Chehre ke pichhe chehra

 चेहरे के पीछे ,छुपा चेहरा देखती हूं। 

' मैं 'क्या से क्या हो गई हूं ?

कभी नादान थी, आज'' चट्टान'' हो गई हूँ। 



मासूमियत को मेरी, अपनों ने लूटा,

देकर मुझे, छल ,फरेब और धोखा

आज अपनी ही नजरों में 'चालाक' हो गई हूं। 

आईने में देखती हूं, तो क्या से क्या हो गई हूँ ?

 

अपनापन और प्यार था, लोगों के लिए, 

अपनों पर नहीं ,ग़ैरों पर भी विश्वास था। 

अब तो 'बेरुख़ी' की एक 'मिसाल' हो गई हूं।

 क्या थी ?'मैं ''क्या से क्या हो गयी हूँ ?


नहीं जानती थी, चेहरे के पीछे भी चेहरा होता है। 

सलोने चेहरे का हर कोई 'दीवाना' होता है। 

जब से असली चेहरे की 'पहचान' में खो गयी हूँ। 

'मैं' विभिन्न मुखौटों की'' क़द्रदान'' हो गयी हूँ।

    

अब तो ''दुःख ''में भी 'मुस्कुरा ' लेती हूँ। 

मन के भाव छुपा , बड़ाई भी कर लेती हूँ।

आज झूठे चेहरों को परखने लगी हूँ। 

लगता, अब तो अभिनय में ''सरताज़ ''हो गयी हूँ।


 झूठी सराहना भाती नहीं,झूठे लोग, लुभाते नहीं। 

 हमदर्दी के बोल,मरहम लगाते नहीं।

देखो !अब पहले से कितनी समझदार हो गयी हूँ ?

भोलापन, मासूमियत खो, न जाने क्या हो गयी हूँ ?    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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