घर में सभी को पता चल गया था ,ख़ालिद के जाने का उन्हें ,ग़म तो हुआ किन्तु अपने बच्चों की भी फ़िक्र होने लगी। अब इन्हें जेल जाने से कोई नहीं रोक सकता किन्तु दोनों भाइयों को तो जैसे इस बात की परवाह ही नहीं थी। जब याकूब अपना काम करके बाहर से आया ,तब तैमूर ने उससे पूछा -ख़ालिद का क्या किया ?
भाई जान ! उसे वहां छोड़ना, सही नहीं था। कभी न कभी तो लोगों को उसकी गंध आ ही जाती है इसलिए हमने उसे जंगल में दफना दिया। किसी को पता नहीं चलेगा, उसकी लाश के टुकड़े बाहर निकलकर आ भी गये , तो देखने वाले या पुलिस यही सोचेगी - कि उसे किसी जंगली जानवर ने मार दिया है।
तेरे वे दोस्त कहां है ? अपना मुंह तो नहीं खोलेंगे।
नहीं, वो कल पैसे लेने आएंगे।
अभी यही सब बातें हो रही थीं , तब युसूफ साहब कांपते हाथों से बोले - इस बात का कहीं भी, किसी भी तरह से जिक्र नहीं होना चाहिए क्योंकि हम उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं।
सलमा ने उन कपड़ों को भी जला दिया जिन्हें तैमूर और याकूब पहन रहे थे। याकूब नहा कर ठीक-ठाक हो गया। बहुत रात हो चुकी थी, इसलिए सभी अपने-अपने कमरे में सोने चले गए। किसी का भी खाना खाने का मन नहीं कर रहा था सभी के मन में एक दर्द सा था, किसी को भूख ही नहीं लगी। सलमा मन ही मन सोच रही थी -अच्छा हुआ, मैंने यूसुफ़ साहब को पहले ही खाना खिला दिया वरना इन्हें भी भूखे सोना पड़ता।
अगले दिन रोज़ाना की तरह सलमा उठी और पानी भरने लगी ,दूधवाले से दूध लिया ,तब तक यूसूफ साहब भी उठ जाते थे किन्तु आज न जाने क्यों उठने में देरी हो गयी ? तब सोचा थोड़ा और सो लेंगे ,तो इनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहेगा। एक घंटा बीत गया वे तब भी नहीं उठे ,तब सलमा बोली - ज़ीनत के अब्बू उठिए ! दिन निकल आया है ,आप तो इतनी देर तक नहीं सोते हैं। कहकर अपने रोज़ाना के कामों में लग गई ,उसे युसूफ साहब के लिए खाना भी बनाना था क्योंकि आज उसने बावर्ची से मना कर दिया था आज वो खाना अपने आप बनाएगी।
यूसुफ साहब तब भी नहीं उठे ,लगभग एक घंटा बीत गया अखबार वाला अखबार भी ड़ालकर कर चला गया। युसूफ साहब तो अखबार जरूर पढ़ते हैं, अभी तक क्यों नहीं उठे ? रात में उठकर एक बार पानी माँगा था। तभी अपने कमरे से याकूब बाहर निकलकर आया ,उसे देखकर वो बोली -याकूब अपने अब्बू को उठाओ ! बहुत देर हो गई,पता नहीं, आज क्यों नहीं उठ रहे हैं ?
उठ जाएंगे, न जाने कब उन्हें नींद आई होगी ? सोने दीजिए !
एक बार जाकर पूछ तो ले,देख तो ले ! कहीं उनकी तबीयत तो नहीं बिगड़ गई। सलमा के मन को न जाने कैसे एहसास हुआ ?
अभी जाकर देखता हूं, जब वह अपने अब्बू को उठाने लगा तो वो नहीं उठे ,हिलाने पर भी नहीं उठे। तब याकूब चिल्लाया -अम्मी ! अब्बू नहीं उठ रहे हैं ,सलमा दौड़ कर आई और उसने युसूफ मियां को हिलाया ,उस वक़्त उनकी जो हालत देखी ,उसे देखकर समझ गई कि वो ठीक नहीं हैं , तभी याकूब से बोली -जल्दी से जाकर हकीम साहब को लेकर आ।
याकूब दौड़ते हुए हकीम को साहब को लेने गया, हकीम साहब भी जल्दी ही उसके साथ आ गए। सलमा ने उनसे पर्दा किया , और परदे से ही बोलती रही ,देखिए !न.... हकीम साहब ! ज़ीनत के अब्बू को क्या हुआ है ? बहुत देर से उठा रही हूं ,उठ नहीं रहे।
हकीम साहब ने, कमरे के अंदर जाकर उनकी नब्ज़ की जाँच की और बोले - अब युसूफ साहब नहीं रहे अल्लाह को प्यारे हो गए हैं। यह सुनते ही सलमा धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ी।
उस आवाज को सुनकर ,हक़ीम साहब समझ गए ,इन्हें सदमा लगा है , याकूब से बोले - जाकर पानी ले आओ !और अपनी अम्मी के मुँह पर पानी के छींटे मारो !
