कल्पित ने, आज अपनी किताब में एक नया ही अध्याय पढ़ा था, अमर होने का अध्याय ! जिसमें उसे ज्ञात हुआ -'अमृत' पीकर इंसान अमर हो जाता है। उसके मन में अनेक प्रश्न कुलबुलाने लगे और वह सोचने लगा , क्या ऐसी भी कोई चीज हो सकती है, जिसे पीकर, इंसान 'अमर' हो सकता है। वह कभी मरेगा ही नहीं, तब उसने एक और कहानी पढ़ी -''अमृत मंथन '' जिसमें भगवान विष्णु ,मोहिनी रूप धारण करके , अमृत का वितरण करते हैं , और सभी देवता 'अमृतपान' करते हैं और अमर हो जाते हैं।
किंतु उसमें से एक दानव ,छल से, देव रूप धारण करके, अमृत पान कर लेता है और तब मोहिनी रूप में ,विष्णु को पता चलता है कि वह दानव था ,जो देव रूप में गलत पंक्ति में बैठ गया था। तब वो तुरंत ही, अपने चक्र से उसका वध करना चाहते हैं किंतु तब तक उसने' अमृत पान' कर लिया था और वो अमर हो गया जो आज भी' राहु' और 'केतु' के नाम से जाना जाता है।
तब कल्पित के मन में अनेक प्रश्न उठे, यह अमृत कहां मिलेगा ? क्या अमृत पीकर सच में ही इंसान अमर हो सकता हैं ?वो तो समुन्द्र मंथन में निकला था ,जिसे देवताओं ने पी लिया। अब तो अमृत बचा ही नहीं होगा। हम भी अमृत पीते तो.... अमर हो जाते, कितना अच्छा होता ?या फिर यह' अमृत 'देवताओं के लिए ही था।दानवों ने भी तो समुन्द्र मंथन में साथ दिया था ,क्या उन्हें अमृत पीने का अधिकार नहीं था ?यदि देवताओं ने ही अमृत पान किया है, तो फिर देवता कहां है ? वो हमें दिखलाइ क्यों नहीं देते ? वो तो अमर हो चुके हैं। यही सब मंथन उसके मन में भी चल रहा था।
तब उसने, अपने दादा जी से उन सवालों के जबाब जानने चाहे ,दादाजी !क्या कोई ऐसी चीज है ? जिससे आदमी कभी मर ही नहीं सकता , हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
तब दादाजी ने पूछा - अमरता किसको मिलनी चाहिए ? अच्छी चीजों को ,जिनमें इंसान की उन्नति हो ,निस्वार्थ भाव को ,अब दानवों में ये भाव नहीं थे ,वे अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हालाँकि वो देवताओं से भी शक्तिशाली थे ,उनसे आशीर्वाद और वर प्राप्त करके, देवताओं से भी बलशाली हो जाते थे किन्तु वे अपने बल का दुरूपयोग करते थे ,इसीलिए उन्हें अमृत से वंचित रखा गया। देवताओं को अमृतपान उनकी खोई हुई ,शक्ति को वापस लाना था। अमृतपान से मतलब -'दिव्य शक्तियों की प्राप्ति !'
दादाजी मुस्कुराए और बोले - पृथ्वी पर जो भी इंसान आया है ,उसका नष्ट होना ,मर जाना निश्चित है क्योंकि यह जीवन नश्वर है ? किंतु तब भी इंसान बिना अमृत पान किये बग़ैर भी ,अमर हो सकता है ,उसमें ऐसी ही दिव्य शक्तियां हैं ,जिन्हे वो भूला बैठा है।
तभी बीच में कल्पित बोला -मैं जानता हूं वह किस तरह से अमर हो सकता है, आज ही मैंने अपनी किताब में पढ़ा है जो भी अमृत पान कर लेता है वह अमर हो जाता है। वही तो मैं जानना चाहता हूँ ,अमृत कहां मिलेगा ? क्या उसकी खोज के लिए कहीं जाना पड़ेगा ?क्या आज भी कहीं अमृत है ?
तब दादाजी विनम्रता से बोले - कल्पित ! तुम्हें धैर्य से संपूर्ण बात सुननी चाहिए ,मैं क्या कहना चाह रहा हूं ? अमृत बहुत पुराने समय में होता होगा, किंतु अमृत तो हमारे अंदर ही है , जिससे हम अधिक से अधिक समय तक जी सकते हैं।
वह कैसे ? यह बात कल्पित को समझ में नहीं आई।
तब दादा जी बोले -हम अपने मन, वचन ,कर्म से, श्रेष्ठ कार्य करें ! हमारी आत्मा हमें चेताती है ,कोई भी गलत कार्य न करें ,धर्मानुसार आचरण करें ! लालच ,ईर्ष्या, द्वेष ना रखें, यह चीज़ें मानव की दिव्यता को कम करती हैं। मानव के उजले स्वरूप को कमज़ोर बना देती हैं। धीरे-धीरे हमको समाप्त करने लगती है, हमारा हश्र होने लगता हैं। जबकि तुम सेवा भाव से, किसी की सहायता कर रहे हो, कोई अच्छा कार्य कर रहे हो, तुम्हारे श्रेष्ठ विचारों को, श्रेष्ठ व्यवहार को, धीरे-धीरे ज्ञानीजन जानने लगेंगे। तुम जीवन में ऐसा कार्य करो ! जिसे लोग ,वर्षों तक याद रखें ! यही 'अमृत पान' है। जब तुम मरने की पश्चात भी लोगों की यादों में उनकी स्मृतियों में अपने काम में जिन्दा रहोगे, वही अमरता है। मरने के पश्चात भी, यानि ये तन तो नष्ट हो जाता है किन्तु वो कभी मरता नहीं ,अमर हो जाता है।
