भूमि ने पूछा ,अब तो तुम्हारे भाईजान तुम्हें मिल गए थे ,फिर तुम्हें अपने साथ क्यों नहीं ले गए ?
पता नहीं, बाजी ! मुझे तो ख़ुशी थी, मेरी अम्मी ने जो जमीन मेरे लिए छोड़ी थी, मुझे मिल गयी। मैं, अपने दोनों बच्चों को लेकर वहीँ रहने लगी।
भूमि ने महसूस किया ,इसका भाई इसे जमीन दे गया ,इसे ख़ुशी थी, किन्तु इसने घर वापस जाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखलाई ,शायद इसे लोग इसीलिए 'पगली' कहते होंगे। मां के मरने का इसे कोई दुःख नहीं हुआ ,भाई साथ न ले गया ,इसमें भी इसे कोई परेशानी नहीं हुई या फिर, शायद ये जानती थी ,माँ के लिए दुःख व्यक्त करने पर वो अब वापस नहीं आने वाली ,भाई से साथ ले जाने के लिए कहूंगी भी, तो वो, ले जाने वाला नहीं और ये बात सही भी थी।
हम, अपने को' सामान्य' कहते हैं किन्तु इतनी समझ होते हुए भी ,हम अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाते, वर्तमान में जीते हुए भी बीते लम्हों को याद कर परेशान होते हैं ,भविष्य की चिंता करते हैं ,किसी का अनुचित व्यवहार देख, दिल से लगा लेते हैं। उस आधार पर देखा जाये तो वो अपने हालातों से संतुष्ट थी। उसे जो भी मिला , उसी में सुकून ढूंढ़ लिया।
चलो !अच्छा हुआ ,अब तुम्हारी ज़िंदगी सही राह पर चल निकली ,एक- दो घर और पकड़ लेती और अपने बच्चों को पढ़ातीं।
नहीं ,उनका दिमाग पढ़ाई में ही नहीं लगता था। उन्हें तो कमाना था ,गरीबी और परेशानी जो देखी है। अच्छा आंटी !अब मैं जा रही हूँ। ओके ,टाटा ,बाए !कहकर वो चली गयी।
न जाने, ये शब्द उसने कहाँ से सीख़ लिए ?आते समय नमस्ते करना नहीं भूलती थी और जाते समय ओके ,टाटा ,बाय !करके जाती थी।
अगले दिन आई उसके चेहरे का रंग बदला हुआ था ,भूमि ने उससे कोई बात नहीं की ,उसने भी कुछ नहीं कहा, सीधे झाड़ू उठाई और चुपचाप काम करने लगी। उसको देखकर लग रहा था ,कुछ परेशान है। जब वो चाय पी रही थी, तब बोली - बाजी ! मुझे कोई कमरा किराये पर दिलवा दो !
क्यों ,क्या हुआ ?
रात मुझे, मेरे लड़के ने बहुत पीटा ,मेरे डंडे बजा दिए !
ऐसा क्या हो गया ? उसने क्यों पीटा ?
पता नहीं ,मैं भूखी रहती हूँ ,खुद खा लेते हैं।
तू भी तो ख़ुद बनाकर खा लिया कर....
मुझसे तो चाय बनानी भी नहीं आती।
क्या तुझे चाय सीखनी नहीं चाहिए ? क्या तेरे घर में चूल्हा नहीं है ?
सब सामान है।
तभी हमारी बातें सुन रहे पुनीत बोले -ये काम सीखना ही नहीं चाहती क्योंकि इसे काम ही नहीं करना है ,इसके लिए तो तुम जैसी चाय और रोटी देने के लिए जो बैठी हैं। ये सारा दिन घूमती रहती है ,काम करेगी तो इसका घूमना कैसे होगा ?