तब तक तैमूर भी आ चुका था ,तैमूर भागकर गया और पानी ले आया। दोनों भाई अपनी अम्मी के चेहरे पर पानी के छींटे मार कर उन्हें होश में लाने की कोशिश कर रहे थे।
हकीम साहब अभी भी वहीं थे, तब बोले - मैं इन्हें दवाई दे देता हूं ,इन्हें सदमा लगा है। कुछ देर में यह दुरुस्त हो जाएगीं। यूसुफ़ साहब के मय्यत की तैयारी करो ! अपने नाते रिश्तेदारों को जिन्हें बुलाना है उन्हें खबर भेज दो और बुला लो ! धीरे-धीरे यह खबर फैल गई कि युसूफ साहब नहीं रहे।
ज़ीनत और सलमा रो रहीं थीं । यह खबर फैलते हुए, वाहिद साहब के घर पहुंच गयी और उन्हें भी पता चल गया ,कि उनके भाईजान का इंतक़ाल हो गया है। वे भी अपनी बेगम के साथ घर पर पहुंच गए। गम का माहौल था कोई किसी से कुछ पूछ भी नहीं पा रहा था और न ही कुछ कह रहा था। युसूफ साहब की रुखसती की तैयारियां होने लगीं।उनकी मय्यत के जाने के बाद घर में एकदम सन्नाटा पसर गया था।
घर में मौत जो हुई थी, दुनिया की नजरों में एक ही मौत हुई थी दूसरी मौत तो ऐसी थी जिसकी जानकारी उसके ,अपनों को भी नहीं थी। दुख उसकी मौत का भी था। शायद यूसुफ़ साहब को उसी की मौत का ग़म ले गया।
सलमा की अम्मी !ये सब अचानक कैसे हो गया ?क्या उनकी तबियत नासाज़ थी।
ऐसा तो कुछ नहीं है ,वो तो तंदुरुस्त थे, रात के खाने के बाद सो गए थे। बस रात में एकबार उठकर मुझसे पानी माँगा था और बोले -बेग़म !थोड़ी बेचैनी सी हो रही है। मैंने भी उन्हें पानी दिया और सो गयी ,ध्यान ही नहीं दिया उन्हें परेशानी हो रही है ,अब वो अपनी लापरवाही पर पछता रही थी। वो भी तो दिनभर की थकी थी ,उसका शरीर आराम चाहता था। मन ही मन सोच रही थी ,जरूर उन्हें अपने बच्चों के जीवन को लेकर परेशानी रही होगी। ख़ालिद के जाने का जब उनके भाईजान को पता चलेगा ,तब क्या होगा ?यही सब परेशानियां उन्हें सता रही होंगी।
तीन दिनों के बाद सैयद और नाजिम अपने पैसे लेने आए और चुपचाप चले गए। आये तो वे पहले भी थे किन्तु याकूब के अब्बू की मौत की खबर सुनकर चुपचाप वापिस चले गए थे। पैसे देने के बाद उनसे याकूब ने कहा था -अब बहुत दिनों तक यहाँ या आस -पास कहीं दिखलाई मत देना !
यूसुफ़ साहब का सारा कारोबार, सारा काम, उन दोनों बच्चों पर आ गया था। अब वे बच्चे कहां रह गए थे ? वे अपने फैसले अब खुद करने लगे थे। समय से पहले ही बड़े हो गए थे ,ज़िम्मेदारियाँ जो आ गयी थीं। उस ग़म से उबरने में उन्हें थोड़ा समय लग गया। अभी तक ज़ीनत पर किसी का ध्यान नहीं गया था। वो सारा दिन कमरे में बंद रहती थी,न ही किसी से बोलती और न ही मिलने की कोशिश करती। एक दिन जब माहौल जब थोड़ा ठीक हुआ ,तब ज़ीनत की अम्मी ने उससे पूछा - क्या तू भी वहां पर गयी थी ?ज़ीनत ने हाँ में गर्दन हिलाई और उस रात को सोचकर रोने लगी।
रो मत, मेरी बच्ची ! अच्छा हुआ ,तू उसके चंगुल से बाहर आ गयी, तूने वहां पर क्या देखा ?
