अचानक ही ज़ीनत का भाई इतने वर्षों के पश्चात उसे मिल ही जाता है। इतने दिनों का गुस्सा आंसू बनकर बह निकला। उसके मिलने की ख़ुशी , मन की कड़वाहट आंसुओं के रूप में सब बाहर आ रहा था। नाराज होना चाहती है किन्तु अधिक देर नाराज न रह सकी। तब उसके भाई ने उसे बताया -अब अम्मी इस दुनिया में नहीं रहीं।
अच्छा ! न ही वो रोई, न ही अफ़सोस जतलाया ,इतनी ज़्यादा उसकी सोचने की क्षमता नहीं थी ,भाई को भी देखकर थोड़ी देर भावुक हुई और तुरंत ही अपने मौजूदा हालातों में आकर बोली - वो देखो ! मेरे बच्चे और मैं वहां रहते हैं। कई बार तो उसको देखकर लगता है ,जो भी वो करती और कहती है ,उन्हीं हालातों को याद रख ले वही बहुत है किन्तु कभी -कभी बहुत पुरानी बात भी उसे याद आ जाती।
उस पुल के नीचे , दूर से ही उस जगह को देखकर याकूब को आश्चर्य और दुःख भी हुआ। हमारी बहन की क्या हालत हो गयी है ? अब इन्हें वापस घर तो नहीं ले जा सकता। ये कहाँ रहेंगी ? मेरे बच्चों पर क्या असर होगा ? बीवी भी ,इन्हें रखने से मना कर देगी। काम के लालच में ही रख ले तो इन्हें तो कोई काम भी नहीं आता। अब ये अकेली नहीं दो बच्चे भी साथ में हैं। तब उसने पूछा -खाने -पीने का क्या इंतज़ाम है ?
जिनके यहाँ मैं काम करती हूं ,वो ही मुझे खाने को दे देती हैं।
बच्चों का क्या ?
अब बच्चे बड़े हो गए हैं ,बाहर ही खा लेते हैं किन्तु कहाँ और कैसे ?ये बात तो वो भी नहीं जानती।
याकूब ने एक गहरी साँस ली और मन ही मन सोचा ,ऊपरवाला सबको देखता है ,यदि उसने जीवन दिया है तो पालता भी वही है। तब वो बोला -आपा ! ये बात किसी से मत कहना कि मैं तुमसे मिला था। दरअसल बात यह है। यहीं पास के गांव में हमारी एक छोटी सी ज़मीन है। बहुत पहले अम्मी ने तुम्हारे लिए ली थी। आज मैं, उसी जमीन को बेचने आया था। उसमें एक छोटी सी कोठरी है ,तुम वहां रह लेना।
क्या अम्मी ने मेरे लिए ज़मीन ली थी ?
हाँ ,उसमें एक कमरा है ,वहीं रह लेना ,आओ !चलो ! तुम्हें वो जगह दिखाता हूँ। चलो, अपना सामान उठा लो ! मन ही मन याकूब सोच रहा था -'मेरी बीवी ने तो वो ज़मीन मुझे बेचने के लिए भेजा है ,कुछ और पैसे जोड़कर वो अपने घर को ठीक करवाना चाहती है और एक कमरा भी डलवाना चाहती है।
उसे, जबसे पता चला है , ज़ीनत के नाम की ज़मीन के कागज़ात मेरे पास महफूज़ हैं ,तबसे ही कह रही है ,उस ज़मीन को बेच दो ! उसका पता नहीं ,अब वो ज़िंदा भी है ,या मर गयी। अब उससे जाकर कह दूंगा ,उस ज़मीन का अभी कोई ख़रीददार ही नहीं मिला।
आज ज़ीनत के चेहरे पर ख़ुशी थी ,ये ख़ुशी भाई से मिलने की थी या फिर घर मिलने की ,अपने आप ही मुस्कुरा रही थी। न जाने, याकूब से क्या -क्या कह रही थी ? किन्तु याकूब तो अपनी ही परेशानियों में उलझा था। उसे ज़ीनत की बातों से कोई लेना -देना नहीं था। एक तरफ बहन की हालत देखकर चाहता था ,उसे उसका हिस्सा मिले ,दूसरी तरफ बीवी की इच्छाओं के विषय में सोच रहा था। कैसे उसे झूठ बोलकर बहकाये रखना है ?
