सबको खुश करने की चाहत में,' खुद' खुश रहना भूल गई।
भरोसा पाने की धुन में, खुद पर 'भरोसा 'करना भूल गयी।
दिन देखा न रात ,परवाह करते गैरों की 'स्व' को ही भूल गई।
वक़्त कहां, कब मेरा रहा ? खुद को 'वक्त 'ही देना भूल गई।
थे, सपने मेरे ,ग़ैरों को खुश करने में अपनी' चाहत' भूल गई।
उम्र आगे बढ़ती गई , उम्र का 'अंदाज़ा ' ही करना भूल गयी।
सुनती रही मैं ,''मौन'' सबकी बातें ,अपने 'स्वर' ही भूल गयी।
कितने सावन आये ?रिमझिम बरसातों में 'भीगना' भूल गयी।
मुहब्बत की थी कभी हमने ,'प्रीत' भरी बातें करना भूल गयी।
जीवन में कब आईं ?' बरसातें ! कब बीते ,मौसम- सुहावने ?
ज़िंदगी जीने की चाहत में , 'जीवन 'को ही जीना भूल गयी।
उदासियों के घेरे कुछ इस क़दर बढ़े ,खुश रहना ही भूल गयी।
