ज़ीनत को लगता था ,लोग आते हैं ,उसका इस्तेमाल करते हैं ,चले जाते हैं। किसी को भी, उससे या उसके बच्चों से कोई हमदर्दी नहीं है। जो लोग उससे मिलने आते थे ,उनसे भी उसने मदद मांगी किन्तु किसी को भी उसकी परेशानियों से कोई मतलब नहीं था। उनके ऐसे रूखे व्यवहार से रोज़ाना , वह थोड़ा -थोड़ा टूट रह थी। इन मतलबी इंसानों से उसे नफ़रत हो रही थी। किसी ने भी उसकी मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।
अब ज़ीनत का छोटा बेटा नौ बरस का हो गया था । लोगों का व्यवहार भी बदलता रहता था ,अब उसके ख़रीददार भी कम हो गए थे।अब हमेशा वो नशे में रहती ,पहले से ही उसे ,अपने बारे में सोचने की कोई सुध नहीं थी, नशे में उसका सिर घूमता रहता।उसे इतना सोचने का भी वक़्त नहीं था ,ताकि वह पछता सके ,उसने अपना घर छोड़कर कितनी बड़ी गलती की है ?
अपने ही लोगों के अपमान को लिए ही ,इस दुनिया में भटक रही थी। इन लोगों से भी उसे बेइज्जती मिल रही थी किन्तु इतना तो सब्र था ,ये अपने नहीं हैं। उसका शरीर जैसे मशीन बन गया था। दुकानदार ने उसे धमकी तो दी थी किन्तु अपना काम निकलवाने के लिए ,उसे कभी -कभी बहला -फुसला भी लेता था किन्तु अब उस पर झल्लाने लगा था।
तब एक दिन ज़ीनत को जब होश था ,उसके बच्चे उसी के पास थे। उसने अपना सारा गुस्सा उस दुकानदार पर निकाला और उससे पूछा -मेरी मेहनत के पैसे कहाँ है ? मुझे मेरा पैसा दे दो !
तू कौन सी मेहनत करती है ? दुकानदार अकड़ते हुए बोला -तू और तेरे ये दो पिल्ले क्या खाते या पहनते नहीं हो ?
ज़ीनत को उस पर गुस्सा आया और उसने एक भारी पत्थर उठाकर ,उसके सिर पर दे मारा जिससे उसका सिर फूट गया,और उसके सिर से खून की धारा बह निकली। खून देखकर ,वो डर गयी और उसके घर से भाग निकली।
इस सब का कारण यही था, एक दिन, एक आदमी ने उससे कहा था -यह दुकानदार तेरा इतना फायदा उठा रहा है, तुझे कमाई का कुछ हिस्सा देता भी है या नहीं या खुद ही तेरी सारी कमाई खा रहा है। यह बात ज़ीनत के जहन में उतर गई और वही गुस्सा ज़ीनत ने उस पर उतार दिया।
तू ,मुझसे रोटमानी कर रहा है , मुझे पैसे गिनने नहीं आते, मुझे पता है, तेरे पास मेरा बहुत सारा पैसा होना चाहिए। तू, मेरा पैसा दे !
नहीं देता,जा ! क्या कर लेगी ?इतने दिनों से यहां रह रही है, खा- पी रही है ,उसका खर्चा कौन देगा ? तेरा बाप !