बहुत दूर जाकर एक सुनसान इलाक़े में वो कमरा था ,उसकी हालत देख ,याकूब सोच रहा था - इसका होना, न होना ही बराबर है। उसका दरवाजा भी उखड़ा हुआ था ,फर्श के नाम पर ईंटें बिछी थीं। दीवारों पर प्लास्टर भी नहीं हो रहा था। यहाँ ये कैसे रहेगी ? तब अपने मन को समझाया ,इससे पहले कौन सा अच्छी जगह पर रह रहीं थीं ? उस पुल के नीचे रहने से तो बेहतर है। अम्मी के जाने से पहले उन्हीं के साथ आया था। तब भी उस कोठरी की हालत ठीक थी। अम्मी को गए हुए भी कई साल बीत गए। अपनी बेटी की फ़िक्र में ही वे चल बसीं। इन्हें तो ये भी नहीं पता कि ये किस हालत में हैं ,जिस भी हालात में हैं, मुझे तो नहीं लगता ,इन्हें अपने इन हालातों से कोई शिकायत है। जैसी भी हैं ,खुश हैं।
उस कोठरी को देखकर ज़ीनत खुश थी और बोली - ये हमारी है ,अम्मी ने ली थी ,कहते हुए उसने अपने पुराने कपड़ों की पोटली ,वहीं जमीन पर पटक दी। उस कोठरी की सिर्फ़ दीवारें ही खड़ी थीं ,कोई अलमारी नहीं थी। तब भी ज़ीनत खुश थी ,बोली -मेरे बच्चे तो वहीँ आएंगे ,अभी मैं वहीं पुल के नीचे जाउंगी यहीं लेकर आउंगी।
अपने बच्चों से मेरे बारे में कुछ मत बताना कि उनके मामू ने ये जगह दी है।
क्यों ?
वे मुझे पहचानेगें भी नहीं ,क्या जरूरत है ?अपने रिश्ते बताने की ,घर तो उन्हें मिल ही गया ,अबकि बार पैसे मिले तो इसका ये दरवाजा ठीक करवा लेना। अभी मुझे देर हो रही है ,मैं चलता हूँ।अपने बच्चों के साथ, अब यहीं रहना ,कभी -कभी मिलने आ जाया करूंगा।
याकूब सोच रहा था ,अब जैसे भी हालात में बच्चे रह रहे हैं ,वो अपने में खुश हैं किन्तु जब उन्हें पता चलेगा उनके' मामू' हैं और बहुत अच्छे तरीक़े से रहते हैं, तो परेशान हो जायेंगे। अपने रहन -सहन की तुलना करने लगेंगे और उनके मन में कई सवाल उठ खड़े होंगे। यह भी सोच सकते हैं ,हम मामू के साथ क्यों नहीं रहते हैं ? या हम इन हालातों में क्यों हैं ?
तब याकूब जाने से पहले, ज़ीनत से एक बात और कह देना चाहता था ,बच्चों को पढ़ने के लिए भेजा करो , याकूब ने पीछे मुड़कर देखा तो, ज़ीनत जमीन में लेटी सो रही थी। उसे आश्चर्य हुआ ,ये तो जमीन में लेटते ही सो गयी। मन ही मन मुस्कुराया फिर सोचा - शायद रात में इसे नींद न आती हो ,थक गयी होगी ,सोचकर जाने लगा ,तभी याद आया अभी तो इसे अपने बच्चों को भी लेने जाना है। न जाने कब उठे ? अभी इसे उठाना ही बेहतर रहेगा।
आपा ! आपा ! उठो !
ज़ीनत हड़बड़ा कर उठी ,याकूब को अपने सामने देखकर बोली - हाँ, चलो ! कहते हुए फुर्ती से उठी और आगे बढ़ गयी। सड़क पर पहुंचकर याकूब ने वापस जाने के लिए बस पकड़ी और ज़ीनत से बोला -बच्चों का ख़्याल रखना ,उन्हें पढ़ने के लिए भेजना। याकूब जानता था, वो मेरी बहन है किन्तु ये नहीं चाहता था कोई मुझे उसके साथ देखकर यह जाने ,मैं उसका भाई हूँ। जैसे हालात ज़ीनत के थे ,उन्हें देखकर वो उसे अपनी बहन कहने में भी हिचकिचा रहा था किन्तु उस शहर में उसे कोई नहीं जानता था ।
वापस लौटते समय उसे, अपने मन में एक सुकून था ,जो उसका था ,उसको सौंप दिया। कम से कम उसकी कुछ तो मदद कर सका। बस में बैठने से पहले, उसने ज़ीनत के हाथ में कुछ पैसे भी रख दिए थे ,बोला -'दरवाज़ा ठीक करवा लेना। '
