा उठाया, वह गलत था। तुम कहीं की थानेदार हो, जो किसी को भी उठाकर डंडा मार देती हो। चाय वाले ने , तुझे मुफ़्त में चाय नहीं दी , तब तूने उसकी टांगों में डंडा बजा दिया ,ये क्या बात हुई ?

 वह अपने को पुलिस वाली समझती थी , इसीलिए वह भी मुफ़्त में चाय पीना अपना अधिकार समझ रही थी , बात इतनी बढ़ गई थी, तब पुलिस वालों ने उसे, उधर आने के लिए मना कर दिया था। वे लोग भी, उसे कुछ नहीं कहते थे। कह देते थे,'' पगली है। ''

तब भूमि बोली - उसे डंडा मारकर तूने अच्छा किया या गलत ,वो चुपचाप खड़ी रही। तब भूमि बोली -वो गरीब चायवाला ,चाय बेचकर अपने परिवार को पालता है ,तुझे पता है ,चाय की पत्ती ,दूध ,चीनी कितने  महंगे हो रहे हैं ? ऊपर से ईंधन भी... चाय बनाकर इसीलिए बेचता है ,उसके घर में उसकी पत्नी, बच्चे होंगे सारा खर्चा निकालकर वो अपने परिवार का पेट पालता होगा। यदि पुलिसवाले भी मुफ़्त में चाय पी रहे हैं ,वो भी तो गलत है ,हो सकता है ,उसे इकट्ठे पैसे दे देते होंगे। तुझसे तो अपने पैसे खर्च करके एक कप चाय भी नहीं पी जाती और दूसरे से मुफ़्त में चाय भी मांग रही है और डंडे भी बजा रही है। तू, तो बहुत अक़्लमंद है। 

भूमि की बात सुनकर वो मुस्कुराने लगी। 

ये हंसने की बात नहीं है ,तू ,मुझे ये सोचकर बता ,तूने गलत किया या नहीं। उस बेचारे चायवाले का क्या नाम था ?

'इक़बाल '

तेरे ही मज़हब का है ,हो सकता है ,पुलिसवालों के सामने तुझे कुछ न कहा हो ,तू अब उधर चली भी मत जाना, तुझे काटकर फ़ेंक देंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। जब तुझे अपनी इज्ज़त -बेइज्जती का पता है ,तो क्या उसकी बेइज़्जती न हुई होगी ?

हाँ ,बाज़ी ! तुम ठीक कह रही हो ? मुझे ड़र लग रहा था। वो मुझे घूर रहा था। तुम, मुझे अच्छे से समझा देती हो ,किसी ने मुझे इस तरह से नहीं समझाया ,बस मुझे गुस्सा आता रहता है।

तुझे ही गुस्सा आता रहता है ,क्या सामने वाले को गुस्सा नहीं आएगा ?

तुम्हारे सामने वाली ,उसके यहाँ मैं काम करती थी ,सारा दिन कुत्ते की तरह भोंकती रहती है। ये क्या कर दिया ? कपड़ों पर गंदे हाथ लगा दिए। यहाँ हाथ मत लगा ,यहाँ पानी क्यों बिखेर दिया ? पीछे पड़ी रहेगी। 

उनकी ऐसी ही आदत है ,तुम्हारा काम है ,अपना काम सही तरीके से  करो !किसी का नुकसान होगा और वो कहेगा भी नहीं ,ऐसा कैसे हो सकता है ? तूने हमारा फेंसी बल्ब तोड़ दिया ,पता है ,वो कितने का था ? वो तो मैंने, तेरे अंकल से छुपा दिया। तूने तो सुबह -सुबह हमारा नुकसान कर ही दिया ,किसे गुस्सा नहीं आएगा। तुम ही मेहनत कर रही हो ,अपने तरीक़े से सभी मेहनत करते हैं। ये मत समझना आंटी इतनी सीधी हैं। उस बल्ब के पैसे काटूंगी ,तभी तो तू अगली बार संभलकर काम करेगी। 

अच्छा !ये बता जब तेरे बच्चों को तू अपने भाई के दिए ,घर में ले गयी तो उन्होंने क्या कहा ?

उस जगह को देखकर दोनों बड़े खुश हुए ,वैसे उनके काम की जगह से वो बहुत दूर जगह थी फिर भी खुश थे। 

तूने उन्हें बताया नहीं, ये जगह उनके मामा ने, उन्हें दी है। 

ये क्यों बताऊँ ? वो तो मेरी थी ,अम्मी ने मुझे दी थी। याकूब तो उसे बेचने आया था ,अहसान थोड़े ही किया है ,वो तो मुझे मिल गया तो मेरी जमीन मुझे वापस दे दी।वैसे, उसने भी मुझे ये बताने के लिए मना किया था।  

भूमि मन ही मन सोच रही थी ,ये कैसी औरत है ? इसे समझना मुश्किल है। इसे गरीब समझकर सहानुभूति दिखाना भी शायद व्यर्थ है। कभी लगता ,चालाक है ,कभी लगता मूर्ख है किन्तु पाग़ल तो नहीं लगती।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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