जिस लालच में ,उस दुकानदार ने ज़ीनत को, अपने समीप रखा था ,वो लालच तो, बेरोक- टोक कब का पूरा हो चुका था ? किन्तु अब वो ज़ीनत के बच्चों के खर्चों को उठाना नहीं चाहता था। बाहर से भी कब तक खाना मंगवाकर खाता ? सोचा तो यही था -उसे अपनी देखरेख के लिए एक जवान महिला मिल जाएगी किंतु अब तो उसे, उसके बच्चों को भी पालना पड़ रहा है , खाना तो उसे बनाना आता ही नहीं है ,यही सब सोचकर , वह परेशान हो रहा था। किंतु उसकी परेशानी ज्यादा समय तक नहीं रही और उसका लालची चेहरा , उसकी एक विकृत सोच के कारण चमक उठा। तब उस दुकानदार ने ज़ीनत से कहा -नहा -धोकर शाम को तैयार रहना।
क्या हम कहीं जा रहे हैं ? ज़ीनत ने उससे उत्सुकता से पूछा।
नहीं ,हम कहीं नहीं जा रहे हैं ,तुम्हें लेकर भला कहाँ जाऊंगा ? आज कुछ मेहमान आएंगे।
वो भी, इतने दिनों से घर में कैदियों की तरह बंद पड़ी थी।न ही किसी मोहल्ले -पड़ोस में जाती थी ,न ही किसी से बात करती थी। मोहल्ले में भी किसी ने समझा ,बाल -बच्चेदार औरत है ,शायद इसकी कोई रिश्तेदार होगी।
किसी ने उस दुकानदार से पूछ भी लिया तो कह देता - नौकरानी है ,बेचारी ग़रीब है ,इसीलिए मैंने सोचा ,मुझे भी दो रोटियों का सहारा हो जायेगा।
शाम को कुछ लोग आए, ज़ीनत तैयार ही थी , उसके लिए वो दुकानदार अच्छे और नए कपड़े लेकर आया था। दुकानदार ने उन सब को ज़ीनत से मिलवाया। कुछ देर के बाद, एक वहीं पर रह गया ,बाकी सब चले गए। जिसने,उसके सबसे ज्यादा दाम दिए थे,वो वहीं रह गया।
तब उस दुकानदार ने कहा -जा आज इसको खुश कर दे !
नहीं ,ये कौन है ? मुझे इसके साथ नहीं सोना है।
क्या तू मेरे साथ नहीं सोती है ? इसके साथ सोने में क्या परेशानी है ? डांटते हुए ,उसने कहा।
तुमने, मेरे बच्चों की देखभाल की,मुझे सहारा दिया।
ये, तुझे पैसे देगा ,तेरे बच्चों का कितना खर्चा हो रहा है ? उसके लिए पैसे चाहिए या नहीं ,तेरे बच्चे स्कूल में पढ़ें ,क्या तू ये नहीं चाहती है ?
तुम मेरा खर्चा कर रहे हो ,क्या तुम्हारे पास पैसा नहीं ? मैं नहीं जाउंगी।
क्यों नहीं जाएगी ? चल चुपचाप ,आगे बढ़ ! वो दूसरे कमरे में तेरा इन्तज़ार कर रहा है ,तू ,मेरी पत्नी नहीं ,मैं कमा रहा हूँ ,तो क्या तेरे इन पिल्लों को पालने के लिए कमा रहा हूँ ? इस तरह नख़रे दिखा रही है,जैसे पहली बार हो।
तू चाहती है , तू इस घर में रहे तो, उस आदमी के पास चली जा ! वरना तुझे और तेरे बच्चों को घर से बाहर फ़ेंक दूंगा , फिर सड़कों पर धक्के खाना।
आज उसका ऐसा रूप देखकर ज़ीनत के मन में उसके प्रति घृणा और गुस्सा भर गया किन्तु वो भी लाचार थी। समझ नहीं आ रहा था ,वो कहाँ जाएगी ? वो वहीं बैठी उसकी तरफ देखती रही। शायद इस उम्मीद से ,वो उसे जाने न दे !
