Zeenat [part 54]

ज़ीनत अपने बच्चों को ,ले जाकर एक पुल के नीचे रहने लगी। कुछ शराबी , एक अकेली अनजान, बेसहारा,लाचार औरत को देखकर वहां भी आ ही जाते। ऐसे लोगों के मन में बेसहारा औरतों के लिए बड़ी हमदर्दी होती है। उनके लिए ज़माने भर का प्यार उमड़ आता है।  कुछ लोग पांच -दस रूपये भी दे देते थे कभी -कभी खाने को भी दे देते थे। ये सब नशे में ही होता था। 

ज़ीनत को पैसे की कोई लालसा नहीं थी।  उन पैसों को वह अपने बच्चों को देती थी। वह नहीं जानती थी, वह क्या कर रही है ? घरवालों ने उसे बहुत ढूंढा किन्तु वो नहीं  मिली ,अब उसकी हालत भिखारियों जैसी हो गयी थी। पुल के नीचे एक तरफ उसके बच्चे सो रहे होते ,और कुछ दूरी पर ज़ीनत के तन से न जाने कौन -कौन अपनी हवस मिटा रहे होते ? 


ये इंसान भी कैसे हैं ?वैसे तो ये लोग, समाज के सामने अपने को कितने तहज़ीबदार ,सलीक़ा पसंद दिखलाते हैं ,किन्तु रात के अँधेरे में जब दो घूंट गले से नीचे उतर जाती है तो इनकी असलियत नज़र आती है। ज्यादा पैसे वाले हों तो पैसे से अपना इंतज़ाम कर लेते हैं। जिन' गलियों को बदनाम 'कहते हैं ,वही रात के अँधेरे में वहां डोलते नजर आते हैं। कुछ ऐसे भी हैं ,जिनके पास में धेला नहीं , चाहत तो है। तब वे उन बदबूदार गंदी गलियों में ,जमीन में या किसी ग़रीब की गोद में लेटते नजर आएंगे ,जो दिन के उजाले में ,उन्हें बदबूदार और गंदी कहकर मुँह फेर लेते हैं।  

एक दिन ज़ीनत ऐसे ही, भूखी और परेशान घूम रही थी , उसका सारा दिन घूमने का ही काम रहता था। न जाने ,कब ,कहां, कुछ खाने को मिल जाए ? तब उससे एक महिला ने पूछा - तुम तो अच्छी खासी हो ,हाथ -पैर भी सही -सलामत हैं ,फिर कुछ काम क्यों नहीं करतीं ? मेहनत करके क्यों नहीं खाती हो ?

 मुझे कौन काम देगा ? मुझे कुछ काम करना भी नहीं आता। 

क्या साफ-सफाई का काम भी नहीं आता ? झाड़ू -पोछा तो लगा सकती हो ? मैं तुम्हें पांच सौ रूपये दूंगी ,क्या मेरे घर में काम करोगी ? 

पांच सौ रूपये , इतनी बडी रक़म सुनकर ज़ीनत खुश हो गई ,वह नहीं जानती थी कि पांच सौ रूपये कितने होते हैं ?या उन रुपयों से उसकी कितनी जरूरतें पूरी हो सकती हैं ?किन्तु ये अवश्य जानती थी कि ये बहुत सारे पैसे हैं।

 वह उस महिला के यहां काम करने के लिए तैयार हो गयी। उस महिला को भी लालच था, सस्ते में ही एक कामवाली मिल गई। उसने कुछ काम उसे सिखाया , उसे खाने को भी दिया। अब ज़ीनत खुश थी कम से कम , खाने के लिए कुछ तो मिल जाता है। मंदिर में भी दान -पुण्य के लिए रोज-रोज कोई नहीं आता था। वैसे तो कोई भी खाने को न दे ,भगा देते थे किन्तु पुण्य कमाने के नाम पर ये ढकोसला करते हैं,उससे कुछ गरीबों को एक या दो दिन खाने को मिल जाता है । 

 देखने से अब ज़ीनत की हालत भिखारी जैसी ही हो गई थी। न ही उसके पास बदलने के लिए कपड़े थे और न ही नहाने के लिए कोई जगह थी।

एक दिन उसी महिला ने उससे कहा ,यदि तुझे, मेरे यहाँ काम करना है ,तो कपड़े धोकर और नहाकर आना ,तुझमें से बहुत बदबू आती है। इस तरह तो कोई काम नहीं देगा। उस महिला ने ,अपने घर के कुछ पुराने कपड़े उसे पहनने के लिए भी दिए। 

इतने सारे कपड़े देखकर ज़ीनत की आंखें चमक उठी ,उसे तो जैसे खज़ाना हाथ लग गया। खुश होते हुए ,कपड़े अपनी जगह पुल के नीचे ले आई और अपने बच्चों को भी वे कपड़े दिखलाये ,जिनमें कुछ टी शर्ट और पेंट भी थी। बच्चे उन्हें पहन -पहनकर देख रहे थे। तब वो उस जगह से खेतों की तरफ गयी ,जहाँ ट्यूबवेल चल रही थी। जीनत ने आसपास देखा, वहां कोई है तो नहीं ,हो भी तो क्या फर्क पड़ता है ?