पुनीत की बातें सुनकर उसके चेहरे के भाव बदल गए ,वो हल्का सा मुस्कुराई और चली गयी।
भूमि रसोई में गयी ,तब पुनीत भी पीछे -पीछे पहुंच गए और बोले - अब हमीं को देख लो ! हम भी तो धीरे -धीरे सारा काम सीख़ गए हैं ,पता है ,नहीं करेंगे या सीखेंगे तो धर्मपत्नी जी के 'कोप का भाजन' बनना पड़ेगा।
अच्छा ,आप कहना चाहते हैं ,मैं आपसे काम करवाती हूँ ,नाराज़ होते हुए भूमि बोली।
नहीं ,मेरे कहने का मतलब है ,जब तुम बीमार हो जाती हो या कभी -कभी खाना बनाने का मन नहीं करता ,तब तो तुम्हारी सहायता करवाते ही हैं।
बात को मत बदलो ! मक्खन में लपेटकर मार रहे हैं।
मक्ख़न ! मक्ख़न तो आजकल बहुत महंगा है ,उसे बर्बाद करने के लिए थोड़े ही मंगाएंगे।
अच्छा,तो अब मक्ख़न मेरे लिए मंगाया तो बर्बाद हो जायेगा।
नहीं -नहीं तुम कहो ! तो तुम्हारे लिए मक्खन की पूरी ट्रे मंगवा दें।
कोई ज़रूरत नहीं है ,मैं अभी भोजन बनाकर भेजती हूँ ,मुझे पता है ,ये रोमांस और मस्ती के कीड़े तभी कुलबुलाते हैं ,जब आपको भूख लग रही होती है।
तुम, मुझे समझती हो ,तो देरी क्यों ? मैं तब तक मैच देख रहा हूँ।
धीरे -धीरे ज़ीनत की बातों से मुझे पता चला ,उसका एक गरीबों को दिया जाने वाला घर भी है और उसके घर में सभी सामान है। उसके बच्चे न जाने कहाँ काम करते हैं ? न जाने कहाँ खाते हैं ,न ही, उसे इस बात की परवाह थी।
एक दिन जब वो आई ,उसकी हालत देखकर भूमि घबरा गयी ,वो बोली -बाजी ! मुझे चक्कर आ रहे हैं ,मेरी तबियत ठीक नहीं ,तुम्हारा काम करके चली जाउंगी।
नहीं ,तू रहने दे ! तू, आराम कर !मैं अपने आप काम कर लूंगी ,जा अपने घर जाकर सो जा !
नहीं ,घर नहीं जाउंगी।आंटी ! आज मैं तुम्हारे घर में ही थोड़ा आराम कर लूँ।
भूमि को थोड़ा अटपटा लगा ,पुनीत आ गए तो नाराज होंगे ,तब बोली - तू ऊपर के कमरे में आराम कर ले और अपने अंकल के आने से पहले चली जाना। वो कमरे में ऊपर गयी ,एक घंटा ,दो घंटा ,उसे सोते हुए छह घंटे बीत गए। भूमि को चिंता होने लगी ,कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया है। अपने आपको कोसने लगी ,मैंने बेकार ही उसे यहाँ सोने दिया। तब भूमि धीरे से पैरों की भी आवाज़ न हो सावधानी से ऊपर देखने गयी।
ज़ीनत एक चादर ओढ़े ,बड़ी गहरी नींद में थी। भूमि को लगा ,ये सबसे लड़ती रहती है। कहीं किसी ने कुछ खिला तो नहीं दिया। कहीं ये मर तो नहीं गयी। इतनी देर में न जाने कितने विचार आये और चले गए। यह देखने का प्रयास करने लगी, इसकी साँस चल तो रही है या नहीं।
तभी मन में विचार कौंधा ,यदि ये यहां मर गयी तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा ,वो भी ग़ैर समुदाय से है ,लोग हमें ही कहेंगे -इन्होंने ही कुछ किया होगा। पुलिस आ गयी तो....इससे आगे उससे सोचा भी नहीं गया ,घबराकर उसे आवाज़ लगाई - ज़ीनत !ज़ीनत ! वो हड़बड़ाकर उठ बैठी।
भूमि ने उसे देखकर सुकून की साँस ली ,मन ही मन सोचा -जिन्दा है !अपनी घबराहट छुपाते हुए बोली -तुम कितनी गहरी नींद में सोती हो ,तुम इतनी देर से सो रही हो , क्या तुम्हें अपने घर नहीं जाना है ? तुम्हारे अंकल आ गए, तो मुझे भी डाँटेंगे !अब तुम्हें अपने घर जाना चाहिए।
वैसे तुम्हें क्या हुआ था ? क्या कुछ उल्टा -सीधा खा लिया था जो तबियत बिगड़ गयी।
जबाब देने की बजाय वो बोली -बाज़ी ! थोड़ी सी चाय दे दो !
भूमि ने चाय बनाते हुए उससे कहा -तबियत ख़राब हो तो... यहाँ मत आया करो ! अपने घर में आराम किया करो !
आंटी !मुझे आना पड़ता है ,शाम को मेरी ड्यूटी है ,मैं पुलिस में हूँ ,पुलिस की ड्रेस तो वो पहनती ही थी। उसके हाथ में डंडा भी रहता था ।जब वो चली गयी ,भूमि अपने काम में व्यस्त हो गयी ,जब वो अपने कमरे में आई तो पुनीत और उसका बेटा मुस्कुरा रहे थे।
क्या हुआ ? तब भूमि को पता चला ,बेटे ने अपने पापा के आते ही घर की सारी स्थिति उन्हें बता दी और ये भी बताया -'मम्मी ! डर गयीं थीं ,कहीं ये अल्लाह को प्यारी तो नहीं हो गयी।