चल अब, यहाँ क्यों बैठी है ? लगभग खींचते हुए ,ज़ीनत को उसने, उस कमरे की तरफ धकेल दिया जहाँ पहले से ही उसका ख़रीददार बैठा था।
वो ज्यादा सोच -समझ नहीं पाती थी ,किन्तु इतना समझती थी ,कि उसकी बेइज़्जती हो रही है। उस दुकानदार ने भी कह दिया था। जो भी तू कमाएगी ,उससे तेरे बच्चों के कपड़े -पढ़ाई सब होगा। नहीं कमाएगी ,तो ऐसे ही पड़े रहना। न जाने, किस हरामी के पिल्लों को साथ लिए घूम रही है ? हालांकि यह शब्द उस दुकानदार ने धीरे से कहे थे किंतु ज़ीनत के कानों में विष घोल गए थे।
आज दुकानदार की बात मानकर, अपने बच्चों के लिए, वह आदमी के पास चली तो गई थी किंतु इतना अवश्य जानती थी , कि जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है ,वह सही नहीं है। उस दिन उसने अपने आप को समझाया , किंतु अगले दिन भी, एक नहीं, दो लोग आए।
दुकानदार का घर अच्छे इलाक़े में था ,वहां अच्छे परिवार रहते थे। मोहल्ले में कोई गलत काम हो रहा है ? कहीं लोगों को शक न हो जाए, इसीलिए उसने एक अलग जगह ले ली थी और वहां पर , जीनत का सौदा करने लगा था। अब वह धीरे-धीरे थक रही थी और उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था। जो दुकानदार उसे अच्छा इंसान नजर आया था ,अब उसके लालच के कारण अब ,ज़ीनत की नजरों में दरिंदा नजर आने लगा था।
कभी-कभी जब कोई उससे कुछ उल्टा- सीधा कह देता, तो वह उससे लड़ने लग जाती और जोर-जोर से चिल्लाती, उसकी हालत देखकर ऐसा लगता था, कि मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। बच्चों से भी बेपरवाह हो गयी थी। वो, उसके बच्चों के लिए कुछ भी लाकर, उल्टा -सीधा भी रख देता। कई बार तो उन लोगों की झूठन भी ,उन बच्चों को खिला देता। उसे अच्छी कमाई होने लगी थी ,किन्तु उसका लालच भी, उतना ही बढ़ता जा रहा था। एक दिन एक ख़रीददार ने ,ज़ीनत की शिकायत उससे की।
यह तू क्या कर रही है, दुकानदार उसके पास आकर बोला -मैंने सुना है -तू ग्राहक से लड़ रही थी। क्या तू जानती नहीं है, तेरे बच्चों का और तेरा खर्चा इसी से चल रहा है।
इतना सारा पैसा आता है, क्या उससे मेरा ही खर्च चल रहा है ? गुस्से से ज़ीनत बोली।
तू, अपने को क्या समझती है ? मैं, लोगों को लेकर आता हूं, तेरे ख़रीददार, तेरे सामने खड़ा करता हूं। तेरे कपड़े ,तुझमें से इतनी बदबू आती है ,उसके लिए क्रीम ,पाउडर भी तो आता है। इसीलिए तेरा आदमी भी तुझे छोड़कर भाग गया होगा। जो मिल रहा है ,उसी में खुश रह और चुपचाप यहां पड़ी रह ,समझी !
यदि तुझे, मैंने घर से निकाल दिया तो तेरी क़ीमत दो कौड़ी की भी नहीं होगी। यहां से बाहर जाकर ,इज्जत भी गंवाएगी और कोई पैसा भी नहीं देगा। तुझे कुछ काम -धंधा तो आता नहीं है, बिना करे - धरे खाने को मिल रहा है, तो तेरी जबान चलने लगी है।
माना कि ज़ीनत की यौन इच्छा सामान्य से कुछ अधिक थी , इसीलिए कई बार वो ,अपने को विवश पाती थी। किंतु इतना भी नहीं था, कि उसे रात या दिन में होश ही न आए। कई बार वह गर्भवती भी हुई और उसने दवाईयां खाईं । उसको आराम नहीं था, अब लोगों से, लड़ने लगी थी। झल्लाकर बात करती थी। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था , बच्चे बड़े हो रहे थे। यहां रहते हुए उसे लगभग आठ वर्ष हो गए थे। उसके चेहरे की रंगत भी फीकी पड़ने लगी थी।
उसने अब जैसे जीना छोड़ दिया था। उसने वहां से भागना भी चाहा, किन्तु बच्चों की ख़ातिर वापस लौट आई क्योंकि वो दुकानदार बच्चों को एक कमरे में बंद रखता। अब इतना साफ- सफाई का ध्यान भी नहीं रखती थी, उसके मन में कहीं एक घुटन थी, गुस्सा था। उसके व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ गया था। किसी से कुछ भी नहीं कह पाती थी ,न ही कोई उसे सुनना चाहता था,अपने काम से आते और बेरुखी से ऐसे चले जाते, जैसे उससे कोई मतलब ही न हो।