ट्यूबवेल के ठंडे -ठंडे पानी में नहाई  और कपड़े पहने ,आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था। जैसे उसकी सभी मुसीबतें ख़त्म  हो गई हैं।  उसे अब किसी चीज की जरूरत ही नहीं है। रहने के लिए जगह मिल गई, खाने और कपड़े के लिए एक घर मिल गया। पैसों के लिए काम मिल गया और क्या चाहिए ? देखा जाएं तो ,हसरतें किसी की पूरी नहीं होतीं ,किन्तु गरीब की हसरतें ज्यादा बड़ी भी नहीं होतीं। 

 वैसे देखा जाए तो सारा संसार ही उसका घर है, आकाश उसकी छत, मानो तो सब अपने ही हैं और ना मानो तो घर में रहते हुए भी, घर के लोग अपने नहीं होते। 

उस पुल  के ऊपर से गाड़ियां ,बस आती जाती रहती थी, किंतु पुल के नीचे कोई नहीं झांक कर नहीं देखता था बल्कि वहां पर कई बार तो कूड़ा फेंक कर चले जाते थे।

 एक दिन ऐसे ही वो बाहर सड़क पर घूम रही थी तभी एक व्यक्ति ने उसे दिखा , वह आगे बढ़ गई। 

 तब वह उसके पीछे-पीछे आया और उससे पूछा - क्या तुम ज़ीनत  हो ?

ज़ीनत ने उस व्यक्ति को ध्यान से देखा। दाढ़ी बढ़ी हुई थी, सर पर गोल टोपी थी , आंखों पर चश्मा था। वो उसे पहचानने की कोशिश कर रही थी। 

 तभी वह बोला -मैं याकूब !

 उसके इतना कहते ही, ज़ीनत के सब्र का बांध टूट गया और वह जोर-जोर से रोने लगी और बोली-तू आज आया है। यहाँ से चला जा !!

आपा चुप हो जाओ ! वह तो यही सोच कर घबरा रहा था कि यह शायद मुझे पहचान भी नहीं पाएगी या थोड़ी मुश्किल तो हुई लेकिन मैं पहचान गई क्योंकि वह जानता था , इसकी याददाश्त थोड़ी कम है। तब उसने पूछा -आपा ! तुम यहां कैसे ?

पता नहीं, मैं तो बस में बैठी थी। 

कहां जाना चाहती थी ? 

अपने शौहर के पास।

आदिल क्या तुम्हें अभी भी याद है ? यह सोचकर याकूब को आश्चर्य हुआ। याकूब ने देखा ,वो पुराने कपड़े पहन रही थी ,जो उसकी नाप के भी नहीं थे ,बाल बिखरे हुए थे ,चेहरे की रंगत  न जाने कहां चली गयी थी ? उसकी आवाज़ में कोई सुधार नहीं था।  तुम इधर कहां जा रही थी ? तुम कहाँ रहती हो ,तुम्हारा घर कहां है ? चलो तुम्हारे घर ही चलकर बातें करते हैं। अम्मी ! तुम्हें इस हालत में देखकर कितना परेशान होतीं ?

घर के नाम से ज़ीनत हड़बड़ा गई और बोली - घर नहीं है। 

घर नहीं है ,फिर तुम कहाँ रहती हो ?तुम्हारे बच्चे कहाँ हैं ? तुम्हारा खर्चा कैसे चलता है ? उसकी हालत देखते हुए बोला -क्या भीख मांगती हो ?

अल्लाह कसम भाईजान !मैंने कभी भीख नहीं मांगी। 

तब तुम क्या करती हो ? तुम्हारा और बच्चों का खर्चा कैसे चलता है ?

याकूब  ने पूछा-' तुम्हारे बच्चे कहां है ?वह तो घर पर होंगे या नहीं । उन्हें कहां छोड़कर आई हो ?वह मन ही मन सोच रहा था हो सकता है इन्होंने अपने याददाश्त की कमी के कारण कहीं, उन्हें इधर-उधर न छोड़ दिया हो। 

तब वह बोली-बच्चे यहीं  हैं। 

चलो उनसे मिलते हैं। कहते हुए उसने आगे चलने के लिए हाथ से इशारा किया ,तब बोला -यदि तुम्हें अम्मी इस हालत में देख लेतीं तो क्या कहती ? कितना परेशान होतीं ?

अब तक ज़ीनत ने अपनी अम्मी के बारे में नहीं पूछा था ,उसे इतनी सुध ही कहाँ रहती है ?  तब ज़ीनत को अपनी अम्मी की याद आई और बोली - भाईजान !अम्मी कैसी हैं ? मुझे याद करती होंगी। 

आपा ! तुम्हें ये सुनकर दुःख होगा ,अम्मी अब इस दुनिया में नहीं रहीं वो हम सबको  छोड़कर इस दुनिया से चली गयीं। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post