चेहरे के पीछे ,छुपा चेहरा देखती हूं।
' मैं 'क्या से क्या हो गई हूं ?
कभी नादान थी, आज'' चट्टान'' हो गई हूँ।
मासूमियत को मेरी, अपनों ने लूटा,
देकर मुझे, छल ,फरेब और धोखा
आज अपनी ही नजरों में 'चालाक' हो गई हूं।
आईने में देखती हूं, तो क्या से क्या हो गई हूँ ?
अपनापन और प्यार था, लोगों के लिए,
अपनों पर नहीं ,ग़ैरों पर भी विश्वास था।
अब तो 'बेरुख़ी' की एक 'मिसाल' हो गई हूं।
क्या थी ?'मैं ''क्या से क्या हो गयी हूँ ?
नहीं जानती थी, चेहरे के पीछे भी चेहरा होता है।
सलोने चेहरे का हर कोई 'दीवाना' होता है।
जब से असली चेहरे की 'पहचान' में खो गयी हूँ।
'मैं' विभिन्न मुखौटों की'' क़द्रदान'' हो गयी हूँ।
अब तो ''दुःख ''में भी 'मुस्कुरा ' लेती हूँ।
मन के भाव छुपा , बड़ाई भी कर लेती हूँ।
आज झूठे चेहरों को परखने लगी हूँ।
लगता, अब तो अभिनय में ''सरताज़ ''हो गयी हूँ।
झूठी सराहना भाती नहीं,झूठे लोग, लुभाते नहीं।
हमदर्दी के बोल,मरहम लगाते नहीं।
देखो !अब पहले से कितनी समझदार हो गयी हूँ ?
भोलापन, मासूमियत खो, न जाने क्या हो गयी हूँ ?
