Bhool gayi

सबको खुश करने की चाहत में,' खुद' खुश रहना भूल गई। 

भरोसा पाने की धुन में,  खुद पर 'भरोसा 'करना भूल गयी।  

दिन देखा न रात ,परवाह करते गैरों की 'स्व' को ही भूल गई। 

वक़्त कहां, कब मेरा रहा ? खुद को 'वक्त 'ही देना भूल गई। 



थे, सपने मेरे ,ग़ैरों को खुश करने में अपनी' चाहत' भूल गई। 

उम्र आगे बढ़ती गई , उम्र का 'अंदाज़ा ' ही करना भूल गयी।

सुनती रही मैं ,''मौन'' सबकी बातें ,अपने 'स्वर' ही भूल गयी।  

कितने सावन आये ?रिमझिम बरसातों में 'भीगना' भूल गयी।

 

मुहब्बत की थी कभी हमने ,'प्रीत' भरी बातें करना भूल गयी। 

जीवन में कब आईं ?' बरसातें ! कब बीते ,मौसम- सुहावने ?

ज़िंदगी जीने की चाहत में , 'जीवन 'को  ही जीना भूल गयी।

उदासियों के घेरे कुछ इस क़दर बढ़े ,खुश रहना ही भूल गयी।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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