जब पुनीत को, उसके बेटे ने बताया कि,'मम्मी किस तरह घबरा गयीं थीं ,ज़ीनत बहुत देर तक सोती रही थी।'' उनकी मुस्कुराहट देखकर भूमि ने पूछा -क्या हुआ ?
तुम इसे, लेकर क्यों इतना घबराती या परेशान होती हो ?
इंसानियत के नाते ,कोई इंसान हमारे घर में है ,तो ख़्याल रखना तो बनता है ,कल को कुछ हो गया तो... कौन जबाब देगा ?
देखा ,बेटे ! इतना तो कभी हमारा भी ख्याल नहीं रखा गया ,जो एक कामवाली का रक्खा जा रहा है।
ऐसा आपको लगता है ,बिना ख़्याल रक्खे ही ,ये गृहस्थी चल रही है किन्तु 'घर की मुर्गी दाल बराबर 'न ही मेरा काम नजर आता है ,न ही परवाह !नाराज होते हुए भूमि ने कहा।
अच्छा,नाराज मत हो, हम तो मज़ाक कर रहे थे ,तब पुनीत बोले -ये बहुत मज़बूत है ,मोटी चमड़ी है , तुम्हारे कहेनुसार इसने कितनी परेशानियां देखीं हैं ? किन्तु इसे कुछ नहीं हुआ ,तुम इसे लेकर ज़्यादा परेशान मत हो ! तुम न होतीं तो मैं इसे घर में भी घुसने न देता ,तुम्हारे कारण ये घर में आ रही है।
तुम क्या समझती हो ?ये तुम्हारे घर में ही काम कर रही है ,न जाने, इसने कितने घरों में काम किया होगा ?सब तुम्हारी तरह इसको लेकर भावुक नहीं होती होंगी। काम किया, छुट्टी !काम से काम रक्खो !
पता नहीं ,इसे कैसे पुलिस में रख लिया ? भूमि सोचती ,एक दिन उसने पुनीत से ही पूछ लिया -मेरी समझ में नहीं आ रहा ,ये पुलिस में कैसे है ?
तुम भी क्या उस पागल की बातें सुनती हो ? वो भला पुलिस में कैसे होगी ? उसे पढ़ना -लिखना कोई काम नहीं आता ,तुम उसकी बातें सुनती ही क्यों हो ? सुनती हो और विश्वास भी कर लेती हो।
किन्तु उसकी वो ड्रेस ! ये क्या झूठ बोलेगी ?
ऐसे तो कोई भी बनवाकर पहन ले !चलचित्रों में भी तो पुलिस वाले होते हैं ,पता नहीं ,इसे किसने ये ड्रेस दे दी ?
तब उसी ने एक दिन बताया, उसने ही यह ड्रेस बनवाई है,पूरे तीन हज़ार में बनी है।
अगले दिन वो थोड़ा ठीक थी ,तब वो भूमि के पास आकर बैठी और धीरे -धीरे अपनी कहानी बताने लगी और ये भी बताया , वो रातभर जागी थी और ढेर सारी शराब भी पी थी ,उसकी बात सुनकर भूमि को लगा ,पुनीत सही कह रहे हैं ,ये सही नहीं है , कहीं, मैंने इसे अपने घर में घुसाकर कोई गलती तो नहीं कर दी।
बोली - तुम्हें शराब पीने की क्या जरूरत है ?
वो लोग, मुझे पिलाते हैं ,भूमि नहीं जानती थी कि वो किन लोगों की बात कर रही है ,तब बोली - कल तुम्हारी हालत इतनी खराब थी ,यदि तुम किसी वाहन से टकरा जातीं तो क्या होता ?
हाँ ,बाज़ी सही कह रही हो ,खुश होते हुए बोली - हमारा 'रमज़ान का महीना '' आ रहा है ,ये दिन बड़े अच्छे होते हैं।
क्या तुम भी' रोज़ा 'रखती हो ?
नहीं ,खाने को तो कुछ मिलता नहीं ,रोज़ा खोलने के लिए खाने को भी तो चाहिए। तब बोली -आंटी !अब रमज़ान के महीने में ,मैं यहीं रहा करूंगी। [मग़रिब की नमाज़ ]के बाद चली जाया करूंगी।
भूमि ने सोचा -शायद' इफ़्तार 'में इसे भी कुछ खाने को मिल जाता होगा इसीलिए कह रही है किन्तु वो जब दूसरी नमाज़ की आवाज आती तब जाती। पता नहीं, अपने शब्दों में क्या -क्या बताती थी ? जो भूमि की समझ से परे थी।
एक दिन सुबह -सुबह रोते हुए आ खड़ी हुई ,उसका इस तरह घर में रोते हुए प्रवेश करना भूमि को अच्छा नहीं लगा। उससे पूछा -क्या हुआ ?
