तुमसे कहनी थी, कुछ दिल की बात ....
अधरों तक आते ठहर जाती, दिल की बात !
शायद, समझ सके न कोई , दिल की बात!
क्यों कहनी है ? तुमसे ,मुझे दिल की बात !
शायद पर आ ,अटक जाती, दिल की बात !
भावों भरा ,नाजुक सा दिल ! कुछ कहता।
सामने तुम हो ,देख तुम्हें , कहना चाहता।
पत्थर बन जाता,कह न पाता ,दिल की बात !
जिद करता , मासूम दिल की 'क़शमक़श'।
कहे किससे, क्यों कहनी?मुझे दिल की बात !
मत उड़ेल ! भाव मन के ,समझाता ।
ये भाव , मोहब्बत !प्यार !विश्वास से बंधे !
इंतहां , इनकी हर कोई न समझ पाता।
परखते तुम्हें , भाव और घना हो जाता।
घबराता कही, जो तुमसे , दिल की बात !
ह्रदय में संजो लेता ? क्या दिल तुम्हारा !
कही जो मैंने ,तुमसे ,अपने दिल की बात !
झूठी हमदर्दी ! झूठे लोग !
समझे न कोई, दिल की बात !
शब्दों ,भावों का अंजाम सोच !,
कही जो, उससे दिल की बात !
दर्द सह लेता,छल न सह पाता।
आते -आते ,अधरों पर ठहर जाती।
अंजाम सोच ,कह सका न, दिल की बात !