यह सुनते ही ज़ीनत ने पत्थर उठाकर उसके सिर पर दे मारा था, और अपने दोनों बच्चों को लेकर बाहर की तरफ भागी ,दरअसल उसने गुस्से में उसके सिर पर पत्थर तो मारा किन्तु उसके सिर से बहता खून देखकर डर गई। उसे डर लग रहा था ,कहीं उसे पुलिस न पकड़ ले।
ज़ीनत , जंगल की तरफ भागती जा रही थी, जैसी वो दस साल पहले आई थी। अभी भी वैसे ही खाली हाथ है। उस दुकानदार ने उसका इस्तेमाल किया किंतु आज भी उसके हाथ खाली हैं। उसका बड़ा बेटा जो बारह बरस का हो गया था। वह हिसाब -किताब लगाने लगा था। वो दुकानदार, उसके बेटे को दुकान पर बैठाकर काम करवाता था और उसे डांटता रहता था। यह सब देखकर, उसे गुस्सा भी आता था किंतु उसे भी धीरे-धीरे आदत पड़ गई थी। उसने सोचा ,शायद इसी तरीके से जिंदगी जी जाती है।कभी अपनी माँ से भी नहीं कह पाया क्योंकि वो तो न जाने किस हालत में रहती थी ? जो उसके बेटे की समझ से बाहर था।
वे तीनों भागते हुए , एक पूल के नीचे बैठ गए। वहां पर धूप भी नहीं आ रही थी।
उसने वहां से जगह साफ की और एक पुरानी सी चादर बिछाई ,बच्चों से बोली -तुम यहां बैठ जाओ ! मैं अभी आती हूं।
नहीं ,हमें डर लग रहा है ,कहते हुए दोनों बच्चे रोने लगे। डर तो ज़ीनत को भी लग रहा था ,कहीं वो इंसान मर तो नहीं गया ,जिन्दा रहा तो पुलिस बुला लेगा। वो सारा दिन अपने बच्चों को लिए बैठी रही। अब कहाँ जाए ? उसे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, लोग उसका फायदा उठाना चाहते थे ,वो यह बात समझती थी लेकिन कह नहीं पाती थी। उसके सामान में ,थोड़ा सा खाने का सामान था ,उसने उसे बच्चों को दिया ,ख़ुद पानी पीकर 'पेट की आग बुझाई 'दो दिन भूखे रहने के बाद ,अब उसकी हालत भी बिगड़ रही थी। वह बच्चों के लिए कुछ खाना लाने के लिए चल दी।
भीख कभी मांगी नहीं थी, किंतु खाने के लिए कुछ न कुछ मांग लेती थी। उसे पैसे की जरूरत नहीं थी, उसे सिर्फ खाना चाहिए था। सड़क पर यूं ही धक्के खा रही थी। तभी वह एक मंदिर के सामने से गुजरी, वहां एक महिला, गरीब लोगों को, भोजन खिला रही थी। ज़ीनत भी वहीं बैठ गई, उसने खाना खाया और अपने बच्चों के लिए खाना लेने के लिए फिर से पंक्ति में बैठ गई।
जो लड़का भोजन परोस रहा था ,उसने ज़ीनत को देखा ,तो उससे बोला -तू, अभी तो खाना खा रही थी फिर से लाइन में क्यों लगी है ? क्या तेरा पेट नहीं भरा ?
मेरे बच्चे भूखे हैं ,थोड़ा सा खाना उन्हें भी दे दो !
जो भोजन करना है यहीं करो ! घर ले जाने के लिए नहीं है ,उसने ,ज़ीनत को डांटा।
जो ये भंडारा कर रहा था ,उसने पूछा -क्या बात है ?क्या इस लड़की ने भोजन नहीं किया।
यह तो खा चुकी है ,अब घर ले जाने के लिए भी मांग रही है , कह रही है -इसके बच्चों के लिए भी खाना चाहिए। अभी यहाँ इतने लोग लाइन में लगे हैं , उनको भी तो खिलाना है। कहकर वो आगे बढ़ गया।
उस आदमी ने ज़ीनत की तरफ देखा और उसे उस पर तरस आ गया और बोला -ए लड़की , यहाँ आओ !
ज़ीनत ,उसके समीप गयी ,तब उसने पूछा - घर में किसे खाना ले जाना है ?
मेरे दो बच्चे हैं।
चल वो थैला उठाकर ला ! कहते हुए उसने इशारा किया ,जब वो थैला उठा लाई ,तब उसने उस थैले में खाने का सामान भरकर दे दिया। आज ज़ीनत बहुत खुश हो गयी।
अब उसे यही ठिकाना मिल गया, कोई न कोई वहां कुछ न कुछ दे ही देता था और कभी-कभी वह भूखी भी रह जाती थी। बच्चों से भी कहने लगी,मंदिर के सामने बैठ जाया करो ! बच्चे भी वही जाकर बैठने लगे।
दान- पुण्य के नाम पर, लोग गरीबों को भोजन खिलाते थे, उनमें से एक गरीब ज़ीनत भी थी।
कुछ शराबी लोगों को उसका ठिकाना पता चल गया , वे शराबी आते ,शराब पीते और बच्चों को सामान लाने के लिए भेजते या फिर ज़ीनत को ही एकांत में बुलाते। उसे शराब पीने के लिए देते और खाने के लिए भी कुछ न कुछ दे देते थे।