आपकी पड़ोसन मेरे पैसे नहीं दे रही ,उससे मेरे पैसे दिलवाओ ! उसे गंदी -गंदी गलियां देने लगी।
मैं, उसे जानती भी नहीं ,कभी उससे मिली नहीं ,तुम अपने आप उससे बात करो !और हाँ इस तरह रोते हुए आना अच्छा नहीं लगता ,तुम्हारा तो 'रमज़ान' का महीना चल रहा है। ये पवित्र महीना होता है ,इन दिनों में तुम किसी के लिए गालियां निकाल रही हो। ये क्या अच्छा लगता है ?अपने मन को शांत कर उस अल्लाह को याद करो !सब सही होगा।
हाँ ,बाज़ी ! तुम सही कह रही हो ,तुमने याद दिलवा दिया। अब मैं नाराज़ नहीं होउंगी ,गाली भी नहीं दूंगी ,कहते हुए उसने अपने ख़ुदा को याद कर अपने दोनों कानों पर हाथ लगाकर माफ़ी मांगी।
उसकी ऐसी बातों को देखकर ,रूही को लग रहा था ,ये पागल तो नहीं है ,लोगों के व्यवहार से दुखी थी सब इसका इस्तेमाल करते ,कभी किसी ने इसके दिल की बात नहीं सुनी ,न ही कभी इससे, इसकी परेशानियों के बारे में जानना चाहा, इसलिए इसके अंदर गुस्सा भरा था। अब तो ये अकेले में कम ही बड़बड़ाती है। खुश भी रहने लगी है।
वो भूमि को खुद ही कहती ,आंटी ! जबसे तुम्हारे यहां काम करने आई हूँ ,अब मेरा दिमाग़ ख़राब नहीं होता।तुम कितने अच्छे से समझाती हो ?
भूमि को भी लगा ,दुनिया में इतने लोग गरीब और परेशान लोग हैं किन्तु कम से कम मैंने किसी एक की ज़िंदगी को संवारने में उसकी सहायता तो की। उसे सही राह दिखा सकी।
तब वो बोली -आंटी !क्या मेरी ज़िंदगी यूँ ही कट जाएगी।
क्या मतलब ? मैं कुछ समझी नहीं।
मेरी उम्र अब चालीस की हो गयी ,मेरा अभी तक शौहर भी नहीं आया ,तबसे अकेली हूँ।मेरा बुढ़ापा भी यूँ ही अकेले कटेगा।
मुझे तो लगता है ,वो क्या अब तेरे इंतज़ार में होगा ?उसने कहीं न कहीं शादी कर ली होगी ,तू भी ,किसी से शादी कर लेती।
हाँ, वो तो सही है , भाईजान ! ने तो कहा था किन्तु अम्मी ने ही मना कर दिया।
जब तू सब जगह घूमती है, तो कहीं अपने लिए शौहर भी ढूंढ़ लेती।
तुम्हारी बात सही है ,पर मुझसे कौन शादी करेगा ? मुझे कुछ भी काम नहीं आता ,वो रोटी भी मांगेगा ,कपड़े भी धोने को कहेगा ,ऐसे ही कोई नहीं रखता। तुम भी अंकल के चार काम करती हो ,उन्हें टाइम पर खाना देती हो ,उनके कपड़े धोती हो , उनकी डांट भी सुनती हो ,तब वो तुम्हें अपने घर में रखते हैं।
उसकी ये बातें सुनकर भूमि को लगा ,जैसे इसने, मुझे आईना दिखला दिया हो किन्तु भूमि को अच्छा नहीं लगा। उसके शब्द टूटे कांच की तरह चुभते महसूस हुए। अपनी जगह इसकी बात भी सही है किन्तु ऐसी हक़ीकत दिल में कहीं चुभन पैदा कर जाती है। तब भूमि बोली - ऐसा नहीं है ,घर में सभी मिलजुलकर काम करते हैं ,तभी तो घर चलता है। तेरे अंकल बाहर कमाने जाते हैं और मैं घर संभालती हूँ। अब क्या वो बाहर से आकर घर में भी काम करेंगे ? तो क्या अच्छा लगेगा ?
एक दिन वो दोपहर में ही आई और बोली -आज तो बाज़ी !बेइज़्जती हो गयी।
भूमि मुस्कुराई ,ये भी इज्ज़त -बेइज़्जती समझती है ,तब उससे पूछा -क्या हुआ ?
तुम्हारे मौहल्ले में जो शादी हो रही है ,उनके यहाँ मैं ,बहुत पहले काम करती थी किंतु अब यह लोग, यहां आकर रहने लगे हैं। मैं तो इन्हें बरसों से जानती हूं। अब उनकी बेटी की शादी है। मैं उनके घर के सामने खड़ी थी , उन्होंने देखकर भी नजरअंदाज कर दिया। बताओ ! मेरी कितनी बेइज्जती हो गई ? उन्होंने पूछा भी नहीं, वह तो मुझे अच्छे से जानती थी। क्या उन्होंने शादी में तुम्हें नहीं बुलाया ?
